पिछले दिन मुलायम सिंह यादव ने लोक सभा चुनावों के दौरान कल्याण सिंह को साथ लिए जाने के लिए देश के मुस्लिम समुदाय से माफी मांग ली। इसके साथ ही अपने मुख्यमन्त्रित्व काल में बाबरी मस्जिद को बचाने का दावा भी कर डाला। अपने माफीनामे में सपा प्रमुख आजीवन मुसलमानों के कल्याण के लिए संघर्ष करते रहने का संकल्प व्यक्त किया है। इसे भारतीय राजनीति का विडंबना ही कहेंगे कि सभी गैर भाजपाई दल मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक के अलावा और कुछ नहीं समझते। शायद इसे मुसलमान समझते भी हैं और नहीं भी समझते हैं। मुलायम सिंह का माफीनामा आगामी यूपी विधान सभा चुनाव में अपनी खोई जमीन को वापस पाने की बेचैनी को ही दर्शाता है। लेकिन, लगता नहीं मुलायम और उनका कुनबा फिर से उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ पाएगा।
जब लोकसभा चुनाव में सपा के साथ कल्याण सिंह साथ आए थे तो उस समय वह पाक साफ हो गए थे। उनके कथित सारे गुनाह (बाबरी ढांचा गिराने का) धुल गए थे। क्योंकि, वह धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े लंबरदार के साथ आ गए थे। लेकिन, जैसे ही चुनाव परिणाम आए कल्याण सपा, मुलायम और उनके परिवार के लिए अछूत हो गए। कल्याण के नाम से भी मुलायम को चिढ़ होने लगी है। हालांकि, कल्याण सिंह ने भी वक्त की नजाकत को देखते हुए मुलायम को अवसरवादी करार देने में देर नहीं लगाया और अपने को रामभक्त कहना शुरू कर दिया। लेकिन, मुलायम से गलबहियां करने के दौरान बाबरी प्रकरण पर उन्हें भी खेद था। यही तो हमारे देश की राजनीति है और यही हमारे नेताओं का दोहरा चरित्र है। जिसे देश की जनता नहीं समझती।
करीब आने और दूर छिटकने के प्रकरण में दोनों नेता अपना दोहरा चरित्र छुपाने में नाकाम रहे। अब इसे रामभक्त और मुसलमान भक्त को जनता कितना समझती है यह तो आने वाले वक्त बताएगा, लेकिन इस प्रकरण से दोनों नेताओं की राजनीति अवसरवादिता से ज्यादा कुछ नहीं है। मुलायम सिंह को लगता है कि माफी मांग लेने और आजम खां को साथ ले लेने से उनका उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर से पहले वाला मुकाम हासिल हो जाएगा सन्देह है। क्योंकि, अब मुसलमानों के लिए केवल मुलायम ही नहीं हैं उनसे आगे भी कुछ बड़े और छोटे दल मुस्लिम समाज का पैरोकार होने का दावा करने लगे हैं।
मुलायम की यह माफीनामा लोक सभा और विधान सभा के उपचुनावों में मिली पराजय से उपजी हताशा को ही बयां कर रही है। उम्र और सम्भवतज् राजनीति की आखिरी बाजी खेलने की जी तोड़ कोशिश कर रहे मुलायम को माफी से कितना लाभ पहुंचता है। यह बसपा और कांग्रेस की राजनीति पर ही टीकी है। मतलब कि कांग्रेस जितना मजबूत होगी सपा उतना ही कमजोर होगी। राहुल गांधी का मिशन उत्तरप्रदेश सपा को ही कमजोर कर रहा है। इसे मुलायम भी खूब समझ रहे हैं। उनकी माफी इसी का प्रतिफल है।
अब उत्तरप्रदेश में मुलायम की पहले वाली छवि नहीं रही। उनसे उनकी ही जाति के लोग दूर होते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की पहली बार सत्ता सम्भालने वाले मुलायम की छवि दलित, पिछड़ों और धर्मनिरपेक्ष नेता की छवि थी। जो अब कब का मिट चुकी है। जनता जान चुकी है कि मुलायम लोहिया के नाम पर अपने ही परिवार को आगे ले जाना चाहते हैं।
ऐसे में मुलायम सिंह को माफी मांगने की जगह ऑक्टोपास पॉल की शरण में जाना चाहिए। शायद, कुछ राजनीतिक भविष्य के लिए शुभ संकेत मिल जाए।
July 17, 2010
May 10, 2010
मां को एक ही दिन सम्मान क्यों?
