<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731</id><updated>2011-07-08T17:09:31.724+05:30</updated><category term='हैवानियत'/><category term='भटकाव'/><category term='आरोपों की राजनीती'/><category term='दिखावा'/><category term='मेरा पड़ोसी'/><category term='तुष्टिकरण'/><category term='खेल या मजाक'/><category term='अफ़सोस'/><category term='अब मुन्नागीरी'/><category term='देशद्रोह'/><category term='दिक्कत'/><category term='क्षुद्र राजनीती'/><category term='बिगड़ता बचपन'/><category term='क्षेत्रीयता की स्वार्थपूर्ण राजनीति'/><category term='jamdaganikidharti'/><category term='वोट की राजनीति या कुछ और....'/><category term='सियासत'/><category term='गैरजरूरी बहस'/><category term='टालमटोल'/><category term='मुनाफाखोरी'/><category term='चापलूसी'/><category term='दुखद'/><category term='राजनीती'/><category term='ललकार'/><category term='सीख लें गांधीगीरी'/><category term='अनुभव'/><category term='सपनों का कत्ल'/><category term='नेताओं की छोटी होती राजनीतिक सोच'/><category term='तमाचा'/><category term='वाम आतंकवाद'/><category term='एक कहानी'/><category term='शर्मनाक'/><category term='जनादेश'/><category term='अवसरवाद'/><title type='text'>jamdagani ki dharti</title><subtitle type='html'>based on current and social issues</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>35</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-9114958104464838752</id><published>2011-03-19T01:24:00.003+05:30</published><updated>2011-03-19T01:29:21.898+05:30</updated><title type='text'>आप सभी को होली की ढ़ेरों शुभकामनाएं</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&amp;nbsp;आप सभी ब्लॉगर&amp;nbsp; बन्धुओं की होली रंग भरी&amp;nbsp; हो। &lt;br /&gt;रंगों से भी रंगीन जिन्दगी हो &lt;br /&gt;खुश रहें हर हाल में, यही बन्दगी है। &lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; शैलेश विजय&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-9114958104464838752?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/9114958104464838752/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/9114958104464838752'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/9114958104464838752'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='आप सभी को होली की ढ़ेरों शुभकामनाएं'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-4550225324031823935</id><published>2010-07-17T01:57:00.000+05:30</published><updated>2010-07-17T01:57:24.806+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अवसरवाद'/><title type='text'>माफी नहीं ऑक्टोपस पॉल के पास जाएं मुलायम जी........</title><content type='html'>पिछले दिन मुलायम सिंह यादव ने लोक सभा चुनावों के दौरान कल्याण सिंह को साथ लिए जाने के लिए देश के मुस्लिम समुदाय से माफी मांग ली। इसके साथ ही अपने मुख्यमन्त्रित्व काल में बाबरी मस्जिद&amp;nbsp;को बचाने का दावा भी कर डाला। अपने माफीनामे में सपा प्रमुख आजीवन मुसलमानों के कल्याण के लिए संघर्ष करते रहने का संकल्प व्यक्त किया है। इसे भारतीय राजनीति का विडंबना ही कहेंगे कि सभी गैर भाजपाई दल मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक के अलावा और कुछ नहीं समझते। शायद इसे मुसलमान समझते भी हैं और नहीं भी समझते हैं। मुलायम सिंह का माफीनामा आगामी यूपी विधान सभा चुनाव में अपनी खोई जमीन को वापस पाने की बेचैनी को ही दर्शाता है। लेकिन, लगता नहीं मुलायम और उनका कुनबा फिर से उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ पाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब लोकसभा चुनाव में सपा के साथ कल्याण सिंह साथ आए थे तो उस समय वह पाक साफ हो गए थे। उनके कथित सारे गुनाह (बाबरी ढांचा गिराने का) धुल गए थे। क्योंकि, वह धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े लंबरदार के साथ आ गए थे। लेकिन, जैसे ही चुनाव परिणाम आए कल्याण सपा, मुलायम और उनके परिवार के लिए अछूत हो गए। कल्याण के नाम से भी मुलायम को चिढ़ होने लगी है। हालांकि, कल्याण सिंह ने भी वक्त की नजाकत को देखते हुए मुलायम को अवसरवादी करार देने में देर नहीं लगाया और अपने को रामभक्त कहना शुरू कर दिया। लेकिन, मुलायम से गलबहियां करने के दौरान बाबरी प्रकरण पर उन्हें भी खेद था। यही तो हमारे देश की राजनीति है और यही हमारे नेताओं का दोहरा चरित्र है। जिसे देश की जनता नहीं समझती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब आने और दूर छिटकने के प्रकरण में दोनों नेता अपना दोहरा चरित्र छुपाने में नाकाम रहे। अब इसे रामभक्त और मुसलमान भक्त को जनता कितना समझती है यह तो आने वाले वक्त बताएगा, लेकिन इस प्रकरण से दोनों नेताओं की राजनीति अवसरवादिता से ज्यादा कुछ नहीं है। मुलायम सिंह को लगता है कि माफी मांग लेने और आजम खां को साथ ले लेने से उनका उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर से पहले वाला मुकाम हासिल हो जाएगा सन्देह है। क्योंकि, अब मुसलमानों के लिए केवल मुलायम ही नहीं हैं उनसे आगे भी कुछ बड़े और छोटे दल मुस्लिम समाज का पैरोकार होने का दावा करने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुलायम की यह माफीनामा लोक सभा और विधान सभा के उपचुनावों में मिली पराजय से उपजी हताशा को ही बयां कर रही है। उम्र और सम्भवतज् राजनीति की आखिरी बाजी खेलने की जी तोड़ कोशिश कर रहे मुलायम को माफी से कितना लाभ पहुंचता है। यह बसपा और कांग्रेस की राजनीति पर ही टीकी है। मतलब कि कांग्रेस जितना मजबूत होगी सपा उतना ही कमजोर होगी। राहुल गांधी का मिशन उत्तरप्रदेश सपा को ही कमजोर कर रहा है। इसे मुलायम भी खूब समझ रहे हैं। उनकी माफी इसी का प्रतिफल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उत्तरप्रदेश में मुलायम की पहले वाली छवि नहीं रही। उनसे उनकी ही जाति के लोग दूर होते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की पहली बार सत्ता सम्भालने वाले मुलायम की छवि दलित, पिछड़ों और धर्मनिरपेक्ष नेता की छवि थी। जो अब कब का मिट चुकी है। जनता जान चुकी है कि मुलायम लोहिया के नाम पर अपने ही परिवार को आगे ले जाना चाहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में मुलायम सिंह को माफी मांगने की जगह ऑक्टोपास पॉल की शरण में जाना चाहिए। शायद, कुछ राजनीतिक भविष्य के लिए शुभ संकेत मिल जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-4550225324031823935?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/4550225324031823935/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4550225324031823935'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4550225324031823935'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='माफी नहीं ऑक्टोपस पॉल के पास जाएं मुलायम जी........'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-4205455955129079088</id><published>2010-05-10T01:22:00.000+05:30</published><updated>2010-05-10T01:22:34.832+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिखावा'/><title type='text'>मां को एक ही दिन सम्मान क्यों?</title><content type='html'>हमारी संस्कृति में माता-पिता के आशीर्वाद से ही दिन की शुरुआत करने की सलाह दी गई है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार को भारत सहित लगभग अधिकांश देशों में पाश्चात्य संस्कृति का मदर्स डे मनाया गया। बच्चों और बड़ों ने मॉम को गिफ्ट&amp;nbsp; आदि देकर उनके प्रति सम्मान और प्रेम का प्रदर्शन किया। इस बार छोटे शहरों और शहर से सटे गांवों में भी यह दिवस मनाया गया। इसे देखकर कुछ अच्छा और कुछ बुरा भी लगा। अच्छा इस मामले में कि इस भागमभाग और व्यस्ततम जिन्दगी में भी लोग एक दिन का कुछ पल अपनी मां या अपनों के लिए निकाल लेते हैं। दुख इस लिए हुआ कि अब हम भारतीय भी रिश्तों को समय के चक्र में समेटने लगे हैं और इसे अपनी जिन्दगी के अहम हिस्सों में शामिल करने में हमें तनिक भी अटपटा नहीं लगता। बल्कि गर्व होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार को प्रकाशित लगभग सभी समाचार पत्रों में मदर्स डे पर फीचर पन्ना प्रकाशित किया गया था। जिसमें एक तरफ अपने बच्चों के भविष्य के लिए माताओं के समर्पण के किस्से थे तो दूसरी तरफ नामी लोगों के विशिंग भरे थे। कुछ अखबारों में यह खबर भी प्रकाशित की गई थी कि कई बच्चों को यह पता ही नहीं था कि मदर्स डे क्या होता है। दिल्ली नोएडा सहित कई बड़े शहरों में इस अवसर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। जिसमें कई शहीदों की माताओं को&amp;nbsp;सम्मानित&amp;nbsp; किया गया है। जो एक अच्छी पहल है। ऐसे आयोजक निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता-पिता को सम्मान&amp;nbsp; दिया जाना चाहिए।&amp;nbsp;बुजुर्गों&amp;nbsp;को भी एहसास होना चाहिए कि उनका भी ध्यान रखने वाला कोई है। सभी के माता-पिता यह चाहते हैं कि वृद्धावस्था में उनका सहारा उनकी सन्तान बनें। हर माता-पिता हर क्षण अपने बच्चों की उन्नति की कामना करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में यह बात उल्लेखनीय है कि क्या माता-पिता के लिए वर्ष में सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एक दिन ही काफी है। वे मां-बाप जो तमाम दिक्कतें झेलकर भी अपने बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। क्या उन्हें साल में एक दिन ही एहसास होना चाहिए कि उनका भी कोई अपना है जो उन्हें प्रेम करता है। मुझे लगता है कि यह गलत है। हो सकता है कि इसे कुछ लोग प्रतियोगिता भरी और भागमभाग की जिन्दगी में सही मानते हों, लेकिन मैं इसे कतई सही नहीं मानता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय समाज और संस्कृति में रिश्तों को समय के डोर में बांधने की कभी परंपरा नहीं रही है, और नहीं प्रेम, सम्बंध और अपनत्व को कभी दिन विशेष और समय चक्र में समेटा ही गया है। लेकिन, इधर कुछ वर्षों से समाचार चैनलों में पाश्चात्य संस्कृति के परंपराओं को भारतीय समाज में ढालने की कोशिश के फलस्वरूप लोग रिश्तों को दिन और घंटों में बांधने लगे हैं। हालांकि, यह परंपरा अभी देश के कुछ मेट्रो टाइप के शहरों में ही ज्यादे है। लेकिन, देखादेखी छोटे शहरों में भी इस तरह के अवसर मनाए जाने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति, समाज और परंपराएं तो अपनों को हर दिन ससम्मान देने और प्रेम प्रदर्शित करने की उदात्त अवधारणा पर आधारित है। हमारी संस्कृति तो दिन की शुरूआत ही माता-पिता की आशीर्वाद से करने के लिए प्रेरित करती है। श्रीरमाचरितमानस में गोस्वामीजी लिखते हैं-&amp;nbsp;प्रात काल उठि रघुनाथा, मातु-पिता गुरू नावहीं माथां जिस देश में ऐसे प्रेरक प्रसंग हों वहां माता-पिता को सम्मान देने के लिए दिन विशेष की भला क्या जरूरत है। कुछ लोगों की यह बात सही हो सकती है। आज के प्रतियोगी समय में यह सम्भव नहीं है। हम भी सहमत हैं कि सम्भव नहीं है लेकिन क्या रिश्तों को समय चक्र में बांधा जा सकता है। प्रतिदिन माता-पिता के प्रति सम्मान की भावना रखी जा सकती है। जिसके वे हमें जन्म देकर हकदार हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम की सोच और&amp;nbsp;सभ्यता&amp;nbsp;&amp;nbsp;अलग है। वहां रिश्तों की कोई पहचान ही नहीं है। कुछ थोड़े से लोग हैं जो परिवार संस्था को मानते हैं। लेकिन, हमारे देश में परिवार वह नींव है जहां से हमें सबकुछ हासिल होता है। ऐसे में हम प्रेम, सम्मान आदि को समय के बंधन में नहीं बांध सकते। यदि ऐसा करते हैं तो यह महज एक दिखावा से ज्यादा कुछ नहीं है। माता-पिता के लिए मदर्स या फादर्स डे पर&amp;nbsp;गिफ्ट नहीं प्रतिदिन प्रेम के दो शब्द ही काफी हैं।&amp;nbsp;दुर्भाग्य&amp;nbsp;&amp;nbsp;से यह दिख नहीं रहा है। केवल पश्चिम का नकल करने में हम लगे हैं और इसी को हम आधुनिक होने का मुगालता पाल लेते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' 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vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-1747374425616977918</id><published>2010-04-26T02:09:00.001+05:30</published><updated>2010-04-26T02:12:32.936+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चापलूसी'/><title type='text'>कृपया सचिन को भगवान न बनाएं......</title><content type='html'>सचिन खिलाड़ी के रूप में ही बहुत महान हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले शनिवार को सचिन तेन्दुलकर का 37 वां जन्मदिन पूरे धूमधाम से मनाया गया। हम भी सचिन की लंबी उम्र की कामना करते हैं और चाहते हैं कि वह अगले दस वर्ष तक क्रिकेट खेलें। क्रिकेट से थोड़ा बहुत भी लगाव रखने वाले हर&amp;nbsp;व्यक्ति&amp;nbsp;&amp;nbsp;की यह मंशा है कि सचिन अभी कई रिकार्ड कायम करें। कुछ ऐसा रिकार्ड बना दें जिसे तोड़ने की क्षमता निकट भविष्य में किसी के पास न हो। लेकिन, इस विनम्र और सादगी पसन्द&amp;nbsp;शख्सियत&amp;nbsp; के सम्मान&amp;nbsp;&amp;nbsp;में कुछ लोग, कुछ मीडिया संस्थान कुछ ज्यादे ही उत्साहित हो जा रहे हैं। चाहे उनको भारतरत्न देने की बात हो या उन्हें भगवान की पदवी से विभूषित करने की बात हो हर तरफ जल्दबाजी ही दिख रही है। कुछ बातें ऐसी हैं जिनपर टिप्पणी करना मौजूं जान पड़ता है। हालांकि, सचिन के अंध भक्तों को यह बात बुरी जरूर लग सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही बतौर खिलाड़ी सचिन महान हैं और उनके आसपास तो क्या उनके आभा मण्डल के समीप भी विश्व क्रिकेट में कोई नहीं दिखता है। इस सच्चाई से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि मौजूदा दौर में हर रिकार्ड सचिन से ही शुरू होकर उन्हीं पर खत्म भी हो रहा है। चाहे बात वनडे/टेस्ट में सर्वाधिक शतक लगाने का हो, ज्यादे मैच खेलने का हो, मैन आफ दी सिरीज/मैन आफ दी मैच हो अथवा वनडे में दो सौ रन बनाने का हो हर जगह एक ही नाम है वह सचिन तेन्दुलकर। तमाम कई ऐसे भी छोटे-मोटे रिकार्ड हैं जो सचिन के नाम पर अंकित हैं। वहीं क्रिकेट के नए संस्करण आईपीएल में भी सचिन ने इस वर्ष सर्वाधिक रन बनाए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इन उपलब्धियों से ही सचिन को भगवान मान लेना चाहिए? यदि ऐसा है तो मुझे लगता है भगवान शब्द ही गलत है। भगवान का दर्जा तो हर किसी को मिलना चाहिए। सानिया मिर्जा को भी देवी का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने भी भारत का नाम टेनिस के क्षेत्र में रौशन किया है। दूसरी तरफ, सचिन अक्सर मौके पर&amp;nbsp;उम्दा&amp;nbsp;खेल नहीं खेल पाते हैं। कई बार जब उनसे उम्मीद की जाती है वह नहीं चल पाते हैं। इसे उम्मीद का बोझ भी मान सकते हैं। सचिन की आलोचना इसलिए भी होती रही है कि वह कभी जीताऊ खिलाड़ी साबित नहीं हो सके। सचिन के दम पर कितनी सिरीज जीती गई हैं। विश्वकप में भी कोई सचिन अमिट छाप नहीं छोड़ पाए हैं। सचिन का&amp;nbsp;व्यक्तिगत&amp;nbsp;उपलब्धि&amp;nbsp;बेदाग है, लेकिन सचिन की उपस्थिति के बाद भी भारतीय टीम कोई बहुत बड़ी&amp;nbsp;उपलब्धि अभी तक&amp;nbsp;&amp;nbsp;हासिल नहीं कर पाई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हद तो तब हो जाती है जब फिल्मों में कई यादगार भूमिका निभाने वाले अनुपम खेर यह कह कर सचिन को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हैं कि सचिन के चलते उन्हें भारतीय होने पर गर्व है। (यह बात 25 अप्रैल को दिनभर कई टीवी चैनलों पर रीडर पट्टी पर चल रही थी)&amp;nbsp; क्या दुनिया में अध्यात्म और ज्ञान की शिक्षा देने वाले भारत की पहचान मात्र सचिन से है। सचिन खेल के एक विधा क्रिकेट के चमकते सितारे हैं। इस तरह की बातें कह कर अनुपम जी क्या साबित करना चाहते हैं। इससे तो यही लगता है उन्हें सचिन के अलावा भारत में और कुछ दिखता ही नहीं है। भारत की पहचान तो भारत से ही है। क्रिकेट के चलते ही मीडिया में दूसरे खेलों में उम्दा&amp;nbsp;प्रदर्शन करने वाले कई खिलाçड़यों को कवरेज नहीं मिल पाता है। जिससे उनकी महानता दब जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा आशय सचिन की महानता को कम करके आंकना नहीं है। लेकिन, सचिन को केवल खिलाड़ी या इंसान ही रहने दिया जाता तो उनकी महानता और बढ़ जाती। यह सच है कि सचिन किसी की प्रशंसा या बुराई से परे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-1747374425616977918?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/1747374425616977918/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/04/blog-post_26.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1747374425616977918'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1747374425616977918'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/04/blog-post_26.html' title='कृपया सचिन को भगवान न बनाएं......'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3731846619861738861</id><published>2010-04-16T02:23:00.002+05:30</published><updated>2010-04-16T02:27:51.116+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेल या मजाक'/><title type='text'>आईपीएल का खेल की भावना से कोई सरोकार नहीं</title><content type='html'>आईपीएल की तिलस्म से&amp;nbsp;पर्दा&amp;nbsp;उठना चाहिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेश राज्यमन्त्री और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के ट्वीट वार ने आईपीएल की सच्चाई पर से धीरे-धीरे&amp;nbsp;पर्दा उठाने लगा है।&amp;nbsp;उम्मीद&amp;nbsp;की जानी चाहिए इसी बहाने आईपीएल का तिलस्म देशवासियों के सामने आएगा। जिससे लोग जान सकें कि क्रिकेट के इस तथाकथित खेल पर पैसा पानी की तरह बहाने वाले फ्रेंचाइजी टीमों के शेयरधारक कौन&amp;nbsp;हैं? क्या आईपीएल में पैसा लगाने वाले वाकई अच्छे लोग हैं। आयकर विभाग ने खोजबीन शुरू तो&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;है लेकिन, केन्द्र सरकार को भी स्वतन्त्र जांच एजेंसी से जांच करानी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, अपने पहले संस्करण से ही आईपीएल धन वर्षा का नायाब स्त्रोत बन गया है। इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोग मालामाल हो रहे हैं। कुछ खिलाड़ी भी प्रदर्शन कर वाहवाही लूट रहे हैं। लेकिन, क्या वाकई कलात्मक खेल देखने को मिल रहा है। इस मुद्दे पर भी चर्चा होनी चाहिए। दुर्भाग्य से इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, शहरों के नाम पर टीमों का नाम तो रख दिया गया है लेकिन टीम में उन शहरों के खिलाड़ी गिनती के भी नहीं हैं। आईपीएल का मैच देखना ही मुझे समय बर्बाद करना लगता है। इस आईपीएल से देश की न तो अस्मिता&amp;nbsp;ही जुड़ी है और नहीं इसका खेल के कलात्मक विधा से ही कोई सरोकार है। आईपीएल का मुख्य&amp;nbsp;उद्देश्य लोगों की भावनाएं भुनाकर सिर्फ पैसा कमाना भर है। अपने उद्देश्य में आईपीएल को गढ़ने वाले पूर्णरूपेण सफल रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोच्चि टीम को लेकर जो बातें प्रकाश में आ रही हैं। यदि आईपीएल को सही अर्थों में खेल माना जाता है तो इससे खेल भावना दूषित हुई है। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि आईपीएल में माफियाओं का भी पैसा लगा है। समाचारों पर विश्वास करें तो इसमें डी कंपनी का भी परोक्ष पैसा लगा है। यह तो आयकर विभाग के जांच के बाद सामने आ ही जाएगा। यदि यह सही साबित हुआ तो आईपीएल को फ्रेमवर्क करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। नए घटनाक्रम में अहमदाबाद टीम को लेकर जिस तरह से गुजरात के मुख्यमन्त्री का नाम आ रहा है। इससे तो लगता है कि खेल के इस प्रारूप का एक अलग स्वरूप भी है। जो दिख नहीं रहा है। इससे तो सहज ही अन्दाजा लगता है कि आईपीएल का खेल से कोई लेना-देना नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रवासी भारतीय मामलों के मन्त्री व्यालार रवि ने ठीक ही कहा है कि इण्डियन प्रीमियर लीग एक तरह का महिमामण्डित जुआं है। उन्होंने कहा कि मैं आईपीएल को पसन्द नहीं करता। यह एक महिमामण्डित जुआ है। मैं तो इसे खेल भी नहीं मानता। यह एक दिवसीय या टेस्ट क्रिकेट नहीं है। यही नहीं कई दिग्गज पूर्व खिलाçड़यों ने भी आईपीएल के तौर-तरीकों पर सवाल उठाया है। गौर करें आईपीएल के दूसरे संस्करण में जिस तरह से कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के कई कप्तानों की परिकल्पना की गई थी उससे सुनील गावस्कर जैसे महान खिलाड़ी भी नाराजगी जाहिर कर चुके थे। कई ऐसे तरीके आईपीएल में ईजाद किए गए हैं जिससे पूर्व दिग्गज खिलाड़ी इत्तेफाक&amp;nbsp;नहीं रखते। वहीं इस बार जब टीमों के जीतने के बाद जिस तरह से शराब और जश्न का दौर चल रहा है निश्चित तौर शबाब की भागीदारी होगी। इससे क्रिकेट के भद्र स्वरूप का मजाक ही उड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, यदि ललित मोदी&amp;nbsp;केवल कोच्चि फ्रेंचाइजी के शेयरधारकों का नाम जाहिर कर रहे हैं तो इससे उनकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। देश वासी सभी टीमों के शेयरधारकों और उन टीमों के असली मालिकों के बारे में जानना चाहेंगे। यह देश को बताया जाना चाहिए कि उनके आय के क्या स्त्रोत हैं। आईपीएल टीमों के मालिक और शेयरधारक यदि दूसरे खेलों पर भी इसी तरह से पैसा लगाते या स्पांसरशिप खरीदते तो देश निश्चित तौर पर दूसरे खेलों में भी अच्छा नाम कमाता और खिलाçड़यों को पारिश्रमिक के लिए हड़ताल नहीं करना पड़ता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। छोटे कस्बों और गांवों के देशज खिलाçड़यों को इन्तजार है किसी ऐसे आईपीएल का जिससे उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन तो ही ही साथ ही देश का नाम भी पूरी दुनिया में खेलों के मामले में आदर के साथ लिया जाए..........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3731846619861738861?