July 6, 2009
समाज को नहीं अपनी सोंच बदलें समलैंगिकता के पैरोकार
समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय भले ही कुछ पश्चिमप्रस्त मीडिया संस्थानों और संगठनों के लिए ऐतिहासिक और प्रगतिवादी फैसला लग रहा हो लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता इसको गैर जरूरी और अव्यवहारिक निर्णय मानती है। आप कुछ मुठी भर लोगों की खुशियों के लिए देश की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से छेड़छाड़ करने की खुली छूट तो नहीं दे सकते।
समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली धारा 377 को बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन कुछ लोगों को भले ही लगता है लेकिन इस तरह के संबंधों को वैधानिक स्वरूप प्रदान करना भी तो बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का मजाक उड़ाना है।
यदि धारा 377 से कुछ लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो होता रहे। इसके लिए समाज को विघटित और शर्मिंदा करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्षमा चाहूंगा। एक अपराधी अपराध करना अपना अधिकार समझता है, आतंकवादी आतंकवाद फैलाना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, चोर चोरी करना अपना मौलिक अधिकार मानते हैं तो क्या इन्हें भी छूट दी जा सकती है! मेरा आशय समलैंगिकों को अपराधी या आतंकवादी अथवा गलत लोगों की श्रेणी में खड़ा करना नहीं है। वरन मैं मेरा यह आग्रह है कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिस पर सोच विचार कर और बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया जाना चाहिए।
रामदेव जी ने ठीक ही कहा है कि समलैंगिक लोग मानसिक रूप से बीमार हैं उन्हें अस्पताल भेजना होगा। बकौल रामदेव जी समाज की सोच बदलने की जगह ऐसे लोगों को योग और प्राणायाम के जरिए अपने को बदलना चाहिए। आप समाज के साथ चलिए।
सवाल यह नहीं है कि समलैंगिकता को मान्यता मिलनी चाहिए या नहीं। गौरतलब बात यह है कि आखिर हम भारत को क्या बनाना चाहते हैं? पहले यह तय करना होगा। कृपया, भारत को भारत ही रहने दें तो अच्छा होगा, देश पर पाश्चात्य संस्कृति को थोपने की जरूरत नहीं है। भारत की अपनी संस्कृति, अपनी मान्यता, अपनी पहचान, परंपरा और एक छवि है। ऐसे में आप पश्चिम की बुरी सभ्यताओं को क्यों ग्रहण करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में केवल बुराइयां ही हैं अच्छाइयां भी हैं आप उन्हें ग्रहण करें। आप यह न भूलें कि भारत को विश्व धर्म गुरू के रूप में भी जाना जाता था।
दरअसल, कुछ संस्थाएं और कुछ लोग ऐसे हैं जो देश की संस्कृति और परंपराओं के विरुद्ध षडयंत्र करने में लगे हैं। वे चाहते हैं कि भारत की प्राचीन संस्कृति विनष्ट हो जाए और पाश्चात्य की बुरी सभ्यता यहां खुलेआम चलें। पश्चिम में तो बच्चों की एक बड़ी संख्या है जिनके असली पिता के बारे में उनकी माताओं को ही निश्चित तौर पर पता नहीं होता है। यहां भी कुछ लोग ऐसी ही संस्कृति विकसित करना चाहते हैं। जहां उन्हें कोई टोकने वाला न हो। लेकिन ऐसी आजादी, ऐसी संस्कृति को भारतीय लोग बर्दास्त नहीं करेंगे।
समलैंगिकता भारतीयों की सोच या संस्कृति से मेल नहीं खाती। भारत में कभी भी इस तरह के संबंधों को मान्यता नहीं मिली। जिस कामसूत्र और प्राचीन भिçत्त चित्रों को आधार बनाकर इसे जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। उसके निहितार्थ को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है। कामसूत्र के रचनाकार कोई साधारण उपन्यास या निबंध लेखक नहीं थे उन्हें देश, काल और परिस्थितियों का अच्छी तरह से ज्ञान था। वे प्रकृति और संस्कृति विरुद्ध कार्य करने की इजाजत कैसे दे सकते थे। जिस संबंध का (जिसे कुछ लोग समलैंगिकता मान रहे हैं) कामसूत्र में वर्णन किया गया है उसको गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता है। उस प्रसंग का वाकई में क्या अर्थ होना चाहिए? यह जानने की कोशिश होनी चाहिए। जिस संबंध का जिक्र है वह किसके साथ, कब, कहां और क्यों करना चाहिए यह जानना होगा। हमें प्राचीन ग्रंथों में वणिüत प्रसंगों का उदाहरण देने से पहले उस प्रसंग की सारगभिüता को भी ध्यान में रखना होगा।
समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसला का देश में हो रहे चौतरफा विरोध को नकारा नहीं जा सकता। लगभग सभी राजनीतिक दल और सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने भारी विरोध किया है। जदयू के शरद यादव ने ठीक ही कहा है कि देश में और भी गंभीर मुद्दे हैं जिस पर बहस होनी चाहिए। ऐसे मुद्दों पर बहस कर समय और ऊर्जा बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।
वैसे भी समलैंगिकता के पैरोकार देश के कुछ शहरों में ही हैं। जिनकी जनसँख्या पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ऐसे संबंधों के बारे में लोग सोचना भी पसंद नहीं करते। कुछ एक अपवाद हो सकते हैं।
समलैंगिक तो जानवर भी नहीं होते। हम मनुष्य होकर ऐसे संबंधों की पैरोकारी क्यों कर रहे हैं? इस पर भी जरा सोचें..............