हमारी संस्कृति में माता-पिता के आशीर्वाद से ही दिन की शुरुआत करने की सलाह दी गई है
रविवार को भारत सहित लगभग अधिकांश देशों में पाश्चात्य संस्कृति का मदर्स डे मनाया गया। बच्चों और बड़ों ने मॉम को गिफ्ट आदि देकर उनके प्रति सम्मान और प्रेम का प्रदर्शन किया। इस बार छोटे शहरों और शहर से सटे गांवों में भी यह दिवस मनाया गया। इसे देखकर कुछ अच्छा और कुछ बुरा भी लगा। अच्छा इस मामले में कि इस भागमभाग और व्यस्ततम जिन्दगी में भी लोग एक दिन का कुछ पल अपनी मां या अपनों के लिए निकाल लेते हैं। दुख इस लिए हुआ कि अब हम भारतीय भी रिश्तों को समय के चक्र में समेटने लगे हैं और इसे अपनी जिन्दगी के अहम हिस्सों में शामिल करने में हमें तनिक भी अटपटा नहीं लगता। बल्कि गर्व होता है।
रविवार को प्रकाशित लगभग सभी समाचार पत्रों में मदर्स डे पर फीचर पन्ना प्रकाशित किया गया था। जिसमें एक तरफ अपने बच्चों के भविष्य के लिए माताओं के समर्पण के किस्से थे तो दूसरी तरफ नामी लोगों के विशिंग भरे थे। कुछ अखबारों में यह खबर भी प्रकाशित की गई थी कि कई बच्चों को यह पता ही नहीं था कि मदर्स डे क्या होता है। दिल्ली नोएडा सहित कई बड़े शहरों में इस अवसर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। जिसमें कई शहीदों की माताओं को सम्मानित किया गया है। जो एक अच्छी पहल है। ऐसे आयोजक निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
माता-पिता को सम्मान दिया जाना चाहिए। बुजुर्गों को भी एहसास होना चाहिए कि उनका भी ध्यान रखने वाला कोई है। सभी के माता-पिता यह चाहते हैं कि वृद्धावस्था में उनका सहारा उनकी सन्तान बनें। हर माता-पिता हर क्षण अपने बच्चों की उन्नति की कामना करते हैं।
ऐसे में यह बात उल्लेखनीय है कि क्या माता-पिता के लिए वर्ष में सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एक दिन ही काफी है। वे मां-बाप जो तमाम दिक्कतें झेलकर भी अपने बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। क्या उन्हें साल में एक दिन ही एहसास होना चाहिए कि उनका भी कोई अपना है जो उन्हें प्रेम करता है। मुझे लगता है कि यह गलत है। हो सकता है कि इसे कुछ लोग प्रतियोगिता भरी और भागमभाग की जिन्दगी में सही मानते हों, लेकिन मैं इसे कतई सही नहीं मानता।
भारतीय समाज और संस्कृति में रिश्तों को समय के डोर में बांधने की कभी परंपरा नहीं रही है, और नहीं प्रेम, सम्बंध और अपनत्व को कभी दिन विशेष और समय चक्र में समेटा ही गया है। लेकिन, इधर कुछ वर्षों से समाचार चैनलों में पाश्चात्य संस्कृति के परंपराओं को भारतीय समाज में ढालने की कोशिश के फलस्वरूप लोग रिश्तों को दिन और घंटों में बांधने लगे हैं। हालांकि, यह परंपरा अभी देश के कुछ मेट्रो टाइप के शहरों में ही ज्यादे है। लेकिन, देखादेखी छोटे शहरों में भी इस तरह के अवसर मनाए जाने लगे हैं।