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3731846619861738861/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3731846619861738861'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3731846619861738861'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='आईपीएल का खेल की भावना से कोई सरोकार नहीं'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-1621598619999790617</id><published>2010-03-19T02:05:00.000+05:30</published><updated>2010-03-19T02:05:35.328+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भटकाव'/><title type='text'>नोटों का माला पहनने से दलितों का उत्थान नहीं होगा मुख्यमंत्री जी</title><content type='html'>बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयन्ती के बहाने&amp;nbsp;शक्ति&amp;nbsp;प्रदर्शन करने वाली बसपा सुप्रीमो उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री नोटों की माला पहन कर क्या सन्देश देना चाहती हैं। यह तो वही बताएंगी। लेकिन, जिस प्रदेश में बुन्देलखण्ड जैसे पिछड़े इलाके हैं जहां कि जनता गरीबी से त्रस्त है वैसे प्रदेश में ऐसा प्रदर्शन निश्चय ही जनता का उपहास उड़ाया जाना ही मानना चाहिए। विपक्ष की हायतौबा से बेपरवाह मुख्यमंत्री जयन्ती के दूसरे दिन भी नोटों की माला पहन कर दलित की गरीब बेटी होने का सबूत दे दिया है। यदि उन पैसों को जयन्ती समारोह में आए गरीबों की बेटियों की शादी और उनकी शिक्षा के लिए दे दिए गया होता तो शायद बहुतों का कल्याण हो गया होता। दरअसल, यहां गरीब जनता की फिक्र किसे है। मायावती को तो विरोधियों के जले पर नमक छिड़कना था और प्रदेश की असल मुद्दों से सबका ध्यान भटकाना था जिसमें बसपा के रणनीतिकार पूरी तरह से सफल रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बसपा संस्थापक की जयन्ती पर रैली के नाम पर उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री धनबल और जनबल का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं रहीं। उत्तरप्रदेश देश के बीमारू राज्यों में शुमार है। प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सिंचाई सहित कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त है। लेकिन, मुख्यमंत्री जयन्ती मनाने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह फूंक देती हैं। योजनाओं को पूरी करने के लिए धन की कमी की बात करती हैं। बजट मुहैय्या कराने में केन्द्र सरकार पर भेदभाव का आरोप भी लगाती हैं। क्या, मायावती और बसपा के रणनीतिकार बताएंगे कि इतनी रकम कहां से आई। जयन्ती समारोह पर कितना खर्च हुआ। क्या बसपा के पार्टी कोष में धन है कि वह अपने खर्च पर इतना बड़ा आयोजन कर सकती है। देश का कोई भी नागरिक इससे&amp;nbsp;इत्तेफाक&amp;nbsp;&amp;nbsp;नहीं रखेगा कि जयन्ती आयोजन में सरकारी धन का दुरुपयोग न हुआ है। हालांकि, उत्तरप्रदेश के लोकनिर्माण मन्त्री का यह कहना कि यह आयोजन और माला के लिए रकम कार्यकर्ताओं द्वारा चन्दा कर जुटाया गया है। गले के नीचे नहीं उतरता। क्या मन्त्री महोदय यह बताएंगे कि प्रदेश में जो प्रतिमाएं लगाई जा रही हैं उसके लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने चन्दा&amp;nbsp;एकत्र&amp;nbsp;कर दिया है। या सरकारी खजाने का ही इस्तेमाल किया गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री को अपनी मूर्तियां भी लगवाने का शौक है। सीएम साहिबा आप अच्छा काम करेंगी तो जनता आपकी मूर्ति खुद लगवाएगी। अपने&amp;nbsp;कार्यों&amp;nbsp;की समीक्षा जनता को करने दीजिए। दलित उत्थान और दलित पुरुषों को सम्मान दिलाने के नाम पर फिजूल खर्ची का समर्थन नहीं किया जा सकता। वैसे भी बसपा केवल दलित एजेण्डे के बल पर ही उत्तरप्रदेश में बहुमत की सरकार बनाने में सफल नहीं हुई है। पार्टी को राज्य में सभी जातियों का भरपूर समर्थन मिला है। जो जातियां भाजपा और कांग्रेस की कभी कट्टर समर्थक थीं उन्होंने भी बसपा को वोट देकर सत्ता की चाबी सौंपी थीं। शायद मायावती और उनके सिपाहसलार इस बात को भूल गए हैं। मुख्यमंत्री साहिबा याद रखिए काठ की हाण्डी बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांच बार देश को प्रधानमन्त्री देने वाले उत्तरप्रदेश का यह दुभाüग्य है कि राज्य के विकास के लिए किसी दल ने ईमानदारी से पहल नहीं किया। यहां पाटिüयां सत्ता हासिल करने और अपनों की जेबें भरने में ही लगी रहीं। आज भी किसी दल केपास प्रदेश के विकास के लिए न तो कोई विजन है और न ही नीति। लेकिन, यहां की जनता पता नहीं क्यों सबकुछ जानते हुए भी पिछड़ेपन का दंश झेलने को बाध्य है।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-1621598619999790617?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/1621598619999790617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1621598619999790617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1621598619999790617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html' title='नोटों का माला पहनने से दलितों का उत्थान नहीं होगा मुख्यमंत्री जी'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-8990909776804972554</id><published>2010-03-10T01:50:00.000+05:30</published><updated>2010-03-10T01:50:11.111+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सियासत'/><title type='text'>आरक्षण से ही महिलाओं के दुख दूर नहीं हो जाएंगे</title><content type='html'>जातिवाद की राजनीति करने वालों को मुंहकी&amp;nbsp; खानी ही थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछड़ों, दलितों और मुस्लिम महिलाओं के लिए कोटे के अन्दर कोटे की पैरोकारी करने वाले कथित लंबरदारों&amp;nbsp; के विरोध के बावजूद महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक राज्यसभा में पास होना वाकई ऐतिहासिक कदम है। लेकिन, इससे महिलाओं के सारे दुख दूर हो जाएंगे ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। लेकिन एक उम्मीद तो जगती है। दूसरी तरफ, एक सार्थक विधेयक पर लेफ्ट, राइट और कांग्रेस का एक साथ आना लोकतन्त्र के लिए सुखद है। जो यह बताने के लिए काफी है कि दुनिया में भारतीय लोकतन्त्र की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिलाएं चाहे पिछड़े वर्ग की हों, दलित हों या मुस्लिम समुदाय&amp;nbsp; की हों अथवा अगड़ी&amp;nbsp; जातियों से सम्बंधित हों उनकी समस्याएं एक जैसी होती हैं। महिलाओं को आरक्षण के नाम पर बांटना निश्चित तौर पर गलत है। लेकिन, यह बात लालू, मुलायम और शरद यादव को समझ में आए तब न। इन्हें तो लोकतन्त्र में ही विश्वास नहीं है। संसद में जो मर्यादा इन लोगों ने दिखाया उससे देश का हर संभ्रान्त नागरिक दुखी है। लोकतन्त्र में विरोध करने का तरीका होता है। लेकिन, इस तरह का आचरण तनिक भी शोभनीय&amp;nbsp; नहीं है। ऐसे आचरण करने वाले दलों के नेताओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इन दलों की मान्यता तक समाप्त कर दी जानी चाहिए। इसी से देश में जातिवाद की जड़ें खत्म होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक का विरोध करने का ठोस कारण किसी पार्टी के पास नहीं है। जो दल विरोध कर रहे हैं उसके पीछे उनकी मंशा गलत है। दरअसल, यह दल आरक्षण के आड़ में अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं। इन्हें डर है कि अबतक&amp;nbsp; जो लाभ इन्हें मिलता रहा है। महिलाओं को आरक्षण देने के बाद&amp;nbsp; नहीं मिलेगा। इनके कुनबे को मिलने वाली मलाई बंट जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, यादव तिकड़ी&amp;nbsp; कोटे के अन्दर कोटे की मांग यों ही नहीं कर रही है। इसके पीछे एक गहरी सोच है। जो मण्डल कमीशन की राजनीति से जुड़ी है। इनकी मंशा स्पष्ट तौर पर सामान्य जाति के लोगों को संसद और विधानसभाओं से बाहर करने की है। आरक्षण के अन्दर आरक्षण की व्यवस्था से असल में कम तो सामान्य वर्ग की सीटें ही होंगी। दूसरी तरफ सामान्य आरक्षण से किसी को कोई नुकसान नहीं होगा। हां, इससे यादव तिकड़ी&amp;nbsp; और अन्य को अपनों को टिकट देने का रास्ता थोड़ा कम हो जाएगा। यही इनके विरोध की वजह है। दूसरी तरफ, सामान्य महिला आरक्षण के विरोध के बहाने ही लालू-मुलायम को अपनी खोई जमीन फिर से हासिल करने का एक रास्ता नज़र आ रहा था। जिसमें वे कामयाब नहीं हो सके। मुलायम और लालू मुस्लिमों को रिझाने के लिए ही सारी कवायद कर रहे थे। वह जानते हैं कि अब भाजपा का हौव्वा खड़ा कर मुस्लिमों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकते। क्योंकि, मुस्लिम मतदाता इनकी नीयत को भांप चुका है। कांग्रेस की तरफ मुस्लिमों का झुकाव इन्हें रास नहीं आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान रहे जब दो तिहाई बहुमत से राज्य सभा में विधेयक&amp;nbsp; पास हो गया तो नजमा हेपतुल्ला कितनी खुश थीं। वह भी तो मुस्लिम ही हैं। उन्हें तो इससे तनिक भी ऐतराज नहीं है। दूसरी तरफ, आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी&amp;nbsp; ने मांग नहीं की थी। तो क्या वजह है कि सर्वाधिक हितैषी मुलायम और लालू-शरद ही हैं। दरअसल, ये लोग अपनों के अलावा कभी सर्वसमाज&amp;nbsp; के बारे में सोच ही नहीं सकते। यह भूल जाते हैं कि कभी जाति की राजनीति को आधार बनाकर कभी भी सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। उत्तर प्रदेश में मायावती ने जैसे ही तिलक तराजू की बात त्यागीं वैसे ही प्रचण्ड बहुमत से जीतीं। क्या कभी मायावती दलित की राजनीति करके पूर्ण बहुमत से सत्ता में आईं होतीं। यह बात जितनी जल्द लालू मुलायम शरद जैसे जातिवाद फैलाने वाले समझ जाएं उतना ही अच्छा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधेयक पास होने के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद या विधानसभाओं में वैसी महिलाएं चुनकर आएंगी जिन्हें पता हो कि उनका दायित्व क्या है? ऐसा न हो कि चुनाव तो जीत जाएं लेकिन उनका रिमोट किसी और के हाथ में हो। जैसा कि पंचायतों में हो रहा है। सोनिया, सुषमा स्वराज,&amp;nbsp; शीला, मायावती, बिन्दा करात सरीखे महिला नेताओं की देश को जरूरत है। फिलहाल, जो महिलाएं लोकसभा या राज्य सभा में है वे अधिकतर पुरुष नेताओं से ज्यादे&amp;nbsp; शिक्षित और पेशेवर हैं। ऐसी महिलाएं चुनकर आएं तो निश्चित तौर पर हमारा लोकतन्त्र सही अर्थों में सफल हो जाएगा। लेकिन इसकी उम्मीद कम है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-8990909776804972554?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/8990909776804972554/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8990909776804972554'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8990909776804972554'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html' title='आरक्षण से ही महिलाओं के दुख दूर नहीं हो जाएंगे'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3829386994728698861</id><published>2010-03-03T01:30:00.002+05:30</published><updated>2010-03-03T01:48:04.467+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शर्मनाक'/><title type='text'>हमारी आस्था और ये ढोंगी बाबा</title><content type='html'>जिस्म&amp;nbsp;फरोसी के&amp;nbsp;विरुद्ध&amp;nbsp;सख्त&amp;nbsp;कानून की&amp;nbsp;जरूरत&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;लड़कियों को आजादी दायरा, नैतिकता और अनुशासन के साथ दी&amp;nbsp;जानी&amp;nbsp;चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने देश में आस्था या धर्म के नाम पर किसी को बेवकूफ बनाना आसान है। अच्छी और लच्छीदार बातों से लोगों का विश्वास जीत कर उन्हें चूना लगाना मुश्किल नहीं है। देश में धर्म के आड़ में सरेआम अवैध धंधे चल रहे हैं। असल में&amp;nbsp;कुकुरमुत्ते&amp;nbsp;की तरह देश में बढ़ते कथित धर्माचार्य, सन्त और बाबा सफेदपोसों और हुक्मरानों की काली करतूतों को धवल वस्त्र प्रदान कर रहे हैं। ये बाबा जनता और अपने भक्तों की दक्षिणा से खुद तो ऐश ओ आराम की जिन्दगी व्यतीत करते हीं है अपने चेलों के लिए विलासितापूर्ण पल उपलब्ध कराने का जरीया भी बनते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में गिरफ्तार&amp;nbsp;सेक्स&amp;nbsp;&amp;nbsp;रैकेट का सरगना शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ ईच्छाधारी सन्त स्वामी भीमानन्द अकेला ही श्वेत या भगवा वस्त्रधारी बाबा नहीं है। इसके जैसे अभी तमाम दबे पड़े हैं। जिनको पुलिस जानती है लेकिन उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकती। क्योंकि पुलिस को भी डर है कि उन बाबाओं के चेले उनके डिपार्टमेंट और राजनीति में भी हैं। उसकी डायरी से २५ हजार करोर की लेनदेन का मामला भी प्रकाश में आया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, ये कथित बाबा या सन्त उतने दोषी नहीं हैं जितने हम और आप हैं। जब भी कोई आदर्श की बातें करने लगता है तो हम भारतीय उसे महान मानने लगते हैं। लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह आदर्शवादी कहां से आ गया। इसका अतीत क्या है? यह और क्या गुल खिला रहा है। इन सब बातों को जानने की हमारे पास फुर्सत ही कहां है? हमें तो बस जल्दी है। और यही जल्दी हमारी दुखती नस है। जिसे राजीव रंजन द्विवेदी जैसे आस्था के भेçड़ये निगलने में देर नहीं लगाते। जब इनकी पोल खुलती है तो उस समय हम हार गए जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी हारी हुई कमाई को कसमकसाते और छटपटाते हुए केवल देखता भर है कुछ कर सकने की उसमें नैतिक बल और जोश नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेक्स सरगना शिवमूर्ति के गिरफ्तारी के दौरान टीवी पर दिखाए जा रहे उन दृश्यों को जरा स्मरण करिए वह कैसे लोगों को आशीर्वाद दे रहा था और आशीर्वाद लेने वाले किस तरह से निहाल हो रहे थे। उसके शरण में जाने वाले कोई एकदम से निपट निरक्षर या गांव के भोलेभाले लोग नहीं हैं। दिल्ली जैसे मेट्रो पोलिटन सिटी में रहने वाले जागरूक लोग हैं। लेकिन, कोई यह जानना जरूरी नहीं समझा कि यह बाबा कहां से अवतरित हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवमूर्त द्विवेदी उर्फ इच्छामूर्ति दिल्ली में ही गार्ड की नौकरी करता था। वह नोएडा पुलिस के हत्थे भी चढ़ चुका है। वह दिनदहाड़े लूट की वारदात को अंजाम दे चुका है। जिस्म्फरोसी के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है। फिर भी लोगों का वह बाबा बन गया। उसके कदमों में धन की बरसात होने लगी। वह मन्दिर और अस्पताल तक बनवा डाला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, उसके साथ गिरफ्तार लड़कियां भी हाईप्रोफाइल मां-बाप की हाईप्रोफाइल बेटियां हैं। जिनकी जेब खर्चे इतने अधिक हो चुके हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए अपना शरीर बेचने में तनिक भी गुरेज नहीं है। छह में चार से लड़कियां एयर होस्टेस हैं जिनमें से एक एमबीए की छात्रा भी है। यह हमारे बदलते भारत और विकसित भारत की बदलती तस्वीर है जो स्त्री स्वतन्त्रता का हिमायती है। लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए, लेकिन दायरा, नैतिकता और अनुशासन का कड़ा पहरा भी होना चाहिए। यह देखा भी जाना चाहिए कि इस स्वतन्त्रता का बेजा इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। जो लड़कियां पकड़ी गईं हैं केवल वही दोषी नहीं हैं। उनके माता-पिता भी दोषी हैं। जिन्हें न तो अपने बच्चों को देने के लिए संस्कार है और न ही उनकी कार्य गुजारियों का समीक्षा करने के लिए समय। ऐसे में बच्चे तो ऐसे रैकेटों में फंसेंगे ही। क्योंकि, पकड़ी गई सभी लड़कियां अमीर घरों और बड़े कालेजों में पढ़ने वाली हैं। इस शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी के रैकेट में अभी पुलिस पर भरोसा करें तो कम से कम चार सौ से अधिक लड़कियां हैं। इसका नेटवर्क देश के कई बड़े शहरों में फैला हुआ है। जो अपने भक्तों के सुविधा के अनुसार सम्बंधित शहरों में ही लड़कियों को उपलब्ध कराता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस्म फरोसी के विरुद्ध सख्त और गैर जमानती कानून बनाना होगा. मौजूदा कानून बहुत लचीला. इस तरह&amp;nbsp;के एक&amp;nbsp;मामले&amp;nbsp;में&amp;nbsp;सेक्स&amp;nbsp;रैकेट&amp;nbsp;चलाने&amp;nbsp;वाली&amp;nbsp;सोनू&amp;nbsp;पंजाबन&amp;nbsp;छूट&amp;nbsp;चुकी&amp;nbsp;है. शिवेंद्र&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;छूट जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह नहीं है कि राजीव रंजन कितना दोषी है। सवाल यह है कि हम और आप कितने दोषी हैं जो ऐसे लोगों को पनपने देने का मौका देते हैं। ऐसे लोगों पर सरकार भी क्या नियन्त्रण लगाएगी जब जनता खुद ही लूटने के लिए&amp;nbsp;इनके&amp;nbsp;पास जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3829386994728698861?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3829386994728698861/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post_03.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3829386994728698861'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3829386994728698861'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post_03.html' title='हमारी आस्था और ये ढोंगी बाबा'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-8092490556042996103</id><published>2010-03-01T01:27:00.000+05:30</published><updated>2010-03-01T01:27:19.463+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>आप सभी ब्लॉगर बंधुओं की होली रंग भरी हो &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; शुभकामनाओं के साथ &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;शैलेश कुमार विजय &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-8092490556042996103?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/8092490556042996103/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8092490556042996103'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8092490556042996103'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title=''/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3352099990663204858</id><published>2010-02-17T01:43:00.002+05:30</published><updated>2010-02-17T01:47:20.781+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाम आतंकवाद'/><title type='text'>इन सिरफिरे माओवादियों को बेरहमी से कुचलना होगा</title><content type='html'>ये&amp;nbsp;सभ्य&amp;nbsp;&amp;nbsp;समाज में रहने लायक नहीं हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा में 14 ईस्टर्न फ्रंटियर रायफल्स के बेस कैंप पर माओवादियों ने हमला कर अपने रक्तपिपासु और&amp;nbsp;बर्बर&amp;nbsp;जमीर को ही साबित किया है। जिस तरह से इन वामपन्थी आतंकवादियों ने 24 जवानों को मार डाला और इनमें नौ को ज़िन्दा जला डाला इससे तो यही प्रमाणित होता है कि ये निश्चित तौर पर मानसिक और भावनात्मक रूप से पागल हो चुके हैं। आखिर शहीद हुए इन 24 जवानों ने इनका क्या बिगाड़ा था? ये जवान तो अपनी&amp;nbsp;ड्यूटी&amp;nbsp;कर रहे थे। इनका न तो किसी से दोस्ती थी और न ही दुश्मनी। दूसरी तरफ, इन जवानों की शहादत के लिए सीधे केन्द्र सरकार की ढुलमुल नीतियां ही जिम्मेदार हैं। केन्द्र सरकार अपने नफे-नुकसान को सामने रख कर इनके विरुद्ध कार्रवाई करना चाह रही है। कब तक इन इंसानी&amp;nbsp;भेरियों के भेंट चढ़ते रहेंगे हमारे जवान। इन पागलों के खिलाफ अब सख्त से सख्त कार्रवाई करना ही एकमात्र विकल्प है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोमवार को शाम 5.30 बजे&amp;nbsp;अर्धसैनिक&amp;nbsp;&amp;nbsp;बलों के कैंप पर कायरों की तरह जवानों पर हमला करने वाले ये कथित माओवादी या नक्सली किसी भी तरह से क्षमा या सहानुभूति के पात्र नहीं है। जो लोग इनसे सहानुभूति रखते हैं उन्हें न तो सभ्य समाज से मतलब है और न ही लोकतान्त्रिक मूल्यों में तनिक भी विश्वास है। उधर, माओवादी किशन ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा है कि यह चिदंबरम के ऑपरेशन ग्रीन हंट का जवाब है। किशन का जवाब कितना हास्यास्पद और बचकाना है। गृहमन्त्री चिदंबरम कोई अपना&amp;nbsp;व्यक्तिगत&amp;nbsp;मिशन नहीं चला रहे हैं। यह तो केन्द्र सरकार की कार्रवाई है। जो देश में आतंक फैलाने वाले किसी के भी विरुद्ध कार्रवाई कर देशवासियों को सुरक्षा का वातावरण मुहैया कराने के लिए जिम्मेदार है। ये माओवादी इससे पहले भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों और पुलिस वालों की जान ले चुके हैं। सोमवार का हमला&amp;nbsp;अक्षम्य&amp;nbsp;&amp;nbsp;है। क्योंकि ये जवान भी तो किसी के बेटे, भाई, पिता और पति हैं। क्या इन शहीद हुए जवानों के परिजन कभी इन्हें माफ कर सकते हैं। शायद कभी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने को तो ये माओवादी भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन, इन्हें किसी व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। जिन क्षेत्रों में ये सक्रिय हैं वहां के लोगों को आतंक के बल पर अपना समर्थक बनाए हुए हैं। लोगों से जबरदस्ती लेवी के रूप में धन की उगाही किस बात का संकेत है। लोगों पर अपना कथित कानून थोपना तालिबानी मानसिकता का ही तो द्योतक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, माओवाद या नक्सलवाद के ये कथित लंबरदार मूल उद्देश्यों से भटके हुए हैं। जिनका उद्देश्य महज धन उगाही, मारकाट और अपना काला कानून गरीबों पर थोपना भर है। नही तो नक्सली आन्दोलन आज अपने अंजाम को प्राप्त कर लिया होता है। क्योंकि, भू आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ नक्सली आन्दोलन इस तरह रक्तपिपासु आन्दोलन में तब्दील नही हो सकता था। कई वामपन्थी&amp;nbsp;पार्टियों&amp;nbsp;&amp;nbsp;ने इस तरह के खून खराबे को&amp;nbsp;बर्बर और घृणित बताया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रीय&amp;nbsp;संपत्ति&amp;nbsp;को नुकसान पहुंचाना और पुलिस से हथियार छिनने के पीछे इनका मकसद अपनी समानान्तर सत्ता कायम करना है। दरअसल, ये सिरफिरे वामपन्थी आतंकवादी इन गतिविधियों को करके जनता में अपना खौफ पैदा करते हैं। ताकि, लोग इनका विरोध न कर सकें। हालांकि, लोगों में अपनी इमेज बनाने और सहानुभूति हासिल करने के लिए बिहार के जहांनाबाद आदि क्षेत्रों में माओवादियों ने सड़क बनवाया है। तो बड़ी संख्या में रेलवे ट्रैक, पुल और सड़क तथा मोबाइल टावरों को ध्वस्त कर दिया है। इससे परेशानी तो आम जनता को ही होती है। सरकार इन बुनियादी सुविधाओं को जनता के पैसों से ही तो मुहैया कराती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, ये कथित माओवादी नेपाल की तरह यहां भी अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन, यह भूल जाते हैं कि भारत में लाल गलियारा का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। नेपाल से कन्याकुमारी तक&amp;nbsp;के&amp;nbsp;लाल गलियारा की सोच कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी। क्योंकि, भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियां नेपाल से भिन्न हैं। रही बात नेपाल की तो वहां राजा ज्ञानेन्द्र अपनी करनी से ही पदच्युत हुए हैं। यदि पूर्व राजा विरेन्द्र विक्रम रहे होते तो माओवादी नेपाल में भी कभी सिर नहीं उठा पाते। फिलहाल, नेपाल के माओवादी जिस तरह सत्ता में वापसी के लिए बौखला रहे हैं उसी तरह भारत में भी कुछ कुंठित माओवादी सत्ता सुख भोगना चाहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक पाटिüयां क्षेत्रीय आकांक्षाओं से ऊपर उठ कर इन रक्तपिपासु, सिरफिरे और कुंठित कथित माओवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में केन्द्र सरकार का सहयोग करें। दूसरी तरफ, केन्द्र सरकार को संविधान में यह अधिकार प्राप्त है कि देश की अखण्डता और देशवासियों को भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के लिए कोई भी कदम उठाए। माओवादियों के खिलाफ&amp;nbsp;सख्त कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार को अब राज्य सरकारों का भरोसा छोड़ना होगा। क्योंकि, अब पानी सिर से ऊपर उठ चुका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3352099990663204858?