June 11, 2009
कुछ राजनीतिक दलों की क्षुद्र राजनीति के चलते वर्षों से अधर में लटके महिला आरक्षण विधेयक पर इस बार भी संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। अपने गठबंधन के दम पर फिर से सत्ता में लौटी कांग्रेस से न केवल महिलाओं को बल्कि आम आदमी को भी उम्मीद है कि इस बार विधेयक कानून बन जाएगा। लेकिन शरद यादव सहित कुछ अन्य नेताओं की स्वार्थपूर्ण राजनीति के चलते कुछ संदेह उत्पन्न होने लगा है। हालांकि, सकारात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इस विधेयक का समर्थन करने का फैसला किया है।
मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक का विरोध करने का ठोस कारण किसी पार्टी के पास नहीं है। जो दल विरोध कर रहे हैं उसके पीछे उनकी मंशा पर संदेह पैदा होता है। दरअसल, यह दल आरक्षण के आड़ में अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं और महिलाओं को भी आरक्षण के नाम पर बांट देना चाहते हैं।
शरद यादव को मैं सुलझा हुआ और लालू, मुलायम-पासवान से अलग समग्र समाज की राजनीति करने वाला नेता मानता था, लेकिन आरक्षण के नाम पर जहर खाने की बात कह कर उन्होंने भी अपना असली चेहरा दिखा दिया है कि वह भी जाति और समाज को बांटने की राजनीति करने वालों से अलग नहीं हैं। बिहार में राजद और लोजपा को छोड़ दिया जाए तो जदयू को भी भाजपा और कांग्रेस की तरह समाज के हर जाति और वर्ग के लोग वोट देते हैं। ऐसे में शरद यादव आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग करके कौन सी राजनीति कर रहे हैं।
शरद यादव एक राष्ट्रीय स्तर के गठबंधन के संयोजक हैं फिर भी वह अपनी क्षेत्रीय सोच से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही वह भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा मोदी को आडवाणी के बाद प्रधानमंत्री के लिए नाम उछाले जाने पर गठबंधन धर्म की दुहाई देते घूम रहे थे। लेकिन खुद क्या कर रहे हैं। दरअसल, जदयू का जनाधार महज बिहार (झारखंड में भी तोड़ा बहुत) तक ही सीमित है। शरद यादव को लगता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग पर जहर खाने की धमकी देकर वह लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के वोट बैंक पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन ऐसा होगा नहीं। क्योंकि बिहार में लालू प्रसाद को कमजोर नहीं माना जा सकता है। आज भी लालू की लोकप्रियता सर्वाधिक है। वहीं शरद यादव जीतने के बाद भी लोकप्रिय नेता नहीं माने जाते हैं।
ऐसे में आरक्षण के नाम पर उनकी सोच हास्यास्पद ही है। पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था से पहले जो लोग एक साथ मिलजुल कर रहते थे वह आज चुनाव में आमने-सामने होने से एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। चुनावी रंजिश को लेकर मरने-मारने के लिए साजिश करते रहते हैं।
संसद में राष्ट्रपति महोदया के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के दौरान अपने संबोधन में लालू ने महिला आरक्षण के बारे में जो कुछ भी कहा उस पर हंसी आती है। लालू का यह कहना कि आरक्षण के भीतर आरक्षण का विरोध करने वाले लोग पिछड़ों और दलितों को संसद और राजनीति से बाहर करना चाहते हैं। कितनी छोटी सोच है। यह कौन सी समाजिक न्याय की व्यवस्था है। एक को आगे लाएं और दूसरे को गड्ढे में गिराएं।
हो सकता है मेरी बात कुछ लोगों को अप्रिय लगे, लेकिन सच तो यह है कि हर क्षेत्र में आरक्षण की मांग करके लालू सरीखे लोग सवर्ण जातियों को ही संसद और विधान सभाओं से बाहर करना चाहते हैं। पहले से ही मुख्य धारा की राजनीति में आरक्षण की व्यवस्था है। अब महिला आरक्षण में भी आरक्षण की मांग! इससे तो समतामूलक समाज की स्थापना नहीं हो सकता। इससे तो समाज में कुछ जातियां ऊपर उठेंगी और कुछ मुख्य धारा से पीछे होती जाएंगी। वैसे भी संसद और विधान सभाओं में सवर्ण जातियों की संख्या अब कम होती जा रही है।