भारतीय संस्कृति, समाज और परंपराएं तो अपनों को हर दिन ससम्मान देने और प्रेम प्रदर्शित करने की उदात्त अवधारणा पर आधारित है। हमारी संस्कृति तो दिन की शुरूआत ही माता-पिता की आशीर्वाद से करने के लिए प्रेरित करती है। श्रीरमाचरितमानस में गोस्वामीजी लिखते हैं- प्रात काल उठि रघुनाथा, मातु-पिता गुरू नावहीं माथां जिस देश में ऐसे प्रेरक प्रसंग हों वहां माता-पिता को सम्मान देने के लिए दिन विशेष की भला क्या जरूरत है। कुछ लोगों की यह बात सही हो सकती है। आज के प्रतियोगी समय में यह सम्भव नहीं है। हम भी सहमत हैं कि सम्भव नहीं है लेकिन क्या रिश्तों को समय चक्र में बांधा जा सकता है। प्रतिदिन माता-पिता के प्रति सम्मान की भावना रखी जा सकती है। जिसके वे हमें जन्म देकर हकदार हैं।
पश्चिम की सोच और सभ्यता अलग है। वहां रिश्तों की कोई पहचान ही नहीं है। कुछ थोड़े से लोग हैं जो परिवार संस्था को मानते हैं। लेकिन, हमारे देश में परिवार वह नींव है जहां से हमें सबकुछ हासिल होता है। ऐसे में हम प्रेम, सम्मान आदि को समय के बंधन में नहीं बांध सकते। यदि ऐसा करते हैं तो यह महज एक दिखावा से ज्यादा कुछ नहीं है। माता-पिता के लिए मदर्स या फादर्स डे पर गिफ्ट नहीं प्रतिदिन प्रेम के दो शब्द ही काफी हैं। दुर्भाग्य से यह दिख नहीं रहा है। केवल पश्चिम का नकल करने में हम लगे हैं और इसी को हम आधुनिक होने का मुगालता पाल लेते हैं।
रविवार को भारत सहित लगभग अधिकांश देशों में पाश्चात्य संस्कृति का मदर्स डे मनाया गया। बच्चों और बड़ों ने मॉम को गिफ्ट आदि देकर उनके प्रति सम्मान और प्रेम का प्रदर्शन किया। इस बार छोटे शहरों और शहर से सटे गांवों में भी यह दिवस मनाया गया। इसे देखकर कुछ अच्छा और कुछ बुरा भी लगा। अच्छा इस मामले में कि इस भागमभाग और व्यस्ततम जिन्दगी में भी लोग एक दिन का कुछ पल अपनी मां या अपनों के लिए निकाल लेते हैं। दुख इस लिए हुआ कि अब हम भारतीय भी रिश्तों को समय के चक्र में समेटने लगे हैं और इसे अपनी जिन्दगी के अहम हिस्सों में शामिल करने में हमें तनिक भी अटपटा नहीं लगता। बल्कि गर्व होता है।
रविवार को प्रकाशित लगभग सभी समाचार पत्रों में मदर्स डे पर फीचर पन्ना प्रकाशित किया गया था। जिसमें एक तरफ अपने बच्चों के भविष्य के लिए माताओं के समर्पण के किस्से थे तो दूसरी तरफ नामी लोगों के विशिंग भरे थे। कुछ अखबारों में यह खबर भी प्रकाशित की गई थी कि कई बच्चों को यह पता ही नहीं था कि मदर्स डे क्या होता है। दिल्ली नोएडा सहित कई बड़े शहरों में इस अवसर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। जिसमें कई शहीदों की माताओं को सम्मानित किया गया है। जो एक अच्छी पहल है। ऐसे आयोजक निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