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3352099990663204858/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3352099990663204858'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3352099990663204858'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html' title='इन सिरफिरे माओवादियों को बेरहमी से कुचलना होगा'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-7068267438080016491</id><published>2010-02-12T01:17:00.000+05:30</published><updated>2010-02-12T01:17:30.953+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तुष्टिकरण'/><title type='text'>गृहमन्त्री जी कश्मीरी पण्डितों को वापसी का प्रस्ताव कब देंगे?</title><content type='html'>&lt;br /&gt;अपने ही देश में शरणार्थी बने हैं कश्मीरी पण्डित &lt;br /&gt;कांग्रेस का समर्थन परंपरागत तुष्टिकरण का ही नीति है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर के मुख्यमन्त्री उमर अब्दुल्ला के पाक अधिकृत कश्मीर गए युवाओं के वापस आने और उनके पुनर्वास और समर्पण के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार की सहमति मिलना कांग्रेस की परंपरागत तुष्टिकरण नीतियों का ही परिचायक है। अचानक आए इस वक्तव्य से केन्द्र और राज्य सरकार की नीयत पर&amp;nbsp;प्रश्नचिंह&amp;nbsp;उठना स्वाभाविक है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के एक मन्त्री तक ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है। हालांकि,&amp;nbsp;मुख्य&amp;nbsp;विपक्षी दल भाजपा ने इस प्रस्ताव का तीव्र विरोध कर विपक्षी दल के धर्म का निर्वाह कर दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी किस दमदार तरीके से केन्द्र और राज्य सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध करती है। जो लोग पाकिस्तान या पीओके गए हैं उनकी पूरी छानबीन कर यह जानने की कभी कोशिश की गई है कि वे लोग वहां क्या कर रहे हैं? भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वालों को पुनर्वास नहीं उन्हें सजा-ए-मौत मिलनी चाहिए। ताकि, दूसरे कथित तौर पर भटके युवाओं को सीख मिले। क्या केन्द्र और राज्य सरकार देशवासियों को यह निश्चित आश्वासन दे पाएंगी कि वे युवक फिर से नहीं भटकेंगे? यदि फिर से भटकते हैं या उनके साथ दूसरे तरीके से घुसपैठ होती है तो इसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही किसकी होगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, राज्य के विकास का सब्जबाग दिखाने वाले मुख्यमन्त्री उमर ने कश्मीरी पण्डितों के राज्य में वापसी के लिए अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं दिया और नहीं पण्डितों को यह भरोसा ही दिलाया कि यदि वे वापस लौटते हैं तो राज्य में उनको पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी। वहीं केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार ही अपनी दूसरी पारी में इस सम्बंध में कुछ करती नहीं दिख रही है। ऐसे में देशद्रोह कर पाकिस्तान गए और वहां से भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने वाले लोगों और युवाओं के पुनर्वास और समर्पण का पुरजोर समर्थन करना केन्द्र की मंशा तुष्टिकरण से ज्यादा कुछ नहीं लगती। लाखों कश्मीरी पण्डित अपनी जमीन जायदाद और संपत्ति&amp;nbsp;छोड़कर आज देश के कई शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। उनकी सुधी लेने की न तो फुरसत कांग्रेस की केन्द्र सरकार को है और नही कांग्रेस की समर्थन से चल रही जम्मू-कश्मीर सरकार को है। क्या कश्मीरी पण्डितों को अपने पूर्वजों के राज्य में रहने का सपना पूरा नहीं होना चाहिए। अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी से उखड़ने का दर्द क्या होता है इसे जानना हो तो कश्मीरी पण्डितों के शरणार्थी शिविरों में जाकर देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या देश के प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री और कश्मीर के मुख्यमन्त्री उमर अब्दुल्ला ने कभी उन पण्डितों से मिलकर उनके दुखदर्द को जानने की कोशिश की? सरकारों ने उनकी समस्याओं को जानने के लिए कभी पहल ही नहीं कीं। क्या इसकी वजह यही है कि वे लोग हिन्दू हैं? जो अपने ही देश में शरणार्थी बने हैं। आज भी वे अपने राज्य में वापस लौटने का इन्तजार कर रहे हैं। कई तो इसी इन्तजार में कालकवलित हो गए। लेकिन, केन्द्र सरकार को उनकी खोज खबर लेने की कोई जरूरत ही महसूस नहीं होती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कितना अफसोसनाक है कि जो लोग आतंकवादियों से मिलकर देश को तबाह करने की कोशिश में लगे हैं। हजारों निर्दोषों का खून बहा चुके हैं, उनकी पुनर्वास की बात की जा रही है। उन्हें भटका हुआ युवक बताया जा रहा है। राज्य का मुख्यमन्त्री उन्हें आम माफी दिलाने की वकालत करता है। लेकिन, मुख्यमन्त्री को बेगुनाह लोगों की कोई चिन्ता नहीं है जो शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं। उनकी गलती बस इतना ही है कि वे कश्मीर के हिन्दू हैं जिनका इतिहास गौरवशाली रहा है। जो वास्तव में वहां के&amp;nbsp;अर्थात&amp;nbsp;&amp;nbsp;जम्मू-कश्मीर के मूल बाशिन्दे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ज्यादा दुख तो इस बात का है कि कोई भी दल इन कश्मीरी पण्डितों की बात नहीं करता। कोई भी दल अपने घोषणापत्र में इनके पुनर्वास की बात नहीं उठाता। गृहमन्त्री पी. चिदंबरम को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। जिस जल्दबाजी में उन्होंने उमर अब्दुल्ला का समर्थन किया है, उसी के साथ गृहमन्त्री को मुख्यमन्त्री से पूछना चाहिए था कि इन पण्डितों के पुनर्वास के लिए सरकार क्या कर रही है। राज्य सरकार इनकी वापसी के लिए अबतक कौन-कौन से कदम उठाई है? यदि नहीं उठाई है तो क्यों? क्या यह हिम्मत गृहमन्त्री पी. चिदंबरम दिखा पाएंगे? इस सवाल का जवाब कश्मीरी पण्डितों के साथ सभी देशवासियों को है। &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-7068267438080016491?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/7068267438080016491/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/02/blog-post_12.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7068267438080016491'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7068267438080016491'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/02/blog-post_12.html' title='गृहमन्त्री जी कश्मीरी पण्डितों को वापसी का प्रस्ताव कब देंगे?'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-1860111118780738797</id><published>2010-02-09T02:06:00.000+05:30</published><updated>2010-02-09T02:06:21.318+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्षुद्र राजनीती'/><title type='text'>राहुल का मुम्बई दौरा बचकाना जिद से ज्यादा कुछ नहीं था</title><content type='html'>&lt;br /&gt;देश में बढ़ता भाषाई नफरत कांग्रेस की ही देन है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवसेना शाहरुख विवाद के पीछे की राजनीति को समझना होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों राहुल गांधी के महाराष्ट्र दौरे को मीडिया में जमकर बेचा गया। मानो राहुल गांधी महाराष्ट्र का दौरा कर उत्तर भारतीयों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान कर आए हों या यों कहें कि वहां सांप्रदायिक सौहार्द की नींव ही मजबूत कर आए हों। पांच फरवरी को पूरे चार घंटे तक और उसके बाद भी मीडिया के पास राहुल दौरा के अलावा कोई दूसरा समाचार ही नहीं था। क्या राहुल का मुम्बई दौरा वास्तव में उल्लेखनीय था? क्या इससे महाराष्ट्र की जनता को कुछ हासिल हो पाया? अथवा महाराष्ट्र में राज ठाकरे और शिव सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा सताए जा रहे लोगों के&amp;nbsp;जख्म&amp;nbsp;पर थोड़ा बहुत भी मरहम लग पाया? सच तो यह है कि राहुल का दौरा छोटे बच्चों के जिद के अलावा और कुछ था ही नहीं। उनके दौरे से सरकारी काम काज ही प्रभावित हुआ। क्योंकि, प्रदेश के मुख्यमन्त्री सहित पूरा प्रशासनिक अमला राहुल के सुरक्षा में ही लगा रहा। इससे आम आदमी को हुई परेशानी का किसे एहसास है? क्या कांग्रेस की प्रदेश सरकार और राहुल गांधी यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके दौरे के बाद वहां उत्तर भारतीयों पर हमले नहीं होंगे? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है क्योंकि, राज ठाकरे भी तो कांग्रेस के मूक समर्थन से&amp;nbsp;पुष्पित&amp;nbsp;पल्लवित हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हो रहे हमलों के लिए शुद्ध रूप से कांग्रेस की&amp;nbsp;अदूरदर्शी&amp;nbsp;नीतियां ही जिम्मेदार&amp;nbsp;हैं। दरअसल, नेहरू जी ने भाषा को राज्यों के गठन का आधार मान कर भविष्य के लिए विष वृक्ष लगा दिया था। जिसका जहरीला फल आज भी महाराष्ट्र सरीखे अन्य राज्यों में हिन्दी भाषियों को खाना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में दो दशक से कांग्रेस की सरकार है और इन्हीं दो दशकों में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों के निवासियों पर वहां हमले किए गए। कांग्रेस राज की पुलिस तमाशबीन की तरह उत्तर भारतीयों को पीटते देखती रही। लेकिन, कार्रवाई के नाम पर केवल मीडिया में बयान जारी करके सरकार ने अपना&amp;nbsp;कर्त्तव्य&amp;nbsp;पूरा कर लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह से राहुल गांधी के दौरे को लेकर फुलप्रुफ सुरक्षा व्यवस्था खड़ा किया गया था यदि इसके थोड़े हिस्से को भी उत्तर भारतीयों के सुरक्षा में लगा दिया गया होता तो उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग नहीं पीटे गए होते और न ही राज ठाकरे के गुण्डों को अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का मौका मिला होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, शाहरुख खान ने भी क्या सामयिक मौका तलाशा। उनकी फिल्म जल्द ही रिलीज होने वाली है। उस फिल्म के प्रचार के लिए कितना शानदार मुद्दा तलाश लिया। क्रिकेट के बहाने ही उन्होंने बयान देकर उस पर प्रतिक्रिया के लिए शिव सेना को प्रेरित किया। महाराष्ट्र में जो कुछ भी बवाल हुआ वह सब उनकी गैर मौजूदगी में ही हुआ। उनके स्वदेश लौटते ही सारा विवाद शान्त हो गया। दोनों तरफ से कोई&amp;nbsp;उत्तेजक&amp;nbsp;बयान नहीं आए। पर्दे के पीछे कहीं कोई और बात तो नहीं छिपी है! इस राज को समझना कोई कठिन नहीं है। शाहरुख खान और बाल ठाकरे दोनों ही कलाकार हैं। फर्क इतना ही है कि बाल ठाकरे आज राजनीति के शीर्ष से ढलान पर आ गए हैं जबकि, शाहरुख फिल्मी दुनिया के शीर्ष पर अभी भी काबिज हैं। शाहरुख जानते हैं कि कौन सी चाल उनकी फिल्म के लिए रामबाण हो सकती है। और यही हुआ बैठे बिठाए ही उनकी नई फिल्म का जमकर प्रमोशन हो गया। रिलीज होने से पहले ही उनकी फिल्म सुर्खियां बटोर चुकी है। खबरों के मुताबिक पाकिस्तान में उनकी फिल्म का अवैध सीडी कारोबार लगभग एक अरब केआसपास पहुंच गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, ठाकरे परिवार को उनकी औकात बताने के लिए राहुल गांधी को मुम्बई जाना पड़ाता है। क्या यह केवल ठाकरे के बयान से उपजा विवाद भर ही है या बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव की राहुल की तैयारी है। क्या कांग्रेस की दोहरी चाल को लोग नही समझ पा रहे हैं? उस समय राहुल कहां थे जब बिहार और उत्तरप्र देश के छात्र मुम्बई रेलवे स्टेशन पर दौड़ा दौड़ा क र पीटे जा रहे थे। उसे समय राहुल राज ठाकरे को औकात बताने क्यों नहीं गए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-1860111118780738797?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/1860111118780738797/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1860111118780738797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1860111118780738797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='राहुल का मुम्बई दौरा बचकाना जिद से ज्यादा कुछ नहीं था'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-7412857623324799269</id><published>2010-01-29T01:27:00.000+05:30</published><updated>2010-01-29T01:27:40.954+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हैवानियत'/><title type='text'>महानगरों में कम होते जिन्दगी के मायने</title><content type='html'>बात-बात पर जान लेने से पीछे नहीं हट रहे दिल्ली वाले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है दिल्ली सरीखे महानगरों में रहने लोग मानवीय संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि, छोटी-छोटी बातों पर भी लोग एक दूसरे की जान लेने से नहीं चूक रहे हैं। लोगों का गुस्सा और तनाव तो आदिम युग की बर्बरता की कहानियों को ताजा करने लगा है। क्या महानगरों में जिन्दगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? दिल्ली की यह खबर तो शायद कुछ इसी तरफ ही इशारा करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिन देश की राजधानी में एक युवक की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह कुछ लोगों को अपने घर के सामने लघुशंका करने से मना कर रहा था। समाचारों के अनुसार मृत युवक के घर के सामने ही एक फैक्टरी है। वहां काम करने वाले मजदूर और अन्य कर्मचारी अक्सर उसके घर के सामने लघुशंका करते थे। घटना के दिन फैक्टरी मालिक अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पी रखा था। इसके बाद फैक्टरी मालिक अपने दोस्तों के साथ युवक के घर के सामने पेशाब करने लगा। जिस पर युवक ने मना किया तो उसने अपने दोस्तों और कर्मचारियों के साथ मिलकर उसे इतना पीटा कि वह युवक दम ही तोड़ दिया। हालांकि, पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फैक्टरी मालिक को गिरफ्तार कर लिया और अन्य की तलाश कर रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। सवाल इस बात का है कि दिल्ली हमारे देश की राजधानी है। ऐसे में यहां रहने वाले लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हों तो इससे शर्मिन्दगी और अधिक क्या हो सकती है? यह सच है कि एक या दो घटनाओं से पूरे महानगर को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है यह भी सच है कि जो लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं उनकी शैक्षणिक और सामाजिक स्तर दोयम&amp;nbsp;दर्जे&amp;nbsp;की है। लेकिन, इससे दिल्ली वालों के व्यवहार की पैरोकारी नहीं की जा सकती। क्योंकि, ऐसा देखने में आता है कि दिल्ली में पले बढ़े युवक सड़क पर खुद ही गलत दिशा में चलते हैं और आपकी गाड़ी में टक्कर भी मारेंगे और आपकी न केवल पिटाई करेंगे बल्कि जान भी लेने से नहीं चूकते हैं। ये युवक अपने आप को काफी शिक्षित और स्मार्ट मानते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में छोटमोटी बातों पर लोग हत्या करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है एक युवक की हत्या महज बीस रुपये के लिए कर दी गई। इस तरह की लगभग दर्जन भर घटनाएं हैं जिसमें छोटी-छोटी बातों के लिए कत्ल कर देने की घटनाएं प्रकाश में आईं हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ 31 दिसम्बर की रात जब पूरी दुनिया नए वर्ष के आगमन की खुशियां मना रही है तो दिल्ली में पान गुटका बेचकर अपनी जीविका चला रहे किशोर की दूसरे किशोर ने इस लिए हत्या कर दी कि उसके पास ठण्ड से बचने के लिए कुछ नहीं था। मृतक किशोर उसी दिन नया कंबल खरीद कर लाया था लेकिन उसे कंबल नसीब नहीं हो सका। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बातें मानवीय सोच की संकीर्ण होते दायरे को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आज हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। यदि गलत दिशा में जा रहा है तो इसके लिए हम आप क्या कर रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली की उपरोक्त घटनाओं के लिए क्या वहीं&amp;nbsp;जिम्मेदार&amp;nbsp;&amp;nbsp;हैं जो इन घटनाओं को अंजाम दिए हैं? क्या हमारा समाज इसके लिए कम दोषी है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-7412857623324799269?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/7412857623324799269/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/blog-post_29.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7412857623324799269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7412857623324799269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/blog-post_29.html' title='महानगरों में कम होते जिन्दगी के मायने'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-1809214934468971510</id><published>2010-01-15T01:40:00.002+05:30</published><updated>2010-01-15T01:56:12.099+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीती'/><title type='text'>तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं?</title><content type='html'>उत्तरप्रदेश में सपा निश्चित तौर पर और कमजोर होगी&lt;br /&gt;अमर भी नुकसान में रहेंगें &lt;br /&gt;तो क्या अपने कुनबे के मोह में मुलायम सिंह यादव अमरसिंह के समाजवादी पार्टी के लिए किए गए योगदान को भूला देंगे? तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं?&amp;nbsp;या&amp;nbsp;कुछ&amp;nbsp;और&amp;nbsp;खेल है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;जिस सपा और उसके मुखिया मुलायम के लिए अमर सिंह को भारतीय राजनीति का दलाल तक कह दिया गया। क्या उन्हें भुला पाना मुलायम के लिए आसान है। बेशक, मुलायम के भाई रामगोपाल यादव आज अमर की औकातं की बात कर रहे हों और उनकी हैसियत गांव के प्रधानी का चुनाव जीतने भर भी नहीं आंक रहे हों। लेकिन, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि अमर सिंह ने ही सपा को औद्योगिक घरानों से जोड़कर आर्थिक रूप से समृद्ध किया। क्योंकि, सरकार चलाने के बाद भी सपा की माली हालत ठीक नहीं थी। अमर सिंह ने जिस भाई-भतीजावादी मुद्दे पर पार्टी से बगावती तेवर अपनाया है वह भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत है। वैसे मुलायम और अमर को एक दूसरे की जरूरत है। अलग होने&amp;nbsp;से मुलायम और अमर दोनों को नुकसान ही होगा। &lt;br /&gt;हालांकि, अमर सिंह के लिए मुलायम ने पार्टी के कई संस्थापक सिपहसलारों को खोया है। लेकिन लोहिया के समाजवाद की बात करने वाले मुलायम जिस तरह से अपने कुनबे के मोह में फंसते जा रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के जनाधार को और कमजोर ही करेगा। केवल जातिवाद और मुस्लिमप्रस्त राजनीति करके सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। आज यादव और मुस्लिमों की पार्टी की छवि से बाहर निकल कर सपा समाज के लगभग सभी&amp;nbsp;वर्गों&amp;nbsp;में पैठ बना रही है तो इसके पीछे निश्चित तौर पर अमरसिंह का ही हाथ है। अमरसिंह ने सपा से न केवल राजपूतों को जोड़ा बल्कि अन्य सवर्ण जातियों को भी सपा में खींच लाने में कामयाबी हासिल की। जब भाजपा को ही उत्तरप्रदेश में सभी सवर्ण जातियां अपना दल मानती थीं वैसे माहौल में अमर सिंह ने क्षत्रियों और अन्य को सपा से जोड़कर भाजपा को कमजोर किया था। यही वजह है कि आज भाजपा उत्तरप्रदेश में चौथे स्थान पर पहुंच गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ आज भी अमर सिंह की दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय स्तर पर मुलायम और उनके प्रोफेसर भाई से ज्यादा स्वीकार्यता है। विदेशी नेताओं से भी अमर के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम को असरदार बनाने में अमर सिंह का अहम योगदान रहा है। आज भी राष्ट्रीय राजनीति में अमर सिंह का लगभग सभी दलों के नेताओं से अच्छा संबंध है। अमर सिंह ने मुलायम और पार्टी को आगे बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान दिया है। और रामगोपाल और अखिलेश की छवि महज यह है कि दोनों मुलायम के भाई और पुत्र हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपा से औद्योगिक घरानों और फिल्मी कलाकारों को जोड़ने का काम अमर सिंह ने ही किया था। जब मुलायम सिंह पिछली बार मुख्यमंत्री&amp;nbsp;बने थे तो इसके पीछे भी अमर का ही अमर हाथ था। उस समय सरकार बनने के बाद उत्तरप्रदेश विकास परिषद का गठन कराकर मुलायम सरकार को आर्थिक मजबूती प्रदान किया था। जिसके बल पर ही मुलायम तमाम योजनाएं चला सके थे। हालांकि, फिल्मी कलाकारों से सपा को कोई खास लाभ तो नहीं मिला लेकिन इनके जुड़ने से पार्टी की स्वीकार्यता तो बढ़ी ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, अमर के आने से पहले जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय उन्हें यादव और मुसलमानों के अलावा दलितों का भी पर्याप्त समर्थन मिला था। मुलायम की पिछड़ों, अल्पसंख्यकों&amp;nbsp;और दलितों के नेता की छवि बनी थी। समाज के इन वर्गों में उनकी स्वीकार्यता भी थी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, मायावती के&amp;nbsp;उत्थान&amp;nbsp;के बाद तो दलितों ने न केवल मुलायम और सपा से कन्नी काट लिया बल्कि मुसलमान भी मुलायम का साथ छोड़ने लगे थे, कुछ जुड़े भी थे तो वह आजम और राजब्बर व दूसरे मुस्लिम नेताओं के चलते और कांग्रेस की कमजोर स्थिति और भाजपा को रोकने के लिए ही। लेकिन, अमर सिंह के सपा में अवतार के बाद से राजपूतों का झुकाव सपा की तरफ हुआ और उन्होंने दलितों की रिक्ति को कम करके सपा को मजबूत किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अमर सिंह जिस मुद्दे को लेकर पार्टी से नाता तोड़ने वाले हैं वह मुद्दा स्वागत योग्य है। हालांकि पर्दे के पीछे और मुद्दे हैं जो दिखाई नहीं पड़ते। अगर अमर सिंह मुलायम के कुनबे के बढ़ते दबदबे का विरोध कर रहे हैं तो यह सही कदम है। कोई भी पार्टी एक व्यक्ति&amp;nbsp;की पारिवारिक पार्टी नहीं हो सकती है। लेकिन, भारतीय राजनीति का यह&amp;nbsp;दुर्भाग्य&amp;nbsp;है कि भारतीय जनता पार्टी और वामदलों को छोड़कर कांग्रेस सहित तमाम छोटे-बड़े दल भाई भतीजावाद और कुनबाई मानसिकता से ग्रसित हैं। इन दलों में सभी महत्वपूर्ण पदों पर एक ही परिवार के सदस्य या उनके दूर तक के रिश्तेदार काबिज हैं। ऐसे में अमर सिंह का मुलायम के भाई, पुत्र और बहू के मोह का विरोध करना और पार्टी तक छोड़ने की बात कहना सुकून पहुंचाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ मुलायम का दौर अब अस्ताचल की ओर जा रहा है। अब उनकी, पार्टी में अंतिम राय नहीं हो सकती। अपने कुनबे के सामने झुकना उनकी मजबूरी होगी। यदि रामगोपाल और अखिलेश अमर के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं मुलायम का ही हाथ है। लेकिन रामगोपाल और अखिलेश यादव को यह याद रखना होगा कि अमर के जाते ही सपा और कमजोर होगी। अमर के चलते जो लोग सपा से जुड़े थे वे लोग भी बॉय बोलने में देर नहीं लगाएंगे और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा और उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा फिर कभी मजबूत नहीं हो सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-1809214934468971510?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/1809214934468971510/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1809214934468971510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1809214934468971510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html' title='तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं?'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-7701531572940598895</id><published>2010-01-11T01:32:00.002+05:30</published><updated>2010-01-11T01:48:17.528+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अफ़सोस'/><title type='text'>क्यों जाते हैं भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया</title><content type='html'>अभी नितिन गर्ग की चिता की आग&amp;nbsp;ठंडी&amp;nbsp;भी नहीं हुई थी कि ऑस्टे्रलिया में फिर एक भारतीय युवक जसप्रीत सिंह (29) को निशाना बनाया गया। इस बार ऑस्ट्रेलियाइयों ने तो सारी हदें पार करते हुए उस युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया। इस हमले में वह 20 फीसदी तक जल गया। इस कृत्य को ऑस्ट्रेलिया सरकार की विफलता माना जाए या वहां के निवासियों की दरिंदगी अथवा इसे ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता और संस्कृति ही मान लिया जाए। यह एक बहस का मुद्दा है। वर्ष 2009 में भारतीय छात्रों पर हमले की करीब 100 घटनाएं हो चुकी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इसके लिए भारत की केंद्र सरकार और भारतीय छात्र जिम्मेदार नहीं हैं? अव्वल तो भारतीय छात्रों को ऐसे नस्लीय देशों में जाना ही नहीं चाहिए। जहां के नागरिकों में इंसानियत से कोई सरोकार ही नहीं है। जो छात्र लाखों खर्च करके ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उससे कम पैसे में भारत में भी वही शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। अपने देश में भी मेडिकल, आईटी और प्रबंधन की पढ़ाई विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से तनिक भी कम नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि विदेशों से शिक्षा ग्रहण कर लौटे छात्रों को कंपनियां यहां हाथों-हाथ लेती हैं या उनमें अतिरिक्त पेशेवराना कौशल होता है। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विदेश में जाकर पढ़ाई करने के पीछे कुछ छात्र और उनके परिवार दिखावे की ग्रंथी से भी प्रेरित होते हैं। लेकिन, अधिकांश छात्र भारत की आईटी, प्रबंधन और मेडिकल संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था की मार से ही विदेशों में जाने को विवश हैं और अपनी जान गवां रहे हैं। चूँकि यहां इन संस्थानों में कोटा निर्धारित है। जिससे बहुत से छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाना पड़ता है। यदि सरकार भारी संख्या&amp;nbsp;में उच्च शिक्षण संस्थान देश के हर कोने में खेल देती तो यहां के छात्र विदेशों में अपमानित और हमले के शिकार नहीं होते। दूसरे अपने देश का पैसा विदेशों में नहीं जाता। दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी सरकार चलाने के अलावा इस ओर सोचने का मौका ही नहीं मिलता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत को आजादी मिलने से कुछ साल पहले ही जापान को बर्बाद कर दिया गया था लेकिन आज वही जापान भारत और विश्व के अन्य देशों से विकास और अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में दशकों आगे है। इसके पीछे उनकी ईमानदार और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है। ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करना अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन पढ़ाई के साथ सुरक्षा कारणों को भी ध्यान रखना होगा। ऑस्ट्रेलिया से बेहतर पढ़ाई न्यूजीलैंड, शिंगापुर, मॉरिशस सहित कई दूसरे पश्चिमी देशों में होती है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में बीजा नियमों में ढील दी जाती है इसलिए भी भारतीय सहित अन्य दूसरे देशों के छात्र वहां जाकर पढ़ाई करना पसंद करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक दूसरे देशों से आने वाले छात्र ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में 13 अरब डॉलर का योगदान देते हैं। लगातार हो रहे हमलों से आने वाले समय में भारतीय छात्रों की ऑस्ट्रेलिया जाने की दर पचास फीसदी तक कम होगी। जिससे ऑस्ट्रेलिया को करीब 7 करोड़ डालर का नुकसान होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेशों में भारतीयों की दुर्दशा के लिए भारत सरकार भी कम दोषी नहीं है। जब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर छोटे-मोटे हमले हो रहे थे तो उस समय हमारी सरकार सोई हुई थी। यदि उस दौरान ही सरकार कड़ा रुख अपनाती तो शायद आज कई घरों का चिराग बूझने से बच गया होता। लेकिन यह तो भारत की सरकार है जब समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है तब उसकी तंद्रा टूटती है। छात्रों पर हमले होते रहे हमारे देश के नेता जी लोग चुप रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर भारतीय छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करते हैं या टैक्सी चलाते हैं। छात्रों की अक्सर वहां&amp;nbsp;टैçक्सयों को निशाना बनाया जाता रहा है। यही नहीं वे कंपनियों में वहां के स्थानीय युवकों की अपेक्षा कम पैसे में काम करने को तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि कंपनियां भारतीय छात्रों को ज्यादा पसंद करती हैं। दूसरे भारतीय छात्र अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं। जबकि, ऑस्ट्रेलियाई छात्रों में यह गुण कम पाया जाता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई युवक भारतीयों से जलते हैं। उनको लगता है कि भारतीय उनके अवसरों पर कब्ज कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हमारी सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने नागरिकों को वेहतर सुविधाएं और छात्रों को उच्च शिक्षण संसथान उपलब्ध कराए। ताकि विदेशों में जान गवांने या जान जाने की नौबत ही न आए।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-7701531572940598895?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/7701531572940598895/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7701531572940598895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7701531572940598895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='क्यों जाते हैं भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-4921441948867567416</id><published>2010-01-01T01:17:00.005+05:30</published><updated>2010-01-01T01:31:21.920+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>वर्ष 2010 आप सभी&amp;nbsp;ब्लॉगर&amp;nbsp;बंधुओं&amp;nbsp;के लिए सुख,समृद्धि और प्रगति का वाहक बने। जो गुजर गया वह आपका भाग्य था और आने वाला&amp;nbsp;कल आपका विश्वास है इसलिए वर्तमान को सुखद और शांतिमय बनाकर जीवन के पथ पर आप सभी अग्रसर हों....&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; हार्दिक&amp;nbsp;&amp;nbsp;शुभकामनाओं&amp;nbsp;सहित &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br 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href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/4921441948867567416/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/2010.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4921441948867567416'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4921441948867567416'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2010/01/2010.html' title=''/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-6286080214752714358</id><published>2009-12-07T01:17:00.000+05:30</published><updated>2009-12-07T01:17:45.644+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शर्मनाक'/><title type='text'>केंद्र की नाकामियों और महंगाई पर क्यों मौन है मीडिया ?</title><content type='html'>भारतीय मीडिया का&amp;nbsp;दोहरा चरित्र&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;एक बार प्याज महंगी हुई तो भाजपा की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। आज ऐसा कोई भी खाद्यान्न या सब्जी नहीं है जिसे सस्ता कहा जा सके। लेकिन, कहीं भी उन दिनों की महंगी प्याज की तरह आज की महंगाई की चर्चा नहीं होती। मीडिया वाले भी कभी कभार महंगाई की खबर ब्रेक कर अपनी लोकतांत्रिक छवि का साक्ष्य पेश कर देते हैं। क्या आज की वही मीडिया है जब भाजपा सत्ता में थी तो महंगी प्याज पर हायतौबा मचा रही थी? या क्या इसे मान लेना चाहिए कि मौजूदा दौर की मीडिया संस्थानों में कांग्रेस नीत सरकार का विरोध करने अथवा किसी समस्या पर घेरने का मादा ही नहीं है। या उन दिनों भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए गहरी साजिश थी। जो भी हो आज मीडिया की भूमिका साफ सुथरी नहीं मानी जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अटल जी के कार्यकाल में प्याज महंगी हो गई थी तो लोगों ने महंगाई पर जुमले और गाने तक बना डाले थे। उन दिनों यूपी और बिहार में एक गाना बड़ा गाया जाता था। अब का खईब सलाद हो अटल चाचा, पियजिया अनार हो गईल...। आज न केवल प्याज महंगी है बल्कि तमाम भोज्य पदार्थ महंगे हो चुके हैं। आज कोई नहीं कहता कि प्याज गरीबों के भोजन का अहम हिस्सा है। 20 रुपया किला प्याज, 40 किलो चीनी, 90 रुपया किलो अरहर की दाल और अन्य आवश्यक चीजों के दाम तो इस कांग्रेस की सरकार में ही बेहिसाब बढ़ रहे हैं। सरकार के मंत्री और रणनीतिकार हाथ खड़े कर चुके हैं। एक रटा रटाया सा जवाब आ जाता है कि जमाखोरी से महंगाई बढ़ रही है। मीडिया भी इसे तूल देने से बच रही है। क्या अटल सरकार के कार्यकाल में प्याज की जमाखोरी नहीं हुई थी। उस दौरान तो एक नीति के तहत जमाखोरी कराई गई थी। अटल सरकार के विरुद्ध मीडिया में माहौल पैदा कराया गया था। क्योंकि सरकार मीडिया के आकाओं को तृप्त नहीं कर पा रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज एक औसत आमदनी का आम आदमी किसी तरह अपनी जिंदगी इस महंगाई के दौर में ढो रहा है। उसे बयां करना आसान नहीं है। लोगों को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ रहा है। हर जरूरतों में कटौती कर किसी तरह काम चलाने की नीति अपना कर लोग गुजारा करने पर मजबूर हैं। लेकिन, इसकी मीडिया संस्थानों को इसकी भनक नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अटल सरकार की पैरोकारी करना अथवा बीजेपी की तरफदारी करना मेरा मकसद नहीं है। बीजेपी से मेरा दूर तक कुछ लेना देना नहीं है। और नही मीडिया को किसी पार्टी विशेष से जोड़ने का आशय है। लेकिन यह सच्चाई है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों की छोटी सी गलतियों को भी तिल का ताड़ बना कर पेश किया जाता है। मानों भाजपा की सरकारें देश की सबसे बड़ी शत्रु हैं। अभी दूर जाने की जरूरत नहीं है भाजपा का कर्नाटक संकट पर जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कवरेज किया उसे पत्रकारिता का उच्च मानदंड तो नहीं कहा&amp;nbsp;जा सकता है। एक चैनल के संवाददाता (जो चैनल में राजनीतिक संपादक के पद पर हैं) जिनकी विशेषता है कि तीन वाक्य को दो शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, ने भाजपा संकट को कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस ने संकट को आंध्र में ही सुलझा लिया लेकिन भाजपा का कर्नाटक संकट दिल्ली तक पहुंचने के बाद भी नहीं सुलझ पा रहा है। अब आप बताएं दोनों पार्टियाँ&amp;nbsp;एक तरह से ही कार्य करने लगें तो क्या होगा। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के निर्णय को बदलने की किसी में हिम्मत&amp;nbsp;नहीं है। मतलब साफ है कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में ही आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। वहां सोनिया-राहुल के निर्णय को कोई चुनौती नहीं दे सकता यदि देता भी है तो उसे निश्चित तौर पर पार्टी से बाहर जाना होगा। वहीं भाजपा में कमोबेश अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। जिसका कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में संवाददाता का नजरिया कहां तक स्वस्थ है। आप किसी भी राजनीतिक पार्टी को दूसरे दल के नजरिये से नहीं देख सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अटल सरकार की कई महत्वपूर्ण और जनकल्याणकारी योजनाओं का मीडिया द्वारा नजरअंदाज किया गया। यही नहीं प्रदेशों में भाजपा की सरकारों द्वारा किए जा रहे तमाम लोक कल्याणकारी कार्यों&amp;nbsp;को महत्व नहीं मिल रहा है। गुजरात को ही लें वहां विकास के ढेरों कार्य कराए जा रहे हैं। लेकिन, उसकी चर्चा नहीं होती है। चर्चा जिस बात की होती है वह मोदी की नकारात्मक छवि की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री ए राजा की स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के बाद भी मीडिया द्वारा ज्यादा तूल नहीं दिया गया। केंद्र सरकार कितनी चालाकी से मधु कोड़ा का मामला उठा कर अपने मंत्री के स्कैंडल को फिलहाल दबाने में कामयाब हो गई तो इसका श्रेय कांग्रेस परस्त कुछ मीडिया संस्थानों को ही जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक उदात्त लोकतंत्र के लिए अदालतों और मीडिया का स्वतंत्र होना संजीवनी जैसा है। दुर्भाग्य&amp;nbsp;से देश में इस समय कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस की केंद्र सरकार की पिछलग्गू मालूम पड़ते हैं। मीडिया संस्थानों को आर्थिक हितों के लिए पत्रकारिता के मानदंडों से समझौता नहीं करना चाहिए तभी भारत का लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सकेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-6286080214752714358?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/6286080214752714358/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/6286080214752714358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/6286080214752714358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='केंद्र की नाकामियों और महंगाई पर क्यों मौन है मीडिया ?'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3149672579438313582</id><published>2009-11-03T00:59:00.002+05:30</published><updated>2009-11-03T01:03:57.296+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तमाचा'/><title type='text'>यह तो जेब काटने वाला कांग्रेसी हाथ है</title><content type='html'>डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर दिल्ली सरकार अपनी नाकामयाबी ढक रही है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली सरकार ने डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर एक बार फिर आम आदमी की जेब ढीली कर दी है। कांग्रेसी बड़े गर्व से कहते हैं कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। लेकिन यह हाथ जनकल्याण के लिए नहीं लोगों की जेब काटने के लिए लगता है। यह कैसा हाथ है जो मध्यम वर्ग और गरीबों का केवल कान ही ऐंठने का काम करता है। यही नहीं अगले साल से दिल्ली में पेयजल भी महंगा हो जाएगा। दिल्ली मेट्रो ने पहले ही किराया बढ़ाकर जन हितैषी होने का प्रमाण दे दिया है। अब तो मदर डेयरी के दुग्ध के दाम भी बढ़ गए हैं। बिजली भी महंगी हो गई है। ऐसे में आम आदमी अपना सिर पीटने के अलावा और क्या करे। शीला दीक्षित को एक बार फिर से मौका देने वाले दिल्ली वालों को उनकी सरकार का विरोध करने का भी हक नहीं बनता। कांग्रेस के कार्यकाल में चारों तरफ महंगाई ही महंगाई है। हालांकि, भाजपा सहित विरोधी दल महंगाई और बसों के किराया बढ़ाने का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन, एक हताश और थके हुए विपक्ष की बात कितनी सुनी जाएगी यह अंदाजा लगाना कठिन नही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किराया बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री&amp;nbsp;&amp;nbsp;ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उनके पास नोट छापने वाली मशीन नहीं है। क्या मुख्यमंत्री सरीखे शख्सियतों से यही उम्मीद&amp;nbsp;की जा सकती है? यह ठीक है कि सरकार की अपनी कुछ परेशानियां होती हैं। लेकिन अपनी नाकामयाबियों को छुपाने के लिए आप गरीबों और आम आदमी का गिरेबां तो नहीं पकड़ लेंगे। हर मर्ज के लिए बली का बकरा जनता को ही तो नहीं बनाया जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डीटीसी का घाटा किराया कम होने से नहीं हुआ है। बल्की निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुनियादी ढांचा का सही इस्तेमाल न होना है। डीटीसी में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार चरम पर है। दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्रालय और निगम की अदूरदर्शिता और लापरवाही से डीटीसी का दिवाला निकल गया है। अक्सर डीटीसी की बसें पीक ऑवर में भी डिपो से नहीं निकलती हैं। सुबह और शाम को ही डीटीसी की बसों को चलाया जाए तो कम से इतना घाटा तो नहीं होगा जितना प्रचारित किया जा रहा है। बसें चलती भी हैं तो चालक स्टैंडों पर बसें नहीं रोकते हैं। यदि रोक भी दें सवारियां भरने से पहले ही बसें भगा ले जाते हैं। यही नहीं डीटीसी के चालक बसों को ब्लू लाइन बसों के पीछे ले जाते हैं। ऐसे में सवारियां पहले ब्लू लाइन बसों में ही बैठ जाती हैं। दूसरे डीटीसी की बसों का कोई निर्धारित समय भी नहीं होता है कि लोग प्रतीक्षा कर सकें। पता चला कि आप बस की प्रतीक्षा ही करते रह गए और आपका समय&amp;nbsp;बर्बाद&amp;nbsp;&amp;nbsp;हो गया और बस आई भी नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं डीटीसी बसों के अधिकतर कंडक्टर एकदम से लालची होते हैं। चंद रुपयों के लिए उतरते वक्त सवारियों से टिकट ले लेते हैं और बाद में वही टिकट दूसरे यात्री को देकर पैसा अपने पास रख लेते हैं। अक्सर तो कम दूरी का टिकट भी नहीं देते हैं केवल पैसा ही ले लेते हैं। ऐसे में डीटीसी को घाटा नहीं तो क्या होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डीटीसी के पास प्रशिक्षित चालकों और परिचालकों की भारी कमी है। जो कर्मचारी हैं भी तो दूसरे गैर जरूरी कामों में लगाए गए हैं। कर्मचारियों की कमी से भी बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पाती हैं। जिससे सभी बसों का इस्तेमाल नहीं हो पाता। कुछ देर के लिए डीटीसी का किराया बढ़ाना मजबूरी मान भी लिया जाए तो ब्लू लाइन बसों का किराया बढ़ाने का क्या तुक है। ब्लू लाइन कंडक्टर पहले से ही कम दूरी की निर्धारित किराया से अधिक वसूलते हैं। उनकी तो बैठे-बिठाये&amp;nbsp;मौज हो गई। &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3149672579438313582?