यदि पिछड़ों और दलितों को संसद से बाहर करना होता तो कांग्रेस मीरा कुमार को लोक सभा का स्पीकर नहीं बनाती और नहीं भाजपा आदिवासी नेता को डिप्टी स्पीकर के पद पर बैठाती। कांग्रेस और भाजपा में समाज के हर वर्ग और जाति को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता रहा है।
April 13, 2009
एक बार फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत के लिए चुनाव का समय आ गया है। फिर से राजनीतिक दल घिसे-पिटे मुद्दों और जनता को बरगलाने के लिए अपने घोषणापत्र के साथ इस महासमर में हाजिर हैं। गरीब जनता को कोई दो रुपये किलो चावल देने की बात कर रहा है तो कोई सांप्रदायिकता की बात उछाल कर अल्पसंख्यक वोट हथियाने की जोर आजमाइश करता नजर आ रहा है। लबोलुआब यह कि किसी भी दल या गठबंधन के घोषणापत्र में देश के लिए भावी `विजनं या आम आदमी के लिए कुछ भी `खासं नहीं है।
इस बार के चुनाव में राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय दल सभी एक समान नजर आ रहे हैं। राष्ट्रीय दलों के पास राष्ट्र के लिए न तो कोई दुरगामी उम्दा दृष्टिकोण ही है और न ही क्षेत्रीय दलों के पास राज्य विशेष या क्षेत्र विशेष के विकास के लिए अलग खाका ही है। कुछ है भी तो पुराने वायदे और नारे।
पिछले कई चुनावों की भांति इस बार भी अधिकांश पाटिüयों के नेता मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करने के लिए जीतोड़ प्रयास कर रहे हैं। इस मुहिम में कुछ दलों को छोड़ दिया जाए तो पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण के राज्यों में छोटे और बड़े दलों के क्षत्रप अपने को अल्पसंख्यक (मुस्लिम) हितैषी होने का दम भरते नजर आ रहे हैं। कोई उन्हें सांप्रदायिकता का भय दिखा रहा है तो कोई उन्हें विशेष सुविधाओं की बात कह रहा है।
दरअसल, पिछले कई दशक से देश में विभिन्न पार्टियों द्वारा अपने को मुस्लिम हितैषी होने या दिखाने का प्रचलन सा चल निकला है। सच्चाई तो यह है कि कोई भी दल वोट की राजनीति से ऊपर उठ कर उनके बारे में गंभीर ही नहीं है। केवल हौव्वा खड़ा करने और एक अनजाने सा भय उनके मन में डालने के अलावा यह कुछ नहीं करते।
वैसे यह दल भूल जाते हैं कि मुस्लिम मतदाता भी उनकी चाल को अच्छी तरह से समझते हैं। मुस्लिम समुदाय को पता है कि वह किस दल या विचारधारा से जुड़ेंगे तो उनका विकास होगा। एक शिक्षित और आम मुस्लिम मतदाता इन दलों के झांसे में आने वाला नहीं है।
मुस्लिम समुदाय को समझ है कि चुनाव के दौरान उनका केवल इस्तेमाल किया जाता है। जो नहीं है उसे पेश किया जाता है। मेरे आदरणीय मित्र प्रो. हामिद अंसारी ने एक बार कहा था कि मुसलमान अब समझदार और शिक्षित हैं। उन्हें पता है कि कौन से दल उनका वाकई में भला कर सकते हैं।
ताजा घटनाक्रम को ही लिया जाए तो वरुण गांधी पर रासुका लगाने के पीछे उत्तर प्रदेश सरकार की मुस्लिम मतदाताओं को छिटकने से रोकने की कोशिश ही है। इसी तरह किशनगंज के चुनावी सभा में रेलमंत्री लालू प्रसाद द्वारा वरुण पर बुलडोजर चलवाने की बात कहना भी मुस्लिम समुदाय को खुश करने वाली ही बात है।
हद तो तब हो जाती है जब लोजपा प्रमुख द्वारा अपनी पार्टी की घोषणापत्र में आरएसएस और विहिप पर प्रतिबंध लगाने की बात कह कर इस समुदाय को रिझाने की कोशिश करते हैं। इस बात को सभी लोग जानते हैं कि जिस दल का एक राज्य में भी सरकार नहीं है और न ही उतने विधायक या एमपी ही हैं जो किसी नीति को प्रभावित कर सकें। ऐसे लोग या ऐसे दल किसी का क्या भला कर सकते हैं। यह अपना केवल उल्लू सीधा कर सकते हैं और कुछ नहीं। यह कुछ ताजातरीन उदाहरण हैं। ऐसे बहुत से दल हैं जो केवल वोट की राजनीति ही करते हैं। अब ऐसे में मुस्लिम समुदाय को निर्णय करना है कि वह केवल वोट बैंक ही बने रहेंगे या....?