माता-पिता को सम्मान दिया जाना चाहिए। बुजुर्गों को भी एहसास होना चाहिए कि उनका भी ध्यान रखने वाला कोई है। सभी के माता-पिता यह चाहते हैं कि वृद्धावस्था में उनका सहारा उनकी सन्तान बनें। हर माता-पिता हर क्षण अपने बच्चों की उन्नति की कामना करते हैं।
ऐसे में यह बात उल्लेखनीय है कि क्या माता-पिता के लिए वर्ष में सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एक दिन ही काफी है। वे मां-बाप जो तमाम दिक्कतें झेलकर भी अपने बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। क्या उन्हें साल में एक दिन ही एहसास होना चाहिए कि उनका भी कोई अपना है जो उन्हें प्रेम करता है। मुझे लगता है कि यह गलत है। हो सकता है कि इसे कुछ लोग प्रतियोगिता भरी और भागमभाग की जिन्दगी में सही मानते हों, लेकिन मैं इसे कतई सही नहीं मानता।
भारतीय समाज और संस्कृति में रिश्तों को समय के डोर में बांधने की कभी परंपरा नहीं रही है, और नहीं प्रेम, सम्बंध और अपनत्व को कभी दिन विशेष और समय चक्र में समेटा ही गया है। लेकिन, इधर कुछ वर्षों से समाचार चैनलों में पाश्चात्य संस्कृति के परंपराओं को भारतीय समाज में ढालने की कोशिश के फलस्वरूप लोग रिश्तों को दिन और घंटों में बांधने लगे हैं। हालांकि, यह परंपरा अभी देश के कुछ मेट्रो टाइप के शहरों में ही ज्यादे है। लेकिन, देखादेखी छोटे शहरों में भी इस तरह के अवसर मनाए जाने लगे हैं।
भारतीय संस्कृति, समाज और परंपराएं तो अपनों को हर दिन ससम्मान देने और प्रेम प्रदर्शित करने की उदात्त अवधारणा पर आधारित है। हमारी संस्कृति तो दिन की शुरूआत ही माता-पिता की आशीर्वाद से करने के लिए प्रेरित करती है। श्रीरमाचरितमानस में गोस्वामीजी लिखते हैं- प्रात काल उठि रघुनाथा, मातु-पिता गुरू नावहीं माथां जिस देश में ऐसे प्रेरक प्रसंग हों वहां माता-पिता को सम्मान देने के लिए दिन विशेष की भला क्या जरूरत है। कुछ लोगों की यह बात सही हो सकती है। आज के प्रतियोगी समय में यह सम्भव नहीं है। हम भी सहमत हैं कि सम्भव नहीं है लेकिन क्या रिश्तों को समय चक्र में बांधा जा सकता है। प्रतिदिन माता-पिता के प्रति सम्मान की भावना रखी जा सकती है। जिसके वे हमें जन्म देकर हकदार हैं।
पश्चिम की सोच और सभ्यता अलग है। वहां रिश्तों की कोई पहचान ही नहीं है। कुछ थोड़े से लोग हैं जो परिवार संस्था को मानते हैं। लेकिन, हमारे देश में परिवार वह नींव है जहां से हमें सबकुछ हासिल होता है। ऐसे में हम प्रेम, सम्मान आदि को समय के बंधन में नहीं बांध सकते। यदि ऐसा करते हैं तो यह महज एक दिखावा से ज्यादा कुछ नहीं है। माता-पिता के लिए मदर्स या फादर्स डे पर गिफ्ट नहीं प्रतिदिन प्रेम के दो शब्द ही काफी हैं। दुर्भाग्य से यह दिख नहीं रहा है। केवल पश्चिम का नकल करने में हम लगे हैं और इसी को हम आधुनिक होने का मुगालता पाल लेते हैं।
April 26, 2010
कृपया सचिन को भगवान न बनाएं......