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3149672579438313582/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3149672579438313582'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3149672579438313582'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='यह तो जेब काटने वाला कांग्रेसी हाथ है'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3827690022946284047</id><published>2009-10-25T00:43:00.000+05:30</published><updated>2009-10-25T00:43:41.389+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जनादेश'/><title type='text'>यह कांग्रेस की जीत तो कतई नहीं है</title><content type='html'>विकल्पहीनता की स्थिति में जनता ने कांग्रेस को वोट दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन राज्यों की विधानसभा चुनाव में मिली जीत का श्रेय कांग्रेसियों और कुछ कांग्रेसप्रस्त मीडिया संस्थानों ने सोनिया और राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन को दिया है। जबकि, कुछ कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कुशल नीतियों को भी जीत का एक बड़ा कारण मानते हैं। वैसे, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत को एकदम से स्वीकार कर लेना पक्षपात होगा, क्योंकि, इन राज्यों में विपक्ष एकदम से दीशाहीनता और किंकर्तव्यबिमूढ़ता की स्थिति में रहा है। विपक्ष के पास जनता के भरोसे लायक कोई मुद्दा ही नहीं था। प्रचार अभियान के दौरान&amp;nbsp;पार्टियों&amp;nbsp;में आक्रामकता था ही नहीं। सभी दल थके और अवसादग्रस्त नजर आ रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;22 अक्टूबर को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे आ रहे थे वैसे-वैसे टीवी चैनलों के&amp;nbsp;रिपोर्टर&amp;nbsp;और चुनाव विश्लेषक अपने तरीके से जनता की भावनाओं का&amp;nbsp;ब्याख्या&amp;nbsp;कर रहे थे। कोई इसे कांग्रेस की नीतियों और स्थानीय कांग्रेसी सरकारों की जनकल्याणकारी कार्यों की जीत बता रहा था तो कोई देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के खात्मे की भविष्यवाणी कर रहा था। सबकी अपनी डफली अपना राग। मतलब सच्चाई से कोसों दूर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों को देखा जाए तो निर्विवाद रूप से जनता ने कांग्रेस को विकल्पहीनता की अवस्था में ही वोट दिया है। जनता विपक्षी&amp;nbsp;पार्टियों को भरोसे के लायक या कह कहना ज्यादा समीचीन जान पड़ता है कि जनता किसी भी विरोधी पार्टी को पांच साल तक सरकार चलाने लायक ही नहीं समझा। लोगों ने न तो सोनिया या राहुल की बातों को सुनकर वोट दिया और न ही प्रधानमंत्री के तथाकथित कुशल नेतृत्व को, बल्कि, जनता ने यह सोचकर कांग्रेस को वोट दिया कि अगले पांच सालों तक केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार रहेगी ऐसे में प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बनने पर प्रदेशवासियों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ जरूर मिलेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे स्पष्ट होता है कि जनता अभी भी राहुल सोनिया को अपना नेता नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से महाराष्ट्र और हरियाणा में भी कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला होता। मतदाताओं ने कांग्रेसी नारा आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ की हवा निकाल दी। हालांकि, अरूणांचल प्रदेश में कांग्रेस को जनता ने जरूर हाथों-हाथ लिया है। इसका कारण मात्र विपक्ष की अनुपस्थिति ही थी। वहां पर टीमएसी और एनसीपी को तो कांग्रेस का पार्टनर ही माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों पाटिüयां केंद्र सरकार में साझीदार हैं। रही बात भाजपा की तो वहां पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। कुछ सीटें भाजपा को मिलना महज संयोग ही कहा जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराष्ट्र और हरियाणा में अपने कार्यकाल में कांग्रेस की सरकारों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं तो उत्तरभारतियों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। पेयजल और बरसात में जलनिकासी की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई है। शहरी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो ग्रामीण इलाकों में लोगों की परेशानियां बढ़ी हैं। वहीं, हरियाणा में बिजली कटौती और पेयजल की किल्लत से लोगों का बुरा हाल है। हालात तो यह है कि प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था एकदम से चरमरा गई है। अर्थव्यवस्था का आधार कृषि के लिए राज्य सरकार ने कोई अलग से नीति घोषित नहीं की है। अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। यह अलग बात है कि भूपेंद्र ¨सह हुड्डा 40 साल में जैसा विकास नहीं हुआ वैसा विकास करने का दावा कर रहे हैं। जनता ने उनके इस दावे को पूरी तरह से नकार दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, इन प्रदेशों में विरोधी&amp;nbsp;पार्टियाँ&amp;nbsp;अपना प्रभाव जनता पर नहीं छोड़ पाईं हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष जनता में यह भरोसा ही पैदा नहीं कर पाया कि वह कांग्रेस से ज्यादे टिकाऊ और कल्याणकारी सरकार दे सकता है। विरोधी&amp;nbsp;पार्टियाँ अपनों से ही निपटने की रणनीति बनाती रह गईं। संबंधित राज्य सरकारों की खामियों को जनता के सामने&amp;nbsp;उम्दा&amp;nbsp;तरीके से विपक्ष पेश नहीं कर सका। महाराष्ट्र में शिवसेना राजठाकरे से बाहर निकल ही नहीं पाई तो भाजपा उद्धव राज के झगड़े को ही देखती ही रह गई। भाजपा विपक्ष का तेवर दिखा पाने में नाकाम रही। सरकार की तमाम गलतियों को जोरदार तरीके से भाजपा गठबंधन उठा पाने में असफल रहा। हरियाणा में अंत तक भाजपा गठबंधन को लेकर ही द्वंद्व में रही। यदि वहां चौटाला या भजनलाल की पार्टी से गठबंधन किया गया होता तो निश्चित तौर पर यह गठबंधन कामयाब रहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, जिस तरह से देश में कांग्रेस को सर्वमान्य पार्टी और सोनिया-राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता बनाने की कुछ मीडिया घरानों द्वारा माहौल तैयार किया जा रहा है। वह लोकतंत्र के लिए खतरनारक है। एक परिपक्व और स्थाई लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना बेहद जरूरी है। विपक्ष सरकार की गलत नीतियों को उठाकर जन कल्याण के लिए योजनाएं बनाने के लिए सरकार को बाध्य कर सकता है। लेकिन,&amp;nbsp;दुर्भाग्य&amp;nbsp;से इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी अंतर्कलह से गुजर रही है। देश की जनता भाजपा से यह उम्मीद करती है कि वह एक दमदार और आक्रामक विपक्ष के रूप में फिर से खड़ा हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3827690022946284047?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3827690022946284047/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3827690022946284047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3827690022946284047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html' title='यह कांग्रेस की जीत तो कतई नहीं है'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-9138110606721167611</id><published>2009-10-14T01:33:00.002+05:30</published><updated>2009-10-15T02:16:46.373+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ललकार'/><title type='text'>चीन को उसी के लहजे में जवाब देना होगा</title><content type='html'>&lt;br /&gt;ड्रैगन को ललकारे भारत&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;लगता है अब चीन भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य महत्वपूर्ण शख्सियतों का दौरा निर्धारित करेगा कि उन्हें अपने देश में कहां भ्रमण करना चाहिए और कहां नहीं। चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री द्वारा अरुणांचल प्रदेश का दौरा करने पर चीन ने जिस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त किया है वह संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के अखंडता पर सीधा चोट है। भारत को केवल गहरी नाराजगी जता कर ही संतोष नहीं कर लेना चाहिए। भारत जब तक कठोरता से और&amp;nbsp;&amp;nbsp; दोटूक जवाब नहीं देगा तब तक चीन इस तरह की ओछी हरकतें करता रहेगा। हालांकि, चीन के राजदूत को तलब किया गया है जो केवल रश्म अदायगी भर ही लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन की दुस्साहस अब हद से आगे बढ़ने लगी है। यदि भारत इसी तरह से रश्म अदायगी के लिए क्वगहरी नाराजगी जताता रहा तो चीन कल को उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत को विवादित जोन बताते हुए उस पर अपना हक जताने लगेगा। भारत का शीर्ष नेतृत्व सिर्फ नाराजगी जता कर ही रह जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का यह कहना कि चीन इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है, महज अपनी कमजोरी या दब्बूपन दिखाना है। चीन द्वारा कब्जा की गई जमीन को जब तक लेने के लिए कूटनीतिक प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक ऐसी हरकतें पड़ोसी देश करता रहेगा। अरुणांचल प्रदेश भारत का है उसके लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। वैसे भी अरुणांचल को हमारे प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में सूर्य का देश माना गया है। ऐसे में कोई कैसे कह देगा वह भारत का नहीं विवादित क्षेत्र है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, कुछ विदेशी ताकतों का यह षड्यंत्र है कि भारत को चौतरफा उलझा कर रखा जाए। यही वजह है कि नेपाल में भी माओवादियों की नेतृत्व वाली सरकार भारत को आंख तरेर रही थी। यदि भारत अपने पर आ जाए तो नेपाल का दाना-पानी भी बंद हो जाएगा। हालांकि, देश का नेतृत्व इस बात को समझता तो है लेकिन गंभीरता दिखाने में कोताही बरतता है। इससे काम नहीं चलने वाला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ चीन भारत पर टिप्पणी कर पूरे एशिया का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि, रूस को छोड़ दिया (रूस यूरेशिया के अंतर्गत आता है) जाए तो केवल भारत ही चीन को जवाब दे सकने की स्थिति में है। ऐसे में चीन के लिए यह जरूरी है कि भारत को फुफकारता रहे। यदि भारत सख्ती से ड्रैगन को ललकारे तो वह अपनी मांद में ही रहने को बाध्य हो जाएगा। चीन को अभी भी मुगालता है कि भारत की सैन्य क्षमता कम है। बेशक, चीन से ज्यादा नहीं तो किसी भी मामले में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कुछ अपवाद को छोड़कर) भारतीय रक्षा प्रणाली कमतर नहीं है। आज भारत हर मामले में चीन के बराबरी पर है। आईटी सेक्टर में तो भारत चीन से कई गुना आगे है। और यही बात चीन को चुभती है। इसी लिए वह पाकिस्तान और भारत विरोधी तत्वों को आगे कर परोक्ष वार कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;वैसे जिस तरह से सभी पार्टियाँ चीन की रवैये पर आक्रोश व्यक्त कर रही हैं। वह सुखद लगता है। केवल वाम दलों को लगता है कि अमेरिका भारत को चीन से लड़वाना चाहता है। यह उनकी चीन भक्ति का सबूत ही है। भारत में रह कर चीन की तरफदारी करने वाले वामपंथियों को अब सबक सिखाने का वक्त आ गया है। दरअसल, वामदलों को कभी भारतीयता पर विश्वास ही नहीं रहा, जनता इस बात को जितना जल्द समझ ले उतना ही देश के लिए अच्छा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ अब समय आ गया है कि भारत अपने विदेश नीति को दमदार और धारदार बनाए ताकि कोई अन्य देश आंख तरेरने की हिमाकत न कर पाए। लचीलेपन और दब्बूपन के चलते कभी-कभी कभार बांग्लादेश भी भारत को आंख दिखाने से बाज नहीं आ रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत को अपना पक्ष विश्व समुदाय के समक्ष काफी मजबूती से रखना होगा और यह बताना पड़ेगा कि भारत केवल शांति का ही पुजारी नहीं है वह गीता में भगवान कृष्ण के उस उपदेश का भी पालन करता है जिसमें उन्होंने कहा है कि, अर्जुन! यदि आप पर या आपके परिवार पर कोई आक्रमण करता है तो उसका जवाब देना धर्म के अनुकूल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत ने अब बहुत सहन कर लिया अब अधिक चुप रहना कमजोरी दर्शाना होगा। वैसे भी चीन क्या दुनिया का कोई भी देश भारत पर आक्रमण करने की मुर्खता नहीं करेगा। क्योंकि भारत के पास अब आत्मरक्षा करने और मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पर्याप्त क्षमता है। आवश्यकता है तो सिर्फ हमारे कमजोर नेतृत्व को आक्रामक और मजबूत होने का, और इसे हर देशवासी सिद्दत से इंतजार कर रहा है........ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-9138110606721167611?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/9138110606721167611/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/10/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/9138110606721167611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/9138110606721167611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/10/blog-post_14.html' title='चीन को उसी के लहजे में जवाब देना होगा'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-1368516763134987621</id><published>2009-10-04T00:55:00.002+05:30</published><updated>2010-03-21T01:44:45.695+05:30</updated><title type='text'>उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की....</title><content type='html'>&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की। हालांकि, वह शादीशुदा हैं और पिता भी बन चुके हैं, लेकिन अभी भी उनकी प्रेम पिपासा शांत नहीं हुई है, अलबत्ता दिन प्रति बढ़ती ही जा रही है। हर मामले में उनका अपना नजरिया है। इस मामले में भी वह अपने को सही ठहराते हैं। फिलवक्त वह मीडिया के क्षेत्र में अच्छी तरह से स्थापित हो चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मेरे आदरणीय मित्र और संबंधी हैं। मैं अबतक के कैरियर में जिन लोगों का&amp;nbsp;सम्मान&amp;nbsp;करता हूं वह उन सब में सबसे ऊपर हैं। उनके विजन पर ही मैं दो साल पहले दिल्ली आया था। फिलहाल, आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा हूं और मुझे विश्वास है कि मेरी कामयाबी में उनका बहुत बड़ा योगदान होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आप को कभी ना नहीं करेंगे। यही नहीं वह मौके पर आपको अपनी बातों से खुश कर देंगे बाद में आप भले ही उनकी बातों से सहमत न हों। वह ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे आप नाराजं हो सकते हैं, खुश हो सकते हैं लेकिन कभी उदासीन नहीं हो सकते। उनको झूठ बोलने से परहेज तो नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं कि किसी का कोई नुकसान हो जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी पत्नी सुशिक्षित और संस्कारों वाली हैं। वह मुझे हमेशा परिवार को साथ लेकर चलने का सुझाव देती हैं उनका कहना है कि आदमी पूरे परिवार के आशीर्वाद से ही आगे बढ़ सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम आते हैं असल मुद्दे पर पिछले दिन मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे कहा कि एक अदद प्रेमिका की उनकी तलाश पूरी नहीं हुई है। मैने जब कहा कि शादी के बाद प्रेम-ब्रेम या प्रेमिका के चक्कर में पड़ना ठीक नहीं है। तब उनका कहना था कि विश्व में जितने भी महान लोग हुए हैं उनके पीछे प्रेमिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसे में प्रेमिकाओं और प्रेम का होना कैरियर के लिहाज से बेहद जरूरी है। मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में बहुत ज्यादा दम है। यह भी संभव है कि बहुत सारे लोग उनसे सहमत हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्हें किस तरह का प्रेम चाहिए। कॉलेज या स्कूलों में पढ़ने वाले टीनएजेर्स का या चीनी कम वाले नायकं का। यह तो वही बताएंगे। लेकिन, मुझे नहीं लगता है कि उन्हें चीनी कम वाले नायक सा प्रेम और प्रेमिका चाहिए। आपको क्या लगता है जरूर बताएं.......।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-1368516763134987621?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/1368516763134987621/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1368516763134987621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/1368516763134987621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की....'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3603838540610061862</id><published>2009-09-21T01:25:00.001+05:30</published><updated>2009-09-21T01:29:35.998+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शर्मनाक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुखद'/><title type='text'>पोखरण-दो पर संदेह कहीं कुंठा तो नहीं!</title><content type='html'>राष्ट्र की छवि धूमिल करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल किसी भी बात को मीडिया में उछालने का नया ट्रेंड चल निकला है। लोग किसी भी मामले को सरेआम करने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं कर रहे हैं। भले ही वह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा स्वाभिमान से ही क्यों न जुड़ा हो। इस मुहिम में अपने को अभिजात और बौद्धिक वर्ग से कहने वाले लोगों की तादाद कुछ ज्यादा ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा, गौरव और अभिमान से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला परमाणु परीक्षण मीडिया और कुछ वैज्ञानिकों के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। जो आम देश वासियों के लिए तो स्वाभिमान का विषय है, लेकिन जिन वैज्ञानिकों पर सरकार ने लाखों रुपये खर्च किया उनके लिए यह झूठ और धोखे से ज्यादा कुछ नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ वैज्ञानिकों की मांग है कि इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मेरी मांग है कि जांच आयोग इसके लिए नहीं बैठाया जाना चाहिए कि 1998 का परमाणु परीक्षण सफल रहा या नहीं बल्कि इस मुद्दे को उछालने वालों की मंशा की जांच होनी चाहिए। इसके पीछे वे लोग क्या साबित करना चाहते हैं। कहीं अटल सरकार को कटघरे में खड़ा करने की साजिश तो नहीं है (हालांकि, इसकी संभावना कम ही दिखती है, क्योंकि प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी इस बहस को अनावश्यक बताया है।) अथवा भारतीय प्रतिभा को अतंराराष्ट्रीय समुदाय में नीचा दिखाने की गहरी और सोची-समझी चाल या फिर कुंठा! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1998 में जब अटल जी की सरकार ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों को दरकिनार कर पोखरण में परमाणु परीक्षण कराया था उस समय पूरे देश को इस पर गर्व हुआ था कि हमारे वैज्ञानिक भी कम प्रतिभावान नहीं हैं। हालांकि, उस समय भी देश-विदेश के कुछ लोगों को तकलीफ हुई थी कि भारत कैसे परमाणु संपन्नता में एक और कदम आगे बढ़ा लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1998 का परमाणु परीक्षण अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मानकों पर खरा उतरा या नहीं इसे तो वैज्ञानिक समुदाय ही बता सकता है। साधारण लोगों को इस बारे में कम जानकारी है। हालांकि, परमाणु ऊर्जा आयोग और वैज्ञानिकों ने इसे पूरी तरह सफल बताया है। मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने एक टीवी चैनल के साथ साक्षात्कार में इसे अनावश्यक बहस बताते हुए परीक्षण को सफल करार दिया है। यहीं नहीं, पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइलमैन एपीजे कलाम ने भी परमाणु परीक्षण को पूरी तरह से सफल बताया है। ऐसे में डीआरडीओ के पूर्व अधिकारी के.संथानम की बातों को ज्यादा महत्व देने की कोई वजह नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह भी उठता है कि परीक्षण के एक दशक बाद इसकी कामयाबी पर संदेह व्यक्त करना किस बात का संकेत है। के.संथानम अबतक कहां थे? उन्हें लगता है कि पोखरण-2 देश की सामरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता तो उन्हें पहले ही अपना मत प्रकट करना चाहिए था। अब जबकि, लगभग विश्व समुदाय भी पोखरण-2 दो को मान्यता दे चुका है। ऐसे में अपने ही देश में परीक्षण पर संदेह व्यक्त करना शर्मनाक है।&amp;nbsp;संथानम मीडिया के जरिए कहीं हाईलाइट होने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं। क्योंकि, इस प्रकरण से पहले तक तो उनका नाम भी बहुत कम लोग ही जानते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ मामले और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर बहस होनी ही नहीं चाहिए। कल को कोई कहने लगे कि भारत ने जितनी भी मिसाइलों का परीक्षण किया है उनकी क्षमता कम है तो क्या इसे मान लिया जाएगा?&amp;nbsp; ऐसे में तो हमारी सुरक्षा ही कमजोर होगी। परमाणु परीक्षण और सुरक्षा से संबंधित गोपनीयताओं पर तो बिल्कुल ही बहस की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि, इससे राष्ट्र की छवि तो प्रभावित होती ही है शत्रु देशों को मुगालता भी होने लगती है। पोखरण-2 की कामयाबी पर संदेह व्यक्त करना सीधे-सीधे वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करने की कोशिश है। इससे वैज्ञानिकों के मनोबल पर विपरीत असर पड़ सकता है। हालांकि, हमारे वैज्ञानिक चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं। उन पर असर नहीं होने वाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने की आजादी है। लेकिन, अपने देश में इस आजादी का कुछ लोग बेजा इस्तेमाल करते हैं। वैसे भी&amp;nbsp;अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से देश की प्रतिष्ठा धूमिल होती है तो इस पर सरकार को भी कड़े कदम उठाने चाहिए। मीडिया को भी किसी भी मुद्दे को उछालने से पहले राष्ट्रीयता को प्राथमिकता देनी चाहिए। ग्लोबल मीडिया बनने की चाहत से पहले आप भारतीय मीडिया कहलाना पसंद करें। अमेरिका और ब्रिटेन की मीडिया संसथान&amp;nbsp;भी तो राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3603838540610061862?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3603838540610061862/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/09/blog-post_21.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3603838540610061862'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3603838540610061862'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/09/blog-post_21.html' title='पोखरण-दो पर संदेह कहीं कुंठा तो नहीं!'