April 1, 2009
देश में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या चिंता का कारण बनती जा रही है। अपने निहित स्वार्थ और अहम के चलते यह दल केंद्र को महेशा कमजोर ही करते नजर आते हैं। केंद्र में क्षेत्रीय दलों की भूमिका कुछ हद तक लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए ठीक है। लेकिन व्यापक तौर पर देखा जाए तो क्षेत्रीय दल अपने निहित स्वार्थों और क्षुद्र राजनीतिक हितों के लिए केंद्र को कमजोर करने का ही काम करते हैं। इससे हमारा लोकतंत्र ही तो कमजोर होता है। इन क्षेत्रीय दलों के सामने जिस तरह राष्ट्रीय दल बेवश नजर आते हैं उससे तो लगता है कि देश में राष्ट्रीयता पर क्षेत्रीयता हावी होती जा रही है। राष्ट्रीय हित क्षेत्रीय हित पर बली चढ़ते जा रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने राज्यों में कुछ राजनीतिक मजबुरियां हैं। लेकिन, राष्ट्रीय हित तो सबके लिए सवोüपरि होना चाहिए।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि केंद्र में सभी राज्यों और क्षेत्रों का समान प्रतिनिधित्व हो ताकि, विकास के मामले में कोई भी क्षेत्र पिछड़ा न रह जाए और देश के हर नागरिक को विकास का समान अवसर हासिल हो सके। यह तभी हो सकता है जब क्षेत्रीय दलों की भूमिका केंद्र सरकार में सार्थक हो। निश्चित तौर पर क्षेत्रीय दल अपने प्रदेशों की समस्याओं को पूरजोर तरीके से उठा सकते हैं। यही नहीं केंद्र सरकार पर दबाव बना कर समस्याओं का समाधान भी करवा सकतीं हैं। पर ऐसा होता है नहीं है। देखा गया है कि समाधान कम, यश लेने में ज्यादे रुचि लेते छोटे दलों के नेता।
केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में राजग गठबंधन की सरकार हो या कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबंधन की सरकार। दोनों ही सरकारें क्षेत्रीय दलों की सहयोग से बनीं। दोनों गठबंधनों ने पांच साल सरकार चलाई। पूरे कार्यकाल में सरकारें क्षेत्रीय पार्टियों की रिमोट से ही चलती रहीं हैं। ये दल अपने समर्थन की पूरी कीमत वसूलते हैं। चाहे सरकार में शामिल हो कर मंत्री बनने का हो या अपने संबंधित प्रदेशों के लिए विशेष पैकेज प्राप्त करने की हो अथवा अपने दलों के प्रमुखों या नेताओं पर लगे आरोपी की जांच की धार को कुंद करने की हो। इन दलों ने केंद्र की नीति को हर वक्त प्रभावित और कमजोर करने का ही काम किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि कोई भी राष्ट्रीय दल की नेतृत्व वाली सरकार स्वतंत्र और समग्र रूप से राष्ट्रीय हित को तरजीह नहीं दे सकी। चाहे बात विदेश या घरेलु निति का हो केंद्र सरकारों ने क्षेत्रीय दलों को संतुष्ट करने का प्रयास किया।
इन क्षेत्रीय दलों की कोई सिद्धांत भी नहीं है। कभी राजग के साथ तो कभी यूपीए के साथ। मतलब शुद्ध रूप से मौकापरस्ती। बिहार की लोजपा को ही लें तो राजग की सरकार में भी यह पार्टी शामिल थी तो यूपीए के साथ भी। हालांकि, राजग के कार्यकाल में गुजरातकांड के चलते (यह कहा जाए की मुस्लिम वोट के लिए तो गलत नहीं हो सकता) लोजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। उसी तरह नेशनल कांफ्रेंस भी अवसरवाद को ही बढ़ावा दिया है। राजग में उमर अब्दुल्ला मंत्री थे तो इस समय कांग्रेस की मदद से जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री। यह तो एक उदाहरण मात्र है। इस तरह से बहुत सारी पार्टिया हैं जो अपने हित साधने के लिए राष्ट्रीय दलों के साथ हो जाती हैं और मौका के बाद फिर दूसरे राष्ट्रीय गठबंधन के साथ हो जाती हैं।
अपने देश में क्षेत्रीय दलों की बाढ़ सी आ गई है। इनकी संख्या को देखा जाए तो उतनी तो लोक सभा में सीटें भी नहीं हैं। हर कोई पार्टी बना कर कुछ न कुछ ऐंठना चाहता है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों की बाढ़ रोकने के लिए चुनाव आयोग को पहल करनी होगी। बेहतर तो होता संसद में इसके लिए कानून बनाया जाता है। देश में दो या तीन दलीय व्यवस्था ही भारत को विकसित देशों की कतार में ला सकती है। दलों की संख्या कम हो जाए तो हमारा देश स्वयं दलदली लोकतंत्र होने से बच जाएगा।
वैसे भी इन दलों से क्षेत्रीय विकास को बहुत बल मिला हो ऐसा कुछ दिखता नहीं। लालू प्रसाद और मुलायलम जी (एकाध प्रदेशों में इनकी पार्टी की उपस्थिती देखी गई है), अपनी पार्टी बना कर बिहार और उत्तर प्रदेश में अपनी सरकारें काफी समय तक चलाएं हैं लेकिन इन राज्यों में विकास तो कुछ भी नहीं दिखता। उल्टे बीमारू राज्य की श्रेणी में यह राज्य आते हैं। झारखंड मुçक्त मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, मनसे, जेडीएस, जेडीयू सहित देश भर की तमाम छोटे दल स्वस्थ लोकतंत्र को मजबूती देने का काम कर रहे हों ऐसा कुछ नहीं है। अलबत्ता कई बार संसदयी गरीमा को ठेस भी पहुंचाने में ये पीछे नहीं रहे हैं।
अब समय आ गया है कि देश के आम आदमी इन क्षेत्रीय दलों को बाहर का रास्ता दिखा कर राष्ट्रीयता को मजबूती दे। देश में दो या तीन दलों का होना ही सही होगा। अन्यथा वह समय दूर नहीं है जब केेवल क्षेत्रीयता ही होगी राष्ट्रीयता की कहीं भनक भी नहीं लगेगी। क्योंकि, जिस तरह से क्षेत्रीय और छोटे दलों के क्षत्रप संकीर्ण और स्वार्थपूर्ण राजनीति से प्रेरित हो कर राजनीति कर रहे हैं। उससे बहुत से सवाल और संदेह मन में पैदा होते हैं।
February 5, 2009
कलंकित होता बचपन
दिल्ली में एक 13 वर्षीय बच्चे की शर्मसार कर देने वाली करतूत बच्चों की दुनिया की एक विकृत चेहरा दिखाती है। कि कैसे अब बच्चे भी हिंसा, सेक्स और नशे की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। यह उस वर्ग की हकीकत है जिसे केवल पढ़ने और खेल-कूद में ही अपना समय बिताना चाहिए। लेकिन, हो इसके उल्ट रहा है। पिछले दो-तीन दिनों के अंदर दिल्ली में बच्चों द्वारा कुछ ऐसी घटनाएं की गईं हैं जिसे सुनकर सहसा विश्वास नहीं होता की इस उम्र में बच्चे भी ऐसी हरकतें कर सकते हैं। दिल्ली की गोविंदपुर में रहने वाले एक 13 साल के लड़के ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दी। उसने एक फरवरी को अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक पांच वर्ष की मासूम को न केवल अपने हवस का शिकार बनाया, बल्कि उसके संवेदनशील अंगों पर ब्लेड से वार कर उसे जख्मी भी कर दिया। वारदात से पहले उसने थिनर का सेवन किया था, जब नशा चढ़ गई तो उसने इस घटना को अंजाम दे डाला। हालांकि, बच्ची की रोने की आवाज सुनकर लोगों ने उस लड़के को जमकर धुनाई कर पुलिस को सौंप दिया। जिसे अदालत ने बाल सुधार गृह में भेज दिया। इसके अलावा दूसरी घटना भी कम रोंगटे खड़ा करने वाली नहीं है। क्रिकेट खेलने के दौरान बात न मानने और मामूली विवाद पर एक लड़के ने एक पांच वर्षीय बच्चे की गर्दन पर चाकू से वार कर दी जिससे गर्दन की नस कट जाने से उस मासूम की मौत हो गई। उसको भी अदालत द्वारा बाल सुधारगृह में भेज दिया गया है। ये दोनों घटनाएं बच्चों में भी बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को दर्शाने के लिए काफी हैं। वैसे ऐसी कई घटनाएं हैं जो प्रकाश में नहीं आतीं हैं। बच्चों में बढ़ रही इस तरह की प्रवृत्ति के लिए किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए? यह गंभीर चिंतन और मनन का विषय है।