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-8964034552448097474</id><published>2009-09-16T02:06:00.002+05:30</published><updated>2009-09-16T02:14:43.523+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टालमटोल'/><title type='text'>आदतों में शुमार हो चुकी है सुस्त कार्य संस्कृति</title><content type='html'>कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी धीमी, शाख पर लग रहा बट्टा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है सुस्त कार्य संस्कृति हम भारतवासियों के संस्कारों में रच बस गई है। कोई भी कार्य समय पर पूरा न करने की मानों हमारी आदत सी बन गई है। कुछेक लोग और संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांशतया विलंब की संस्कृति हावी दिखती है। अगर बात सरकारी योजनाओं की हो तो अधिकारी और कर्मचारी जानबूझकर विलंब करने और उसमें अनावश्यक अड़ंगा लगाने की अपनी आदतों से बाज नहीं आते हैं। पता नहीं क्यों लोगों में टालू आदतें गहराई तक जड़ जमा चुकी हैं। बात हम राष्ट्रमंडल खेलों की कर रहे हैं। जिसके आयोजन में महज 381 दिन ही शेष रह गए हैं। तैयारी अभी भी तय लक्ष्य से काफी पीछे है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रीय गौरव और अभिमान से जुड़े मामलों में भी हम कितना लापरवाह और उदासीन हैं। इसका ताजा उदाहरण कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी है। विभिन्न खेलों के आयोजन की तैयारियों पर नजर डाली जाए तो आज की तारीख में हमारा देश सफल आयोजन में सक्षम नहीं है। यह शर्मनाक तब और हो जाता है जब कोई विदेशी तैयारियों की धीमी चाल पर चिंता जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने का आग्रह करता है। राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फनेल भारत में राष्ट्रमंडल आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी को चिट्ठी लिखकर यह कहने को बाध्य होते हैं कि अब सिर्फ आपके प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से ही खेलों की पूरी तैयारी संभव है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फनेल की चिट्ठी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उनकी चिंताओं में हमारी टालू संस्कृति और किसी भी मामले को लंबा खींचने की आदतों का अक्स दिखता है। इससे तो हमारी शाख पर ही बट्टा लगने का खतरा पैदा हो गया है। यह विडंबना ही है कि फनेल की चिट्ठी के बाद आयोजन से जुड़े लोगों को यह बात समझ में आई कि खेलों से जुड़े प्रोजेक्ट काफी पीछे हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी कहना पड़ा कि तैयारी को लेकर नर्वस जरूर हूं लेकिन काम समय पर पूरा होंगे। चिट्ठी प्रकरण से पहले वह भी दावा कर रहीं थीं कि तैयारी पूरी तरह से नियंत्रण में है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयोजन से जुड़ा (&amp;nbsp;संभवतः)&amp;nbsp;ऐसा कोई भी प्रोजेक्ट नहीं है जिसको पचास फीसदी पूरा कर लिए जाने का दावा किया जा सके। हर प्रोजेक्ट अपने निर्धारित लक्ष्य से पीछे चल रहा है। चाहे वह खिलारियों से जुड़ा प्रोजेक्ट हो या खेलों के दौरान आने वाले विदेशी पर्यटकों को राजधानी की उम्दा छवि पेश करने से जुड़ा प्रोजेक्ट। सब पर हमारी क्षुब्ध कर देने वाली विलंब की संस्कृति हावी है। न तो अभी स्टेडियम ही ठीक हो पाएं हैं और नहीं पर्यटकों को ठहराने के लिए गेस्ट हाऊस ही तैयार हो पाएं हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, अभी जिन खेलों का आयोजन होना है उनमें भाग लेने वाले खिलारियों को भी तैयारी करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराया गया है। जो संसाधन उनके पास हैं भी वह स्तरीय नहीं कहे जा सकते। ऐसे में हम खिलाçड़यों से पदक की कैसे उम्मीद कर सकते हैं? यदि आज चीन खेलों में उम्दा प्रदर्शन कर रहा है तो उसके&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;को मिलने वाली सुविधाएं भी उम्दा हैं। भारत के पास संसाधनों की कमी नहीं है लेकिन भ्रष्टाचार सही इस्तेमाल नहीं करने देता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है। खासकर दोनों जगह कांग्रेसी अपने कार्यों के बल पर कमबैकं करने का दावा कर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेलों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो राजधानी को पेरिस बनाने की घोषणा कर चुकी हैं। इसी तरह से चलता रहा तो पेरिस तो दूर हम दिल्ली को देश का भी बेहतरीन शहर नहीं बना पाएंगे। दोनों सरकारों को अपनी जिम्मेदारियों और कमियों को खुले मन से स्वीकार करना होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों की सहभागिता है। दोनों जगह अधिकारियों की समय पर समन्वय न बन पाना आयोजन की तैयारियों को धीमा कर दिया। यदि दोनों सरकारों के अधिकारी इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान और अपनी जिम्मेदारी से जोड़कर लेते तो शायद इतना विलंब नहीं होता और एक विदेशी को चिंता जाहिर करने का मौका नहीं मिलता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन से विश्व में हमारे देश की एक अलग छवि बनेगी। आज जो विदेशी भारत को सांप-सपेरों का देश मानते हैं उन्हें भारत की उदात्त छवि देखने को मिलेगी। वह जान सकेंगे कि भारत कितनी तेजी से विकास कर रहा है। यह तभी संभव है जब एक वर्ष में खेलों से जुड़े सभी प्रोजेक्ट को तीव्र गति से पूरा कर लिया जाए। इनमें कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो आधुनिक भारतवर्ष की छवि पेश करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-8964034552448097474?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/8964034552448097474/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8964034552448097474'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8964034552448097474'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html' title='आदतों में शुमार हो चुकी है सुस्त कार्य संस्कृति'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-4428729068854843188</id><published>2009-09-13T01:29:00.000+05:30</published><updated>2009-09-13T01:29:47.735+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आरोपों की राजनीती'/><title type='text'>कब स्वीकारेंगे अपनी गलतियों को राजनीतिक दल</title><content type='html'>&lt;br /&gt;भाजपा और वाम दलों को सच्चाई से आत्मविश्लेषण करना चाहिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या भारतीय राजनीतिक दल अपनी गलतियों से कभी सबक लेंगे। गलतियों के लिए बहाना बनाना, तर्क गढ़कर उस पर&amp;nbsp;पर्दा&amp;nbsp;डालना और झूठ का सहारा लेना तो लगता है हमारे नेताओं के संस्कारों में रच बस गया है। राजनीतिक दल अपनी विफलताओं को ईमानदारी से स्वीकार नहीं करते। दूर जाने की जरूरत नहीं है। लोक सभा चुनाव में मिली पराजय का विश्लेषण ईमानदार तरीके से न तो दक्षिणपंथी भाजपा और नही वामपंथी दल ही कर पाएं हैं। यदि किए भी हैं तो जनता और देश के सामने लाने की इनमें&amp;nbsp;हिम्मत&amp;nbsp;नहीं है। दरअसल, ये दल अपनी गलतियों पर मंथन करना चाहते ही नहीं हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोक सभा में मिली पराजय पर भाजपा और वामदलों में मचा घमासान का कारण ऊपर से लेकर निचले स्तर के नेताओं का अपनी&amp;nbsp;जिम्मेदारी&amp;nbsp;से पल्ला झाड़ना है। जो लोग वाकई जिम्मेदार हैं वह अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं। ऐसे में समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं को निराशा घेरने लगती है। भाजपा की दिक्कत है कि बहुत सारे नेता मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने में विश्वास करते हैं। जब उन्हें जनता के साथ मिलकर उनकी समस्याओं के समाधान के लिए आवाज उठानी चाहिए तो वे एसी में आराम फरमाते हैं। मैं भाजपा के कुछ नेताओं को व्यçक्तगत तौर पर जानता हूं जो सत्ता में रहने के दौरान कार्यकर्ताओं से मिलना तक नहीं चाहते थे। वह आज भी पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। हालांकि, पार्टी में सभी लोग ऐसे नहीं हैं। लेकिन, कुछ लोगों के चलते ही आज भाजपा की यह स्थिति हुई है। आम कार्यकर्ताओं में कोई उत्साह ही नहीं है। एक समस्या भाजपा की यह भी है कि जो जमीन से जुड़े नेता हैं वह आज भी पार्टी के प्रति समर्पित हैं। लेकिन, जिनका जनाधार नही है वह या तो पार्टी पर कब्जा किए बैठे हैं या महत्वपूर्ण पद की आस में हैं। ऐसे में बगावत और अनुशासनहीनता तो होना ही है। भाजपा का वर्तमान संकट सत्ता लोलुपता का द्योतक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, लोक सभा चुनाव में भाजपाइयों ने जीत के लिए सामूहिक प्रयास ही नहीं किया। ऐसा नहीं था कि मुद्दे नहीं थे, लेकिन उन्हें ठीक से पेश ही भाजपा वाले नहीं कर पाए। हार का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए अथवा पार्टी को शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक जिम्मेदारी लेनी चाहिए अभी यही तय नहीं हो पाया। आज जो लोग बगावत का झंडा उठाए हुए हैं उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण पद चाहिए। उन लोगों को पार्टी की मर्यादा, अनुशासन और नीतियों से कुछ लेना देना नहीं है। दूसरी तरफ आज जो लोग निकले गए हैं उन्हें पार्टी में ढेरों कमियां दिखने लगी हैं, लेकिन जब वे थे तो उन्हें ऐसा कुछ दिखता ही नहीं था। ऐसे नेताओं को भी जनता खूब समझती है। मीडिया में कमियां गिना कर अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से वे लोग नहीं बच सकते। एक पार्टी छोड़कर दूसरे में जाने वाले कभी किसी दल का भला नहीं कर सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही जसवंत सिंह कंधार कांड के बारे में आडवाणी को झूठा बता रहे हैं, लेकिन देश की जनता यह कैसे भूल सकती है कि उस कांड को सफल बनाने में इन महाशय का ही पूर्ण योगदान था। मंत्री रहते इन्होंने कोई ऐसी छाप नहीं छोड़ी जिसे याद किया जा सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज आडवाणी के नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए की भाजपा को शीर्ष पर पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। यदि अटल जी ने दूसरे दलों के लिए भाजपा को ग्राह्य बनाया तो आडवाणी ने पार्टी को सबल बनाने का अभूतपूर्व कार्य किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माकपा के महासचिव प्रकाश करात का यह कहना कि भाजपा का वर्तमान संकट उसका संघ से नाता न तोड़ने का प्रतिफल है तो वाम दलों का हासिये पर चला जाना और एक-दो राज्यों में ही सिमट जाना किसका प्रतिफल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी एक&amp;nbsp;व्यक्ति&amp;nbsp;विशेष की नहीं होती। उस पर जनता का भी अधिकार होता है और जनता को जानने का पूरा हक है कि कोई दल विशेष क्यों पीछे रह गया। देश को मजबूत और ऊर्जावान विपक्ष देने के लिए भाजपा और वाम दलों को अपनी कमियों को दूर कर केंद्र सरकार की नाकामियों को जनता के सामने सच्चाई से लानी चाहिए। तभी लोकतंत्र&amp;nbsp;का सही अर्थों में रक्षा हो सकेगा और तभी हमारा देश उन्नति के रास्ते पर चल सकेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-4428729068854843188?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/4428729068854843188/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/09/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4428729068854843188'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4428729068854843188'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='कब स्वीकारेंगे अपनी गलतियों को राजनीतिक दल'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-8109114282143764420</id><published>2009-08-30T01:46:00.002+05:30</published><updated>2009-08-30T02:06:38.643+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुनाफाखोरी'/><title type='text'>काफी मुनाफा है मिलावट के धंधे में</title><content type='html'>मृत्युदंड मिले मिलावटखोरों  और जमाखोरों को  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हो रहा है अपने देश में? चारों तरफ लूट खसोट और बेइमानी का बोलबाला है। आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद से तो लोग जूझ ही रहे थे कि वर्षों पुराना मर्ज मिलावट और जमाखोरी फिर से जनता को परेशान करना शुरू कर दिया है। लेकिन, सरकारें यह तय नहीं कर पा रही हैं कि इनसे कैसे सख्ती से निपटा जाए। केंद्र और राज्य सरकारों के पास इन पर लगाम लगाने के लिए न तो दृढ़इच्छाशक्ति ही है और न ही कोई दूरदर्शी योजना। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव देश की गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकवाद तो बाहर से प्रायोजित है जिसका मकसद ही बबाüदी और तबाही है, लेकिन जमाखोरी और मिलावट के माध्यम से देश के अंदर देश को खोखला करने की साजिश हो रही है। क्योंकि, मिलावटी खाद्य पदार्थों से लोग आंतरिक और बाह्य रूप से प्रभावित होते हैं। यह एक तरह से स्वीट प्वॉइजन है जो धीरे-धीरे अपना असर दिखाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों लगभग रोज ही मिलावट और जमाखोरी के मामले अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बन रहे हैं। 22  अगस्त को गाजियाबाद में नकली घी और चाय बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश  किया गया है । कई लोग इस मामले में गिरफ्तार किए गए हैं। इसके पूर्व मेरठ में भी नकली देशी घी बनाने की फैक्टरी का भंडाफोड़ हो चुका है। यहां पर शुद्ध देशी घी के नाम पर जानवरों की चर्बी और अन्य तेलों को मिलाकर घी तैयार किया जा रहा था। यहीं नहीं देशी घी के नाम पर लोगों की आंख में धूल झोंकने के मामले का उजागर राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश के जबलपुर में भी हो चुका है। हद तो तब हो गई जब हरियाणा के हिसार, कैथल और करनाल जिलों में सबजियों  को समय पूर्व विकसित करने के लिए इंजेक्शन लगाने और दवाओं का प्रयोग करने का मामला प्रकाश में आया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ जमाखोरों की भी पौ बारह है। खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ रहे हैं उसका एक सबसे बड़ा कारण जमाखोरी है। बड़े और छोटे सेठ-साहूकार वस्तुओं को जमा कर कृत्रिम कमी पैदा कर दे रहे हैं जिससे महंगाई बढ़ने लगती है। बाद में वे अपना स्टॉक बाजार में ऊंचे दामों पर बेच कर जनता की गाढ़ी कमाई ऐंठ लेते हैं। छत्तीसगढ़ में 23  अगस्त को दस करोड़ रुपये की दालें जब्त की गई हैं। इसके पूर्व मध्यप्रदेश में करोड़ों के चावल जब्त किए गए हैं। देश में ऐसे अनगिनत मामले हैं जिन तक किसी की नजर नहीं पहुंच पाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं अब यह नौबत आ गई है कि मुनाफे  के लिए असामाजिक तत्व खून में मिलावट करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। पिछले दिन लखनऊ में मिलावटी खून बेचने वाले रैकेट का पर्दाफाश होना तो कुछ अलग ही  कहानी बयां  करता है। अब लोग करें तो करें क्या? लखनऊ में पकड़ा गया रैकेट इंसानों के खून में जानवरों का खून मिलाकर 900  से 1500  रुपये तक  में बेच रहा था। लगता है लोगों की जमीर ही खत्म हो गई है। पैसे के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। सच तो यह कि ऐसे लोगों की कोई हद ही नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के मामलों की  फेहरिस्त लंबी है। कुछ लोग गिरफतार भी किए जा रहे हैं। फिर भी इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। वहज  भी आईने  की मानिन्द साफ है, लोगों में मौजूदा कानून का खौफ ही नहीं है। या स्पष्ट कहें तो इन मिलावटखोरों  और जमाखोरों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई ही नहीं की जाती। क्योंकि, जो धंधों के मुखिया हैं उन्हें कहीं न कहीं नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस से संरक्षण प्राप्त है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, मौजूदा कानून को और सख्त बनाने की जरूरत है। ऐसे लोगों में कानून का भय ही नहीं रह गया है। इनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि दूसरे ऐसे लोग सबक लें सकें। सबसे बड़े देशद्रोही तो यही हैं, क्योंकि, ऐसे लोग जनता के दिलो-दिमाग  को कुंद करते  हैं। यह लोग माफी अथवा कम सजा के हकदार नहीं हो सकते हैं। कुछ लोगों को केवल गिरफतार कर लेने और एफआईआर दर्ज करन े भर से कुछ नहीं होने वाला है। तह में जाकर पड़ताल करनी होगी और आरोपियों को मृत्युदंड से कम सजा मिलनी ही नहीं चाहिए। ऐसे मामलों के लिए सरकार को अलग से न्यायालयों का गठन करना चाहिए, जहां द्रुत गति से मामलों का निपटारा कर आरोपियों को सजा मिल सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-8109114282143764420?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/8109114282143764420/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/08/blog-post_30.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8109114282143764420'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/8109114282143764420'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/08/blog-post_30.html' title='काफी मुनाफा है मिलावट के धंधे में'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-3452303888061734523</id><published>2009-08-23T01:06:00.005+05:30</published><updated>2009-08-23T01:31:40.878+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिक्कत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देशद्रोह'/><title type='text'>रेलवे को क्षति पहुंचाना शगल बन गया है</title><content type='html'>&lt;font class=""&gt;&lt;/font&gt;सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों पर कठोर कार्रवाई हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना लोगों के लिए शगल बन गया है। छोटी-छोटी बातों के लिए लोग राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आजकल देश में अपनी मांगें मनवाने के लिए सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाना लोगों को सबसे आसान और उपयुक्त लगता है। लोगों को लगता है कि यह सब करके वे सरकार से अपनी गलत बातों को भी मनवा लेंगे, लेकिन वह भूल जाते हैं कि सरकारी संपत्ति जनता की अपनी संपत्ति है और इसे नुकसान पहुंचा कर हम अपना नुकसान ही तो कर रहे हैं। क्योंकि, सरकार जो पैसा दूसरे विकासात्मक कार्यों पर लगाती वह पैसा नष्ट हुई संपत्ति पर लगाना पड़ता है। ऐसे में किसका नुकसान हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के गुस्से का सर्वाधिक शिकार देश की जीवन रेखा रेलवे ही हुई है। ट्रेनों की बोगियों में आग लगा देना, रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ करना तो मानो आम बात हो गई है। हर बात पर लोग ट्रेनों के चक्के जाम कर देते हैं या कोचों में आग लगा देते हैं, इससे सरकार को लाखों-करोड़ों का नुकसान होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के बाद से बिहार से ही ज्यादातर रेलवे मंत्री बने हैं। यह विडंबना ही है कि बिहार में ही रेलवे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया जाता है। आए दिन लोग या नक्सली रेलवे को क्षति पहुंचाते रहते हैं। पिछले सात-आठ महीने के रिकार्ड को देखा जाए तो सर्वाधिक नुकसान रेलवे को बिहार में पहुंचाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिन बिहटा रेलवे स्टेशन के पास जिस तरह से छात्रों ने आरक्षित सीटों पर बैठने को लेकर श्रमजीवी एक्सप्रेस की एसी बोगियों में आग लगा दी बहुत ही दुखद है। जो छात्र देश के भविष्य हैं वे राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुंचाने में जरा सा भी देर नहीं लगाते हैं, इससे ज्यादा राष्ट्रीय शर्मनाक और क्या हो सकता है। उसी दिन लखीसराय स्टेशन पर भी लोगों ने एक और ट्रेन को आग लगा दी। कुछ दिन पहले ही दानापुर-सहरसा इंटरसिटी में भी आग लगा दी गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे भरती में स्थानीय लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी तो नाराज छात्रों ने बाढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन को आग लगा दी थी। इस घटना के अगले दिन अथमलगोला रेलवे स्टेशन पर भी छात्रों ने कोसी एक्सप्रेस में आगजनी की कोशिश की। यही नहीं बिहार में बने कई अवैध हाल्टों को हटाने के आदेश पर भी लोगों ने रेलवे को नुकसान पहुंचाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले वर्ष मुंबई में उत्तर भारतीयों की कथित पिटाई तथा राहुल राज नाम के युवक की पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मौत के बाद कई दिनों तक छात्रों ने रेलवे को निशाना बनाया था। 26 अक्टूबर 2008 को बाढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ी साउथ बिहार ट्रेन में छात्रों ने आग लगा दी। इस घटना में ट्रेन की दो एसी बोगियां जलकर राख हो गई थीं। इससे तीन दिन पूर्व 23 अक्टूबर को परीक्षार्थियों ने सोनपुर मंडल के बापूधाम मोतिहारी स्टेशन पर जमकर उत्पात मचाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह 21 अक्टूबर को मुंबई से परीक्षा देकर लौटे छात्रों ने पटना जंक्शन पर जमकर तोड़फोड़ की थी। जंक्शन से गुजरने वाली ट्रेनों में पटना-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस समेत चार दर्जन से ज्यादा ट्रेनों को रद्द करना पड़ा था। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;(यह रेलवे पुलिस में दर्ज मामलों से लिए गए हैं ) &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो रही छात्रों और बिहार की बात। लेकिन देश के अन्यत्र हिस्सों में भी रेलवे को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं बढ़ी हैं। राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर किए जा रहे आंदोलन के दौरान भी ट्रैक पर धरने पर बैठ कर लोगों ने रेलवे का आवागमन कई दिनों तक ठप कर दिया था, जिससे करोड़ों की राजस्व की क्षति हुई थी साथ ही लोगों को भी भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, देश में कानून का कड़ाई से पालन न होना भी सरकारी संपçत्त को नुकसान पहुंचाए जाने का एक बड़ा कारण है। यदि रेलवे अथवा किसी भी सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों के विरुद्ध कठोरता से पेश आया जाता तो लोग ऐसा करने से बाज आते, लेकिन ऐसा होता नहीं। केंद्र सरकार कानून व्यवस्था राज्य का मामला बता कर कार्रवाई करने से पीछे हट जाती है। राज्य सरकारें रेलवे को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले अपने वोट बैंक के नफा-नुकसान का हिसाब लगाने लगती हैं। उन्हें लगता है कि कार्रवाई करने के मामले को कहीं विपक्ष क्वमुद्दां न बना दे। इस तरह से रेलवे को नुकसान पहुंचाने वालों के हौसले बुलंद होते जाते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ भी करो कुछ होने वाला नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद है, वर्ष 2000 में मेरे गृह जनपद गाजीपुर के दिलदारनगर जंक्शन पर अपर इंडिया के कई बोगियों में उपद्रवी तत्त्वों ने आग लगा दी थी। मैं भी उस दिन ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पर ही मौजूद था। ट्रेन को फूंकने वाले लोगों के विरुद्ध मामले दर्ज हुए, लेकिन कार्रवाई आजतक नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि पुलिस उन उपद्रवियों को नहीं जानती है। सबकुछ के बावजूद सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वाले आज भी स्टेशन पर घूमते हुए दिख जाएंगे, लेकिन पुलिस और प्रशासन को नहीं दिखेंगे। क्योंकि, दुर्भाग्य से वे एक पार्टी विशेष से संबंध रखते हैं और पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने देती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व में कहीं भी रेलवे को नुकसान को पहुंचाने की घटनाएं संभवतः नहीं होती हैं, लेकिन अपने महान देश के महान लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देने में अपना गर्व समझते हैं। उन्हें लगता है कि रेल ही एक जरीया जिससे वे अपनी बात मनवा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, हम लोग अभी भी एक अच्छे और जनतांत्रिक नागरिक के गुणों को विकसित नहीं कर पाए हैं। हम लोगों में सिविक सेंस ही नहीं है। यदि सिविक सेंस होती तो ऐसी घटनायें नहीं होतीं। क्या पश्चिम में या विकसित देशों में अपनी मांगों को लेकर लोग आंदोलन नहीं करते हैं? वहां भी आंदोलन होता है, लेकिन अपने देश जैसा नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब समय आ गया है कि देश के कानूनी ढांचा को बदल कर कुछ मामलों में एक संघीय कानून बनाया जाए। सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों या राष्ट्रीयता को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध सीधे राष्ट्रीय स्तर पर कठोरतम कार्रवाई की जाए। ढुलमुल रवैये से अब काम चलने वाला नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-3452303888061734523?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/3452303888061734523/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/08/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3452303888061734523'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/3452303888061734523'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='रेलवे को क्षति पहुंचाना शगल बन गया है'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-4798321571122970077</id><published>2009-07-06T22:31:00.005+05:30</published><updated>2009-07-07T22:24:50.032+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गैरजरूरी बहस'/><title type='text'></title><content type='html'>क्या समलैंगिकता मानसिक बीमारी नहीं है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज को नहीं अपनी सोंच बदलें समलैंगिकता के पैरोकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय भले ही कुछ पश्चिमप्रस्त मीडिया संस्थानों और संगठनों के लिए ऐतिहासिक और प्रगतिवादी फैसला लग रहा हो लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता इसको गैर जरूरी और अव्यवहारिक निर्णय मानती है। आप कुछ मुठी भर लोगों की खुशियों के लिए देश की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से छेड़छाड़ करने की खुली छूट तो नहीं दे सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली धारा 377 को बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन कुछ लोगों को भले ही लगता है लेकिन इस तरह के संबंधों को वैधानिक स्वरूप प्रदान करना भी तो बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का मजाक उड़ाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि धारा 377 से कुछ लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो होता रहे। इसके लिए समाज को विघटित और शर्मिंदा करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्षमा चाहूंगा। एक अपराधी अपराध करना अपना अधिकार समझता है, आतंकवादी आतंकवाद फैलाना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, चोर चोरी करना अपना मौलिक अधिकार मानते हैं तो क्या इन्हें भी छूट दी जा सकती है! मेरा आशय समलैंगिकों को अपराधी या आतंकवादी अथवा गलत लोगों की श्रेणी में खड़ा करना नहीं है। वरन मैं मेरा यह आग्रह है कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिस पर सोच विचार कर और बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामदेव जी ने ठीक ही कहा है कि समलैंगिक लोग मानसिक रूप से बीमार हैं उन्हें अस्पताल भेजना होगा। बकौल रामदेव जी समाज की सोच बदलने की जगह ऐसे लोगों को योग और प्राणायाम के जरिए अपने को बदलना चाहिए। आप समाज के साथ चलिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह नहीं है कि समलैंगिकता को मान्यता मिलनी चाहिए या नहीं। गौरतलब बात यह है कि आखिर हम भारत को क्या बनाना चाहते हैं? पहले यह तय करना होगा। कृपया, भारत को भारत ही रहने दें तो अच्छा होगा, देश पर पाश्चात्य संस्कृति को थोपने की जरूरत नहीं है। भारत की अपनी संस्कृति, अपनी मान्यता, अपनी पहचान, परंपरा और एक छवि है। ऐसे में आप पश्चिम की बुरी सभ्यताओं को क्यों ग्रहण करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में केवल बुराइयां ही हैं अच्छाइयां भी हैं आप उन्हें ग्रहण करें। आप यह न भूलें कि भारत को विश्व धर्म गुरू के रूप में भी जाना जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, कुछ संस्थाएं और कुछ लोग ऐसे हैं जो देश की संस्कृति और परंपराओं के विरुद्ध षडयंत्र  करने में लगे हैं। वे चाहते हैं कि भारत की प्राचीन संस्कृति विनष्ट हो जाए और पाश्चात्य की बुरी सभ्यता यहां खुलेआम चलें। पश्चिम में तो बच्चों की एक बड़ी संख्या है जिनके असली पिता के बारे में उनकी माताओं को ही निश्चित तौर पर पता नहीं होता है। यहां भी कुछ लोग ऐसी ही संस्कृति विकसित करना चाहते हैं। जहां उन्हें कोई टोकने वाला न हो। लेकिन ऐसी आजादी, ऐसी संस्कृति को भारतीय लोग बर्दास्त नहीं करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समलैंगिकता भारतीयों की सोच या संस्कृति से मेल नहीं खाती। भारत में कभी भी इस तरह के संबंधों को मान्यता नहीं मिली। जिस कामसूत्र और प्राचीन भिçत्त चित्रों को आधार बनाकर इसे जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। उसके निहितार्थ को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है। कामसूत्र के रचनाकार कोई साधारण उपन्यास या निबंध लेखक नहीं थे उन्हें देश, काल और परिस्थितियों का अच्छी तरह से ज्ञान था। वे प्रकृति और संस्कृति विरुद्ध कार्य करने की इजाजत कैसे दे सकते थे। जिस संबंध का (जिसे कुछ लोग समलैंगिकता मान रहे हैं) कामसूत्र में वर्णन किया गया है उसको गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता है। उस प्रसंग का वाकई में क्या अर्थ होना चाहिए? यह जानने की कोशिश होनी चाहिए। जिस संबंध का जिक्र है वह किसके साथ, कब, कहां और क्यों करना चाहिए यह जानना होगा। हमें प्राचीन ग्रंथों में वणिüत प्रसंगों का उदाहरण देने से पहले उस प्रसंग की सारगभिüता को भी ध्यान में रखना होगा।&lt;br /&gt;समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसला का देश में हो रहे चौतरफा विरोध को नकारा नहीं जा सकता। लगभग सभी राजनीतिक दल और सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने भारी विरोध किया है। जदयू के शरद यादव ने ठीक ही कहा है कि देश में और भी गंभीर मुद्दे हैं जिस पर बहस होनी चाहिए। ऐसे मुद्दों पर बहस कर समय और ऊर्जा बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी समलैंगिकता के पैरोकार देश के कुछ शहरों में ही हैं। जिनकी जनसँख्या पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ऐसे संबंधों के बारे में लोग सोचना भी पसंद नहीं करते। कुछ एक अपवाद हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समलैंगिक तो जानवर भी नहीं होते। हम मनुष्य होकर ऐसे संबंधों की पैरोकारी क्यों कर रहे हैं? इस पर भी जरा सोचें..............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-4798321571122970077?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/4798321571122970077/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/07/377-377-k-c-u-u.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4798321571122970077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4798321571122970077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/07/377-377-k-c-u-u.html' title=''/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-4745943507413728744</id><published>2009-06-11T22:22:00.001+05:30</published><updated>2009-06-11T22:35:12.252+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नेताओं की छोटी होती राजनीतिक सोच'/><title type='text'></title><content type='html'>आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग साजिश या कुछ और....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ राजनीतिक दलों की क्षुद्र राजनीति के चलते वर्षों से अधर में लटके महिला आरक्षण विधेयक पर इस बार भी संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। अपने गठबंधन के दम पर फिर से सत्ता में लौटी कांग्रेस से न केवल महिलाओं को बल्कि आम आदमी को भी उम्मीद है कि इस बार विधेयक कानून बन जाएगा। लेकिन शरद यादव सहित कुछ अन्य नेताओं की स्वार्थपूर्ण राजनीति के चलते कुछ संदेह उत्पन्न होने लगा है। हालांकि, सकारात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इस विधेयक का समर्थन करने का फैसला किया है।&lt;br /&gt;मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक का विरोध करने का ठोस कारण किसी पार्टी के पास नहीं है। जो दल विरोध कर रहे हैं उसके पीछे उनकी मंशा पर संदेह पैदा होता है। दरअसल, यह दल आरक्षण के आड़ में अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं और महिलाओं को भी आरक्षण के नाम पर बांट देना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरद यादव को मैं सुलझा हुआ और लालू, मुलायम-पासवान से अलग समग्र समाज की राजनीति करने वाला नेता मानता था, लेकिन आरक्षण के नाम पर जहर खाने की बात कह कर उन्होंने भी अपना असली चेहरा दिखा दिया है कि वह भी जाति और समाज को बांटने की राजनीति करने वालों से अलग नहीं हैं। बिहार में राजद और लोजपा को छोड़ दिया जाए तो जदयू को भी भाजपा और कांग्रेस की तरह समाज के हर जाति और वर्ग के लोग वोट देते हैं। ऐसे में शरद यादव आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग करके कौन सी राजनीति कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरद यादव एक राष्ट्रीय स्तर के गठबंधन के संयोजक हैं फिर भी वह अपनी क्षेत्रीय सोच से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही वह भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा मोदी को आडवाणी के बाद प्रधानमंत्री के लिए नाम उछाले जाने पर गठबंधन धर्म की दुहाई देते घूम रहे थे। लेकिन खुद क्या कर रहे हैं। दरअसल, जदयू का जनाधार महज बिहार (झारखंड में भी तोड़ा बहुत) तक ही सीमित है। शरद यादव को लगता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग पर जहर खाने की धमकी देकर वह लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के वोट बैंक पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन ऐसा होगा नहीं। क्योंकि बिहार में लालू प्रसाद को कमजोर नहीं माना जा सकता है। आज भी लालू की लोकप्रियता सर्वाधिक है। वहीं शरद यादव जीतने के बाद भी लोकप्रिय नेता नहीं माने जाते हैं।&lt;br /&gt;ऐसे में आरक्षण के नाम पर उनकी सोच हास्यास्पद ही है। पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था से पहले जो लोग एक साथ मिलजुल कर रहते थे वह आज चुनाव में आमने-सामने होने से एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। चुनावी रंजिश को लेकर मरने-मारने के लिए साजिश करते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसद में राष्ट्रपति महोदया के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के दौरान अपने संबोधन में लालू ने महिला आरक्षण के बारे में जो कुछ भी कहा उस पर हंसी आती है। लालू का यह कहना कि आरक्षण के भीतर आरक्षण का विरोध करने वाले लोग पिछड़ों और दलितों को संसद और राजनीति से बाहर करना चाहते हैं। कितनी छोटी सोच है। यह कौन सी समाजिक न्याय की व्यवस्था है। एक को आगे लाएं और दूसरे को गड्ढे में गिराएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है मेरी बात कुछ लोगों को अप्रिय लगे, लेकिन सच तो यह है कि हर क्षेत्र में आरक्षण की मांग करके लालू सरीखे लोग सवर्ण जातियों को ही संसद और विधान सभाओं से बाहर करना चाहते हैं। पहले से ही मुख्य धारा की राजनीति में आरक्षण की व्यवस्था है। अब महिला आरक्षण में भी आरक्षण की मांग! इससे तो समतामूलक समाज की स्थापना नहीं हो सकता। इससे तो समाज में कुछ जातियां ऊपर उठेंगी और कुछ मुख्य धारा से पीछे होती जाएंगी। वैसे भी संसद और विधान सभाओं में सवर्ण जातियों की संख्या अब कम होती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि पिछड़ों और दलितों को संसद से बाहर करना होता तो कांग्रेस मीरा कुमार को लोक सभा का स्पीकर नहीं बनाती और नहीं भाजपा आदिवासी नेता को डिप्टी स्पीकर के पद पर बैठाती। कांग्रेस और भाजपा में समाज के हर वर्ग और जाति को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-4745943507413728744?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/4745943507413728744/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4745943507413728744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/4745943507413728744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title=''/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-2813562581025768008</id><published>2009-04-13T22:16:00.001+05:30</published><updated>2009-04-13T22:19:14.301+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वोट की राजनीति या कुछ और....'/><title type='text'></title><content type='html'>तो क्या ये वाकई मुसलमानों का भला चाहते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत के लिए चुनाव का समय आ गया है। फिर से राजनीतिक दल घिसे-पिटे मुद्दों और जनता को बरगलाने के लिए अपने घोषणापत्र के साथ इस महासमर में हाजिर हैं। गरीब जनता को कोई दो रुपये किलो चावल देने की बात कर रहा है तो कोई सांप्रदायिकता की बात उछाल कर अल्पसंख्यक वोट हथियाने की जोर आजमाइश करता नजर आ रहा है। लबोलुआब  यह कि किसी भी दल या गठबंधन के घोषणापत्र में देश के लिए भावी `विजनं या आम आदमी के लिए कुछ भी `खासं नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार के चुनाव में राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय दल सभी एक समान नजर आ रहे हैं। राष्ट्रीय दलों के पास  राष्ट्र के लिए न तो कोई दुरगामी उम्दा दृष्टिकोण ही है और न ही क्षेत्रीय दलों के पास राज्य विशेष या क्षेत्र विशेष के विकास के लिए  अलग खाका ही है। कुछ है भी तो पुराने वायदे और नारे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कई चुनावों की भांति इस बार भी अधिकांश पाटिüयों के नेता मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करने के लिए जीतोड़ प्रयास कर रहे हैं। इस मुहिम में कुछ दलों को छोड़ दिया जाए तो पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण के राज्यों में छोटे और बड़े दलों के क्षत्रप अपने को अल्पसंख्यक (मुस्लिम) हितैषी  होने का दम भरते नजर आ रहे हैं। कोई उन्हें सांप्रदायिकता का भय दिखा रहा है तो कोई उन्हें विशेष सुविधाओं की बात कह रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, पिछले कई दशक से देश में  विभिन्न पार्टियों द्वारा अपने को मुस्लिम हितैषी होने या दिखाने का प्रचलन सा चल निकला है। सच्चाई तो यह है कि कोई भी दल वोट की राजनीति से ऊपर उठ कर उनके बारे में गंभीर ही नहीं है। केवल हौव्वा खड़ा करने और एक अनजाने सा भय उनके मन में डालने के अलावा यह कुछ नहीं करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह दल भूल जाते हैं कि मुस्लिम मतदाता भी उनकी चाल को अच्छी तरह से समझते हैं।  मुस्लिम समुदाय को पता है कि वह किस दल या विचारधारा से जुड़ेंगे तो उनका विकास होगा। एक शिक्षित और आम मुस्लिम मतदाता इन दलों के झांसे  में आने वाला नहीं है। &lt;br /&gt; मुस्लिम समुदाय को समझ है कि चुनाव के दौरान उनका केवल इस्तेमाल किया जाता है। जो नहीं है उसे पेश किया जाता है। मेरे आदरणीय मित्र प्रो.  हामिद अंसारी ने एक बार कहा था कि मुसलमान अब समझदार और शिक्षित हैं। उन्हें पता है कि कौन से दल उनका वाकई में भला कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजा घटनाक्रम को ही लिया जाए तो वरुण गांधी पर रासुका लगाने के पीछे उत्तर प्रदेश सरकार की मुस्लिम मतदाताओं को छिटकने से रोकने की कोशिश ही है। इसी तरह किशनगंज  के चुनावी सभा में रेलमंत्री लालू प्रसाद द्वारा वरुण पर बुलडोजर चलवाने की बात कहना भी मुस्लिम समुदाय को खुश करने वाली ही बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हद तो तब हो जाती है जब लोजपा  प्रमुख द्वारा अपनी पार्टी की घोषणापत्र में आरएसएस  और विहिप पर प्रतिबंध लगाने की बात कह कर इस समुदाय को रिझाने की कोशिश करते हैं। इस बात को सभी लोग जानते हैं कि जिस दल का एक राज्य में भी सरकार नहीं है और न ही उतने विधायक या एमपी  ही हैं जो किसी नीति को प्रभावित कर सकें। ऐसे लोग या ऐसे दल किसी का क्या भला कर सकते हैं। यह अपना केवल उल्लू सीधा कर सकते हैं और कुछ नहीं। यह कुछ ताजातरीन  उदाहरण हैं। ऐसे बहुत से दल हैं जो केवल वोट की राजनीति ही करते हैं। अब ऐसे में मुस्लिम समुदाय को निर्णय करना है कि वह केवल वोट बैंक ही बने रहेंगे या....?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-2813562581025768008?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/2813562581025768008/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/04/u.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/2813562581025768008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/2813562581025768008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/04/u.html' title=''/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-7805245920280111802</id><published>2009-04-01T22:27:00.002+05:30</published><updated>2009-04-01T22:32:46.326+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्षेत्रीयता की स्वार्थपूर्ण राजनीति'/><title type='text'></title><content type='html'>राष्ट्रीयता पर हावी होती क्षेत्रीयता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या चिंता का कारण बनती जा रही है। अपने निहित स्वार्थ और  अहम के चलते यह दल केंद्र को महेशा कमजोर ही करते नजर आते हैं। केंद्र में क्षेत्रीय दलों की भूमिका कुछ हद तक लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए ठीक है। लेकिन व्यापक तौर पर देखा जाए तो क्षेत्रीय दल अपने निहित स्वार्थों और क्षुद्र राजनीतिक हितों के लिए केंद्र  को कमजोर करने का ही काम करते हैं। इससे हमारा लोकतंत्र ही तो कमजोर होता है। इन क्षेत्रीय दलों के सामने जिस तरह राष्ट्रीय दल बेवश नजर आते हैं उससे तो लगता है कि देश में राष्ट्रीयता पर क्षेत्रीयता हावी होती जा रही है। राष्ट्रीय हित क्षेत्रीय हित पर बली चढ़ते जा रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने राज्यों में कुछ राजनीतिक मजबुरियां हैं। लेकिन, राष्ट्रीय हित तो सबके लिए सवोüपरि होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि केंद्र में सभी राज्यों और क्षेत्रों का समान प्रतिनिधित्व हो ताकि, विकास के मामले में कोई भी क्षेत्र पिछड़ा न रह जाए और देश के हर नागरिक को विकास का समान अवसर हासिल हो सके। यह तभी हो सकता है जब क्षेत्रीय दलों की भूमिका केंद्र सरकार में सार्थक हो। निश्चित तौर पर क्षेत्रीय दल अपने प्रदेशों की समस्याओं को पूरजोर तरीके से उठा सकते हैं। यही नहीं केंद्र सरकार पर दबाव बना कर समस्याओं का समाधान भी करवा सकतीं हैं। पर ऐसा होता है नहीं है। देखा गया है कि समाधान कम, यश लेने में ज्यादे रुचि लेते छोटे दलों के नेता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में राजग गठबंधन की सरकार हो या कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबंधन की सरकार। दोनों ही सरकारें क्षेत्रीय दलों की सहयोग से बनीं। दोनों गठबंधनों ने पांच साल सरकार चलाई। पूरे कार्यकाल में सरकारें क्षेत्रीय पार्टियों  की रिमोट से ही चलती रहीं हैं। ये दल अपने समर्थन की पूरी कीमत वसूलते हैं। चाहे सरकार में शामिल हो कर मंत्री बनने का हो या अपने संबंधित प्रदेशों के लिए  विशेष पैकेज प्राप्त करने की हो अथवा अपने दलों के प्रमुखों या नेताओं पर लगे आरोपी की जांच की धार को कुंद करने की हो। इन दलों ने केंद्र की नीति को हर वक्त प्रभावित और कमजोर करने का ही काम किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि कोई भी राष्ट्रीय दल की नेतृत्व वाली सरकार स्वतंत्र और समग्र रूप से राष्ट्रीय हित को तरजीह नहीं दे सकी। चाहे बात विदेश या घरेलु निति का हो केंद्र सरकारों ने क्षेत्रीय दलों को संतुष्ट करने का प्रयास किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन क्षेत्रीय दलों की कोई सिद्धांत भी नहीं है। कभी राजग के साथ तो कभी यूपीए के साथ। मतलब शुद्ध रूप से मौकापरस्ती। बिहार की लोजपा को ही लें तो राजग की सरकार में भी यह पार्टी शामिल थी तो यूपीए के साथ भी। हालांकि, राजग के कार्यकाल में गुजरातकांड के चलते (यह कहा जाए की मुस्लिम वोट के लिए तो गलत नहीं हो सकता) लोजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। उसी तरह नेशनल कांफ्रेंस   भी अवसरवाद को ही बढ़ावा दिया है। राजग में उमर अब्दुल्ला मंत्री थे तो इस समय कांग्रेस की मदद से जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री। यह तो एक उदाहरण मात्र है। इस तरह से बहुत सारी पार्टिया हैं जो अपने हित साधने के लिए राष्ट्रीय दलों के साथ हो जाती हैं और मौका के बाद फिर दूसरे राष्ट्रीय गठबंधन के साथ हो जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने देश में क्षेत्रीय दलों की बाढ़ सी आ गई है। इनकी संख्या को देखा जाए तो उतनी तो लोक सभा में सीटें भी नहीं हैं। हर कोई पार्टी बना कर कुछ न कुछ ऐंठना चाहता है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों की बाढ़ रोकने के लिए चुनाव आयोग को पहल करनी होगी। बेहतर तो होता संसद में इसके लिए कानून बनाया जाता है। देश में दो या तीन दलीय व्यवस्था ही भारत को विकसित देशों की कतार में ला सकती है। दलों की संख्या कम हो जाए तो हमारा देश स्वयं दलदली लोकतंत्र होने से बच जाएगा।