फौरी तौर पर देखा जाए तो इस प्रकार की प्रवृत्ति के लिए घरेलू वातावरण और आस-पास का सामाजिक वातावरण ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है। क्योंकि अच्छी या बुरी आदतें जो भी हैं उसे हम अपने घर और आस-पास के वातावरण से ही तो सीखते हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों घटनाओं में बच्चों का पारिवारिक पृष्ठभूमि आपराधिक प्रवृçत्त का रहा हो, लेकिन संबंधित परिवार अपनी जवाबदेही से बच भी तो नहीं सकता। क्योंकि बच्चों में इस तरह की प्रवृत्ति कहीं न कहीं उनको अपने घरों से मिली आजादी को ही दिखाती है। उनकी हरकतों और गतिविधियों को नजरअंदाज करने का ही उक्त परिणाम है। बच्चों द्वारा गलती करने पर भी गलती को दबाने की कोशिश अभिभावकों द्वारा की जाती है। आज माता-पिता अपने बच्चों पर लगाम कसने में पूरी तरह सफल नहीं हो रहे हैं। बच्चे उनकी कमजोरियों का लाभ उठाकर गलत रास्तों पर जा रहे हैं। अभिभावक यह नहीं देखते की उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? बच्चों को उचित `स्पेश´ देने की मानसिकता ही बच्चों को गलत रास्तों पर ले जा रही है।
दूसरी तरफ कम उम्र में ही बच्चों में सेक्स की तरफ आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है। इसके लिए हमारा सिनेमाई और टेलीविजन संस्कृति जिम्मेदार है। सिनेमा और टीवी पर दिखाए जा रहे अश्लील दृश्य बच्चों के मन पर गलत प्रभाव डाल रहे हैं। बहुत सारे चैनलों पर ऐसे धारावाहिक दिखाए जा रहे हैं। जो बड़ों के मन में भी गलत प्रभाव डालते हैं, खैर बच्चे तो बच्चे ही हैं। जब बच्चे इन अश्लील दृश्यों को पर्दे या टीवी पर देखते हैं तो उनके मन में उन दृश्यों को हकीकत में भी देखने की तीव्र जिज्ञासा पनपती है, और यहीं से शुरू हो जाता है उनका गलत रास्तों पर जाने का सिलसिला। मारधाड़ और हीरो की तरह एक्टिंग करने की लालसा भी बच्चों में टीवी और सिनेमा से ही उत्पन्न होती है। और ये वास्तविक जीवन में वैसा करके देखना चाहते हैं।
पहले संयुक्त परिवारों में बड़े-बुजुर्ग बच्चों की हरकतों पर नजर रखते थे। लेकिन, अब शहरी एकाकी परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों की हरकतों पर ईमानदारी से नजर नहीं रख पा रहे हैं। यही वजह है कि छोटी उम्र में ही बच्चे बड़ों की तरह कारनामे करने लगे हैं।
January 29, 2009
दूर होती आम आदमी से शिक्षा
आखिरकार दिल्ली सरकार ने पब्लिक स्कूलों को फीस बढ़ाने की अनुमति दे ही दी। पहले से ही फीस की भार से बेजार अभिभावक अब दोहरी मार झेलने को विवश हो जाएंगे। बढ़ी फीस भरने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं बचा है। अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत सितंबर 2008 से बढ़ी फीस देने को लेकर है। उच्च आमदनी वालों के लिए तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन आम आदमी के लिए यह बहुत बड़ी बात है सरकार की घोषणा के मुताबिक पब्लिक स्कूल अपने स्टैंडर्ड के अनुसार सौ रुपये से लेकर पाँच सौ रुपये तक वसूलेंगे। क्योंकि स्कूलों को छठे वेतन आयोग के अनुसार अपने शिक्षकों को एरियर का भुगतान करना है।
सबको शिक्षा उपलब्ध कराने की केंद्र सरकार की घोषणा के बावजूद दिन प्रति दिन महंगी हो रही शिक्षा आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। एक आम आदमी अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में शिक्षा दिलाने का सपना देखने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अव्वल तो उसकी माली हालत उतनी नहीं होगी कि वह फीस वहन कर सके। यदि वह फीस वहन करने की हिम्मत भी कर ले तो बड़े स्कूल उनके बच्चों को एडमीशन नहीं देंगे। दिल्ली में ऐसा ही एक वाकया हालही में प्रकाश में आया है। एक बच्ची को एक नामी स्कूल में इस लिए प्रवेश नहीं दिया गया, क्योंकि उसका पिता फोर्थ ग्रेड का कर्मचारी था। हालांकि, दिल्ली शिक्षा निदेशालय मामले की जांच कर रहा है। यह इकलौता मामला नहीं है ऐसे कई मामले हैं जो प्रकाश में नहीं आते। मजबूरन लोगों को अपने बच्चों को निम्न दर्जे के स्कूल में अथवा एमसीडी के स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है।