&lt;br /&gt; वैसे भी इन दलों से क्षेत्रीय विकास को बहुत बल मिला हो ऐसा कुछ दिखता नहीं। लालू प्रसाद और मुलायलम जी (एकाध प्रदेशों में इनकी पार्टी की उपस्थिती देखी गई है), अपनी पार्टी बना कर बिहार और उत्तर प्रदेश में अपनी सरकारें काफी समय तक चलाएं हैं लेकिन इन राज्यों में विकास तो कुछ भी नहीं दिखता। उल्टे बीमारू राज्य की श्रेणी में यह राज्य आते हैं। झारखंड मुçक्त मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, मनसे, जेडीएस, जेडीयू सहित देश भर की तमाम छोटे दल स्वस्थ लोकतंत्र को मजबूती देने का काम कर रहे हों ऐसा कुछ नहीं है। अलबत्ता कई बार संसदयी गरीमा को ठेस भी पहुंचाने में ये पीछे नहीं रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब समय आ गया है कि देश के आम आदमी इन क्षेत्रीय दलों को बाहर का रास्ता दिखा कर राष्ट्रीयता को मजबूती दे। देश में दो या तीन दलों का होना ही सही होगा। अन्यथा वह समय दूर नहीं है जब केेवल क्षेत्रीयता ही होगी राष्ट्रीयता की कहीं भनक भी नहीं लगेगी। क्योंकि, जिस तरह से क्षेत्रीय और छोटे दलों के क्षत्रप संकीर्ण और स्वार्थपूर्ण राजनीति से प्रेरित हो कर राजनीति कर रहे हैं। उससे बहुत से सवाल और संदेह मन में पैदा होते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-7805245920280111802?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/7805245920280111802/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/04/u-c.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7805245920280111802'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7805245920280111802'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/04/u-c.html' title=''/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-2436602752324291739</id><published>2009-02-05T01:44:00.003+05:30</published><updated>2009-02-05T02:46:09.702+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिगड़ता बचपन'/><title type='text'>कलंकित होता बचपन</title><content type='html'>कलंकित होता बचपन&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में एक 13 वर्षीय बच्चे की शर्मसार कर देने वाली करतूत बच्चों की दुनिया की एक विकृत चेहरा दिखाती है। कि कैसे अब बच्चे भी हिंसा, सेक्स और नशे की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। यह उस वर्ग की हकीकत है जिसे केवल पढ़ने और खेल-कूद में ही अपना समय बिताना चाहिए। लेकिन, हो इसके उल्ट रहा है। पिछले दो-तीन दिनों के अंदर दिल्ली में बच्चों द्वारा कुछ ऐसी घटनाएं की गईं हैं जिसे सुनकर सहसा विश्वास नहीं होता की इस उम्र में बच्चे भी ऐसी हरकतें कर सकते हैं। दिल्ली की गोविंदपुर में रहने वाले एक 13 साल के लड़के ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दी। उसने एक फरवरी को अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक पांच वर्ष की मासूम को न केवल अपने हवस का शिकार बनाया, बल्कि उसके संवेदनशील अंगों पर ब्लेड से वार कर उसे जख्मी भी कर दिया। वारदात से पहले उसने थिनर का सेवन किया था, जब नशा चढ़ गई तो उसने इस घटना को अंजाम दे डाला। हालांकि, बच्ची की रोने की आवाज सुनकर लोगों ने उस लड़के को जमकर धुनाई कर पुलिस को सौंप दिया। जिसे अदालत ने बाल सुधार गृह में भेज दिया। इसके अलावा दूसरी घटना भी कम रोंगटे खड़ा करने वाली नहीं है। क्रिकेट खेलने के दौरान बात न मानने और मामूली विवाद पर एक लड़के ने एक पांच वर्षीय बच्चे की गर्दन पर चाकू से वार कर दी जिससे गर्दन की नस कट जाने से उस मासूम की मौत हो गई। उसको भी अदालत द्वारा बाल सुधारगृह में भेज दिया गया है। ये दोनों घटनाएं बच्चों में भी बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को दर्शाने के लिए काफी हैं। वैसे ऐसी कई घटनाएं हैं जो प्रकाश में नहीं आतीं हैं। बच्चों में बढ़ रही इस तरह की प्रवृत्ति के लिए किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए? यह गंभीर चिंतन और मनन का विषय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फौरी तौर पर देखा जाए तो इस प्रकार की प्रवृत्ति के लिए घरेलू वातावरण और आस-पास का सामाजिक वातावरण ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है। क्योंकि अच्छी या बुरी आदतें जो भी हैं उसे हम अपने घर और आस-पास के वातावरण से ही तो सीखते हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों घटनाओं में बच्चों का पारिवारिक पृष्ठभूमि आपराधिक प्रवृçत्त का रहा हो, लेकिन संबंधित परिवार अपनी जवाबदेही से बच भी तो नहीं सकता। क्योंकि बच्चों में इस तरह की प्रवृत्ति कहीं न कहीं उनको अपने घरों से मिली आजादी को ही दिखाती है। उनकी हरकतों और गतिविधियों को नजरअंदाज करने का ही उक्त परिणाम है। बच्चों द्वारा गलती करने पर भी गलती को दबाने की कोशिश अभिभावकों द्वारा की जाती है। आज माता-पिता अपने बच्चों पर लगाम कसने में पूरी तरह सफल नहीं हो रहे हैं। बच्चे उनकी कमजोरियों का लाभ उठाकर गलत रास्तों पर जा रहे हैं। अभिभावक यह नहीं देखते की उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? बच्चों को उचित `स्पेश´ देने की मानसिकता ही बच्चों को गलत रास्तों पर ले जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ कम उम्र में ही बच्चों में सेक्स की तरफ आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है। इसके लिए हमारा सिनेमाई और टेलीविजन संस्कृति जिम्मेदार है। सिनेमा और टीवी पर दिखाए जा रहे अश्लील दृश्य बच्चों के मन पर गलत प्रभाव डाल रहे हैं। बहुत सारे चैनलों पर ऐसे धारावाहिक दिखाए जा रहे हैं। जो बड़ों के मन में भी गलत प्रभाव डालते हैं, खैर बच्चे तो बच्चे ही हैं। जब बच्चे इन अश्लील दृश्यों को पर्दे या टीवी पर देखते हैं तो उनके मन में उन दृश्यों को हकीकत में भी देखने की तीव्र जिज्ञासा पनपती है, और यहीं से शुरू हो जाता है उनका गलत रास्तों पर जाने का सिलसिला। मारधाड़ और हीरो की तरह एक्टिंग करने की लालसा भी बच्चों में टीवी और सिनेमा से ही उत्पन्न होती है। और ये वास्तविक जीवन में वैसा करके देखना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले संयुक्त परिवारों में बड़े-बुजुर्ग बच्चों की हरकतों पर नजर रखते थे। लेकिन, अब शहरी एकाकी परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों की हरकतों पर ईमानदारी से नजर नहीं रख पा रहे हैं। यही वजह है कि छोटी उम्र में ही बच्चे बड़ों की तरह कारनामे करने लगे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-2436602752324291739?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/2436602752324291739/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/02/blog-post_05.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/2436602752324291739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/2436602752324291739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/02/blog-post_05.html' title='कलंकित होता बचपन'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-7454132927427541435</id><published>2009-01-29T01:31:00.001+05:30</published><updated>2009-01-31T01:32:45.982+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सपनों का कत्ल'/><title type='text'>दूर होती आम आदमी से शिक्षा</title><content type='html'>दूर होती आम आदमी से शिक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार दिल्ली सरकार ने पब्लिक स्कूलों को फीस बढ़ाने की अनुमति दे ही दी। पहले से ही फीस की भार से बेजार अभिभावक अब दोहरी मार झेलने को विवश हो जाएंगे। बढ़ी फीस भरने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं बचा है। अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत सितंबर 2008 से बढ़ी फीस देने को लेकर है। उच्च आमदनी वालों के लिए तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन आम आदमी के लिए यह बहुत बड़ी बात है सरकार की घोषणा के मुताबिक पब्लिक स्कूल अपने स्टैंडर्ड के अनुसार सौ रुपये से लेकर पाँच सौ रुपये तक वसूलेंगे। क्योंकि स्कूलों को छठे वेतन आयोग के अनुसार अपने शिक्षकों को एरियर का भुगतान करना है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;सबको&lt;/span&gt; शिक्षा उपलब्ध कराने की केंद्र सरकार की घोषणा के बावजूद दिन प्रति दिन महंगी हो रही शिक्षा आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। एक आम आदमी अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में शिक्षा दिलाने का सपना देखने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अव्वल तो उसकी माली हालत उतनी नहीं होगी कि वह फीस वहन कर सके। यदि वह फीस वहन करने की हिम्मत भी कर ले तो बड़े स्कूल उनके बच्चों को एडमीशन नहीं देंगे। दिल्ली में ऐसा ही एक वाकया हालही में प्रकाश में आया है। एक बच्ची को एक नामी स्कूल में इस लिए प्रवेश नहीं दिया गया, क्योंकि उसका पिता फोर्थ ग्रेड का कर्मचारी था। हालांकि, दिल्ली शिक्षा निदेशालय मामले की जांच कर रहा है। यह इकलौता मामला नहीं है ऐसे कई मामले हैं जो प्रकाश में नहीं आते। मजबूरन लोगों को अपने बच्चों को निम्न दर्जे के स्कूल में अथवा एमसीडी के स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह हालात केवल दिल्ली का ही नहीं है। देश के छोटे-बड़े सभी कस्बों और शहरों का है। जहां अभिभावकों के सामने फीस एक यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है। लोग अपनी कमाई का एक भारी हिस्सा बच्चों की फीस और मकान का किराया देने में ही व्यय कर देते हैं। इन स्कूलों में केवल फीस ही नहीं ली जाती है। विभिन्न तरह के कार्यक्रम आयोजित कराने के लिए भी शुल्क लिए जाते हैं। इसके अलावा यहां प्रोजेक्ट वर्क, ड्रेस, पिकनिक आदि के लिए भी शुल्क लिए जाते हैं। बच्चों के प्राइवेट टूशन और किताब-कापियों पर भी भारी खर्च आता है। अभिभावक अपने बच्चों को कटौती करने के लिए मना भी नहीं कर सकते। इन हालातों में आम लोग अपने होनहार बच्चों को भी साधारण स्कूलों में भेज देते हैं। जहां उनकी प्रतिभा खुलकर सामने नहीं आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह भी सही है कि बड़े स्कूलों में भले ही फीस आम आदमी की पहुंच से दूर हो, लेकिन वहां उचित शैक्षिक वातावरण मुहय्यया तो कराया ही जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में सरकार को भी चाहिए कि वह अपने स्कूलों का वातावरण सुधारे ताकि आम आदमी का बच्चा भी बड़े स्कूलों सा वातावरण पा सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-7454132927427541435?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/7454132927427541435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/01/blog-post_28.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7454132927427541435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/7454132927427541435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/01/blog-post_28.html' title='दूर होती आम आदमी से शिक्षा'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-5350122604287194332</id><published>2009-01-18T01:29:00.000+05:30</published><updated>2009-01-19T02:05:25.069+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अब मुन्नागीरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सीख लें गांधीगीरी'/><title type='text'>सीख लें गांधीगीरी</title><content type='html'>नवाबों के शहर को गांधीगीरी सिखाएंगे मुन्ना&lt;br /&gt;फिल्मों में लटको झटको दिखाने के बाद अब लखनऊ की जनता को गांधीगीरी सिखाने के लिए मुन्ना भाई उर्फ संजय दत्त चुनाव लड़ने नवाबों के शहर आ ही गए। इसके साथ ही मीडिया में मचा हो हो हल्ला भी शांत हो गया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब तक जितने भी अभिनेता से नेता बने हैं `कुछं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश संबंधित क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए हैं। संजय दत्त भी उन `कुछं में हो सकते हैं यह कैसे मान लिया जाए। जब वे अपने घर में कोई मिशाल कायम नहीं कर पाए हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लखनऊ में रोड शो के दौरान जब उनसे पत्रकारों ने यह पूछा कि यहां कि तीन सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं? तो जवाब में संजय ने कहा कि आप ही बताएं। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जनता की अपेक्षाएं कितनी पूर्ण होंगी, जब उनको शहर की समस्याओं की ही जानकारी नहीं है तो वह किस आधार पर चुनाव लड़ने लखनऊ आए हैं। सोचने वाली बात है। अब तक देखा गया है कि नेता बनने वाले अभिनेता क्षेत्र की जनता की समस्याएं दूर करने के बजाए फिल्मों और विज्ञापनों की शूटिंग कर धन बटोरने में ही लगे रहते हैं। उनकी चुनावी घोषणा मिट्टी में मिल जाती है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान लोक सभा में जितने भी अभिनेता चुनकर संसद पहुंचे हैं उनमें से किसी ने (एकाध को छोड़ दिया जाए तो) अपने क्षेत्र की जनता अथवा क्षेत्र के विकास के लिए कुछ नहीं किया है। ना ही उन्होंने संसद में संबंधित क्षेत्र की समस्याओं के लिए आवाज ही उठाया। संसद सत्र के दौरान प्रश्न पूछने में भी ये बहुत पीछे रहे हैं। न ही किसी ने अपनी जनता की समस्याओं को लेकर धरना-प्रदर्शन ही किया है। जब इस तरह का इतिहास रहा है इन अभिनेताओं का तो संजय दत्त अलग होंगे, कैसे मान लिया जाए। एक बात और क्या संजय दत्त लखनऊ में ही रह कर क्षेत्र की जनता की सेवा करेंगे अथवा मुंबई जाकर फिल्मों की शूटिंग में लग जाएंगे?&lt;br /&gt;वैसे ये रूपांतरित नेता (अभिनेता से बने) यदि ईमानदारी से पर्दे के ही अपने पात्र को असल जिंदगी में उतार दें तो मुझे लगाता है कि क्षेत्र का कायाकल्प हो सकता है। लेकिन ये लोग ऐसा करते नहीं हैं क्योंकि ये लोग एक तो अभिनेता ऊपर से नेता जो बन जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;खैर अटलगीरी सीख चुकी लखनऊ की जनता इतनी आसानी से गांधीगीरी सीख लेगी कहना जल्दबाजी है। संजय भाई फिल्मों में ही गांधीगीरी सिखाएं तो अच्छा रहेगा। रील और रीयल लाइफ अलग-अलग है। वैसे भी आप जिस पार्टी से चुनाव लड़ने चले हैं उसके राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह आतंकवादियों से लेकर बलात्कारियों तक की पैरवी कर चुके हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-5350122604287194332?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/5350122604287194332/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/01/blog-post_17.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/5350122604287194332'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6214074637194023731/posts/default/5350122604287194332'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/2009/01/blog-post_17.html' title='सीख लें गांधीगीरी'/><author><name>shailesh kumar vijay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13313825514792474333</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_EHu_zonGVCc/SWJjeqV_7hI/AAAAAAAAAAM/9egRCBVuxx4/S220/photo.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6214074637194023731.post-1828436454051510522</id><published>2009-01-10T01:50:00.000+05:30</published><updated>2009-01-10T02:38:15.545+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एक कहानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरा पड़ोसी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुभव'/><title type='text'>मेरा पड़ोसी</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उसके बीवी बच्चों ने धुन डाला।&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं दिल्ली के जिस मोहल्ले की गली में रहता हूं, मेरे मकान के सामने दिल्ली पुलिस के एक हेडकांस्टेबल भी अपने परिवार के साथ रहते हैं। मैं जब इस मकान में रहने आया तो पहली नजर में उस हेडकांस्टेबल को देख कर मुझे लगा कि वह घर का नौकर है या मकान मरम्मत करने वाला कोई राजमिस्त्री। लेकिन बाद में पता चला कि वह तो घर का मालिक है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;यही नहीं मैं जिस घर में रहता हूं। वह उसी का था, जिसे उसने मेरे मकान मालिक को बेच दिया था। वह हेडकांस्टेबल सुबह चार बजे उठ जाता है और देर रात तक मकान में तोड़फोड़ या मरम्मत करता रहता है। उसके इस कार्य से और लोगों को कोई दिक्कत होती है कि नहीं मैं यह तो नहीं जानता लेकिन मुझे बहुत परेशानी होती है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हालांकि, मैं केवल मन ही मन उसके प्रति गुस्सा रखता हूं। कुछ कहता नहीं हूं। इस लिए नहीं कि वह पुलिस वाला है, बल्कि इस लिए कि वह बहुत बदतमीज किस्म का इंसान है। उसके परिवार में फिलहाल कुल पांच प्राणी हैं। पति-पत्नी एक बेटा और तीन बेटियां। एक बेटी और है। जो उसके बच्चों में वह सबसे बड़ी है। लोगों का कहना है कि वह मोहल्ले के ही एक लड़के से प्रेम करती थी और अपने घर वालों के मर्जी के विरुद्ध उससे शादी कर ली थी। शुरू में तो घर वाले नाराज जरूर हुए लेकिन बाद में सब सामान्य हो गया और वह अब अपने मायके आती जाती है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;उस&lt;/span&gt; हेडकांस्टेबल को गली वाले पागल कहते हैं। उसके परिवार वाले भी उसे पागल ही मानते हैं। उसका इलाज भी चल रहा है। वह शराब का भी शौक रखता है। इन दिनों वह मेडिकल लीव पर है, और डियूटी नहीं जाता है। तनख्वाह मिलने वाले दिन उसकी पत्नी जा कर पैसा ले लेती है। कुछ पैसा उसे खर्च के लिए किसी तरह मिल जाता है। इन पैसों को वह शराब आदि में खर्च कर देता है। घर का वातावरण देखने से लगता है कि उसका घर वालों से सामंजस्य नहीं बैठता है। किसी से वह बात नहीं करता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिछले साल के आखिरी महीने के एक दिन वह शाम के समय शराब पी कर आया और किसी बात पर अपनी द्वितीय क्रम की लड़की को चांटा मार दिया। उसने उसे कई बार चांटा मारा। शुरू में तो लड़की कुछ बोली नहीं लेकिन बाद में वह विरोध पर उतर आई। अपने जन्मदाता पिता को वह भी एक तमाचा जड़ दिया। इतने में उसकी पत्नी और उसका बेटा और छोटी वाली बेटी भी आ गई। इसके बाद तो शुरू हो गया रिश्तों के खून करने का दौर, और दिखने लगा तथाकथित शहरी होने का उदाहरण। उसके बेटे ने उसका गिरेबां पकड़ कर उसे पटक दिया। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसकी पत्नी जो उसके लिए परमेश्वर होना चाहिए था अपनी दोनों बेटियों के साथ पिटना शुरू कर दिया और तब तक पिटती रहीं जब-तक की वह निढाल नहीं हो गया। वह मोहल्ले वालों से मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन कोई मदद को नहीं आया। बाद में उसके घर वालों ने अपने एक परिचित मेडिकल स्टोर वाले को बुला कर बेहोशी का इंजेक्शन लगवा दिया। हालांकि, वह दूसरे दिन सामान्य दिनों की तरह अपने काम पर लगा गया था। लेकिन आज के रिश्तों की आधुनिकता की झलक उसने दिखा दी। इन दिनों मेरी मां गांव से आईं हुईं हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस घटना पर उनका कहना था कि यहां के लोग कैसे हैं मदद के लिए बुलाने पर भी नहीं आते। मैं उन्हें कैसे बताता कि यह गांव नहीं शहर है! बाद में मैं भी उस हेडकांस्टेबल को पागल मानने लगा। मुझे लगता है कि शायद आप भी उसे पागल मानने लगें। क्योंकि उसने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति अपनी पत्नी के नाम कर दी है। या यों कहें कि उसके घर वालों ने उससे जबरिया लिखवा ली है। क्या अब समाज की यही हकीकत होने जा रही है। यदि वह अपनी संपत्ति को अपने पास रखता तो उसकी कम से कम यह हालत नहीं होती। उसके घर वाले उसकी पिटाई नहीं करते। थोड़ी बहुत इज्ज्त करते और वह मालिक की तरह घर में रहता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अब वह बीवी बच्चों से मार खाने के बाद जलालत की जिंदगी गुजार रहा है। मुझे लगता है कि आदमी को अपने पांव में उसके तरह कुलहाड़ी नहीं मारनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6214074637194023731-1828436454051510522?l=jamdaganikidharti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jamdaganikidharti.blogspot.com/feeds/1828436454051510522/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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