यह हालात केवल दिल्ली का ही नहीं है। देश के छोटे-बड़े सभी कस्बों और शहरों का है। जहां अभिभावकों के सामने फीस एक यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है। लोग अपनी कमाई का एक भारी हिस्सा बच्चों की फीस और मकान का किराया देने में ही व्यय कर देते हैं। इन स्कूलों में केवल फीस ही नहीं ली जाती है। विभिन्न तरह के कार्यक्रम आयोजित कराने के लिए भी शुल्क लिए जाते हैं। इसके अलावा यहां प्रोजेक्ट वर्क, ड्रेस, पिकनिक आदि के लिए भी शुल्क लिए जाते हैं। बच्चों के प्राइवेट टूशन और किताब-कापियों पर भी भारी खर्च आता है। अभिभावक अपने बच्चों को कटौती करने के लिए मना भी नहीं कर सकते। इन हालातों में आम लोग अपने होनहार बच्चों को भी साधारण स्कूलों में भेज देते हैं। जहां उनकी प्रतिभा खुलकर सामने नहीं आती।
वैसे यह भी सही है कि बड़े स्कूलों में भले ही फीस आम आदमी की पहुंच से दूर हो, लेकिन वहां उचित शैक्षिक वातावरण मुहय्यया तो कराया ही जाता है।
ऐसे में सरकार को भी चाहिए कि वह अपने स्कूलों का वातावरण सुधारे ताकि आम आदमी का बच्चा भी बड़े स्कूलों सा वातावरण पा सके।
January 18, 2009
सीख लें गांधीगीरी
फिल्मों में लटको झटको दिखाने के बाद अब लखनऊ की जनता को गांधीगीरी सिखाने के लिए मुन्ना भाई उर्फ संजय दत्त चुनाव लड़ने नवाबों के शहर आ ही गए। इसके साथ ही मीडिया में मचा हो हो हल्ला भी शांत हो गया।
अब तक जितने भी अभिनेता से नेता बने हैं `कुछं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश संबंधित क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए हैं। संजय दत्त भी उन `कुछं में हो सकते हैं यह कैसे मान लिया जाए। जब वे अपने घर में कोई मिशाल कायम नहीं कर पाए हैं।
लखनऊ में रोड शो के दौरान जब उनसे पत्रकारों ने यह पूछा कि यहां कि तीन सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं? तो जवाब में संजय ने कहा कि आप ही बताएं। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जनता की अपेक्षाएं कितनी पूर्ण होंगी, जब उनको शहर की समस्याओं की ही जानकारी नहीं है तो वह किस आधार पर चुनाव लड़ने लखनऊ आए हैं। सोचने वाली बात है। अब तक देखा गया है कि नेता बनने वाले अभिनेता क्षेत्र की जनता की समस्याएं दूर करने के बजाए फिल्मों और विज्ञापनों की शूटिंग कर धन बटोरने में ही लगे रहते हैं। उनकी चुनावी घोषणा मिट्टी में मिल जाती है।
वर्तमान लोक सभा में जितने भी अभिनेता चुनकर संसद पहुंचे हैं उनमें से किसी ने (एकाध को छोड़ दिया जाए तो) अपने क्षेत्र की जनता अथवा क्षेत्र के विकास के लिए कुछ नहीं किया है। ना ही उन्होंने संसद में संबंधित क्षेत्र की समस्याओं के लिए आवाज ही उठाया। संसद सत्र के दौरान प्रश्न पूछने में भी ये बहुत पीछे रहे हैं। न ही किसी ने अपनी जनता की समस्याओं को लेकर धरना-प्रदर्शन ही किया है। जब इस तरह का इतिहास रहा है इन अभिनेताओं का तो संजय दत्त अलग होंगे, कैसे मान लिया जाए। एक बात और क्या संजय दत्त लखनऊ में ही रह कर क्षेत्र की जनता की सेवा करेंगे अथवा मुंबई जाकर फिल्मों की शूटिंग में लग जाएंगे?
वैसे ये रूपांतरित नेता (अभिनेता से बने) यदि ईमानदारी से पर्दे के ही अपने पात्र को असल जिंदगी में उतार दें तो मुझे लगाता है कि क्षेत्र का कायाकल्प हो सकता है। लेकिन ये लोग ऐसा करते नहीं हैं क्योंकि ये लोग एक तो अभिनेता ऊपर से नेता जो बन जाते हैं।
खैर अटलगीरी सीख चुकी लखनऊ की जनता इतनी आसानी से गांधीगीरी सीख लेगी कहना जल्दबाजी है। संजय भाई फिल्मों में ही गांधीगीरी सिखाएं तो अच्छा रहेगा। रील और रीयल लाइफ अलग-अलग है। वैसे भी आप जिस पार्टी से चुनाव लड़ने चले हैं उसके राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह आतंकवादियों से लेकर बलात्कारियों तक की पैरवी कर चुके हैं।
January 10, 2009
मेरा पड़ोसी
उसके बीवी बच्चों ने धुन डाला।
मैं दिल्ली के जिस मोहल्ले की गली में रहता हूं, मेरे मकान के सामने दिल्ली पुलिस के एक हेडकांस्टेबल भी अपने परिवार के साथ रहते हैं। मैं जब इस मकान में रहने आया तो पहली नजर में उस हेडकांस्टेबल को देख कर मुझे लगा कि वह घर का नौकर है या मकान मरम्मत करने वाला कोई राजमिस्त्री। लेकिन बाद में पता चला कि वह तो घर का मालिक है।
यही नहीं मैं जिस घर में रहता हूं। वह उसी का था, जिसे उसने मेरे मकान मालिक को बेच दिया था। वह हेडकांस्टेबल सुबह चार बजे उठ जाता है और देर रात तक मकान में तोड़फोड़ या मरम्मत करता रहता है। उसके इस कार्य से और लोगों को कोई दिक्कत होती है कि नहीं मैं यह तो नहीं जानता लेकिन मुझे बहुत परेशानी होती है।
हालांकि, मैं केवल मन ही मन उसके प्रति गुस्सा रखता हूं। कुछ कहता नहीं हूं। इस लिए नहीं कि वह पुलिस वाला है, बल्कि इस लिए कि वह बहुत बदतमीज किस्म का इंसान है। उसके परिवार में फिलहाल कुल पांच प्राणी हैं। पति-पत्नी एक बेटा और तीन बेटियां। एक बेटी और है। जो उसके बच्चों में वह सबसे बड़ी है। लोगों का कहना है कि वह मोहल्ले के ही एक लड़के से प्रेम करती थी और अपने घर वालों के मर्जी के विरुद्ध उससे शादी कर ली थी। शुरू में तो घर वाले नाराज जरूर हुए लेकिन बाद में सब सामान्य हो गया और वह अब अपने मायके आती जाती है।
उस हेडकांस्टेबल को गली वाले पागल कहते हैं। उसके परिवार वाले भी उसे पागल ही मानते हैं। उसका इलाज भी चल रहा है। वह शराब का भी शौक रखता है। इन दिनों वह मेडिकल लीव पर है, और डियूटी नहीं जाता है। तनख्वाह मिलने वाले दिन उसकी पत्नी जा कर पैसा ले लेती है। कुछ पैसा उसे खर्च के लिए किसी तरह मिल जाता है। इन पैसों को वह शराब आदि में खर्च कर देता है। घर का वातावरण देखने से लगता है कि उसका घर वालों से सामंजस्य नहीं बैठता है। किसी से वह बात नहीं करता है।
पिछले साल के आखिरी महीने के एक दिन वह शाम के समय शराब पी कर आया और किसी बात पर अपनी द्वितीय क्रम की लड़की को चांटा मार दिया। उसने उसे कई बार चांटा मारा। शुरू में तो लड़की कुछ बोली नहीं लेकिन बाद में वह विरोध पर उतर आई। अपने जन्मदाता पिता को वह भी एक तमाचा जड़ दिया। इतने में उसकी पत्नी और उसका बेटा और छोटी वाली बेटी भी आ गई। इसके बाद तो शुरू हो गया रिश्तों के खून करने का दौर, और दिखने लगा तथाकथित शहरी होने का उदाहरण। उसके बेटे ने उसका गिरेबां पकड़ कर उसे पटक दिया।
उसकी पत्नी जो उसके लिए परमेश्वर होना चाहिए था अपनी दोनों बेटियों के साथ पिटना शुरू कर दिया और तब तक पिटती रहीं जब-तक की वह निढाल नहीं हो गया। वह मोहल्ले वालों से मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन कोई मदद को नहीं आया। बाद में उसके घर वालों ने अपने एक परिचित मेडिकल स्टोर वाले को बुला कर बेहोशी का इंजेक्शन लगवा दिया। हालांकि, वह दूसरे दिन सामान्य दिनों की तरह अपने काम पर लगा गया था। लेकिन आज के रिश्तों की आधुनिकता की झलक उसने दिखा दी। इन दिनों मेरी मां गांव से आईं हुईं हैं।
इस घटना पर उनका कहना था कि यहां के लोग कैसे हैं मदद के लिए बुलाने पर भी नहीं आते। मैं उन्हें कैसे बताता कि यह गांव नहीं शहर है! बाद में मैं भी उस हेडकांस्टेबल को पागल मानने लगा। मुझे लगता है कि शायद आप भी उसे पागल मानने लगें। क्योंकि उसने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति अपनी पत्नी के नाम कर दी है। या यों कहें कि उसके घर वालों ने उससे जबरिया लिखवा ली है। क्या अब समाज की यही हकीकत होने जा रही है। यदि वह अपनी संपत्ति को अपने पास रखता तो उसकी कम से कम यह हालत नहीं होती। उसके घर वाले उसकी पिटाई नहीं करते। थोड़ी बहुत इज्ज्त करते और वह मालिक की तरह घर में रहता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अब वह बीवी बच्चों से मार खाने के बाद जलालत की जिंदगी गुजार रहा है। मुझे लगता है कि आदमी को अपने पांव में उसके तरह कुलहाड़ी नहीं मारनी चाहिए।
January 4, 2009
मैंने भी आज से लिखना शुरू कर दिया
शैलेश कुमार तिवारी
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