सचिन खिलाड़ी के रूप में ही बहुत महान हैं
पिछले शनिवार को सचिन तेन्दुलकर का 37 वां जन्मदिन पूरे धूमधाम से मनाया गया। हम भी सचिन की लंबी उम्र की कामना करते हैं और चाहते हैं कि वह अगले दस वर्ष तक क्रिकेट खेलें। क्रिकेट से थोड़ा बहुत भी लगाव रखने वाले हर व्यक्ति की यह मंशा है कि सचिन अभी कई रिकार्ड कायम करें। कुछ ऐसा रिकार्ड बना दें जिसे तोड़ने की क्षमता निकट भविष्य में किसी के पास न हो। लेकिन, इस विनम्र और सादगी पसन्द शख्सियत के सम्मान में कुछ लोग, कुछ मीडिया संस्थान कुछ ज्यादे ही उत्साहित हो जा रहे हैं। चाहे उनको भारतरत्न देने की बात हो या उन्हें भगवान की पदवी से विभूषित करने की बात हो हर तरफ जल्दबाजी ही दिख रही है। कुछ बातें ऐसी हैं जिनपर टिप्पणी करना मौजूं जान पड़ता है। हालांकि, सचिन के अंध भक्तों को यह बात बुरी जरूर लग सकती है।
निश्चय ही बतौर खिलाड़ी सचिन महान हैं और उनके आसपास तो क्या उनके आभा मण्डल के समीप भी विश्व क्रिकेट में कोई नहीं दिखता है। इस सच्चाई से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि मौजूदा दौर में हर रिकार्ड सचिन से ही शुरू होकर उन्हीं पर खत्म भी हो रहा है। चाहे बात वनडे/टेस्ट में सर्वाधिक शतक लगाने का हो, ज्यादे मैच खेलने का हो, मैन आफ दी सिरीज/मैन आफ दी मैच हो अथवा वनडे में दो सौ रन बनाने का हो हर जगह एक ही नाम है वह सचिन तेन्दुलकर। तमाम कई ऐसे भी छोटे-मोटे रिकार्ड हैं जो सचिन के नाम पर अंकित हैं। वहीं क्रिकेट के नए संस्करण आईपीएल में भी सचिन ने इस वर्ष सर्वाधिक रन बनाए हैं।
क्या इन उपलब्धियों से ही सचिन को भगवान मान लेना चाहिए? यदि ऐसा है तो मुझे लगता है भगवान शब्द ही गलत है। भगवान का दर्जा तो हर किसी को मिलना चाहिए। सानिया मिर्जा को भी देवी का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने भी भारत का नाम टेनिस के क्षेत्र में रौशन किया है। दूसरी तरफ, सचिन अक्सर मौके पर उम्दा खेल नहीं खेल पाते हैं। कई बार जब उनसे उम्मीद की जाती है वह नहीं चल पाते हैं। इसे उम्मीद का बोझ भी मान सकते हैं। सचिन की आलोचना इसलिए भी होती रही है कि वह कभी जीताऊ खिलाड़ी साबित नहीं हो सके। सचिन के दम पर कितनी सिरीज जीती गई हैं। विश्वकप में भी कोई सचिन अमिट छाप नहीं छोड़ पाए हैं। सचिन का व्यक्तिगत उपलब्धि बेदाग है, लेकिन सचिन की उपस्थिति के बाद भी भारतीय टीम कोई बहुत बड़ी उपलब्धि अभी तक हासिल नहीं कर पाई है।
हद तो तब हो जाती है जब फिल्मों में कई यादगार भूमिका निभाने वाले अनुपम खेर यह कह कर सचिन को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हैं कि सचिन के चलते उन्हें भारतीय होने पर गर्व है। (यह बात 25 अप्रैल को दिनभर कई टीवी चैनलों पर रीडर पट्टी पर चल रही थी) क्या दुनिया में अध्यात्म और ज्ञान की शिक्षा देने वाले भारत की पहचान मात्र सचिन से है। सचिन खेल के एक विधा क्रिकेट के चमकते सितारे हैं। इस तरह की बातें कह कर अनुपम जी क्या साबित करना चाहते हैं। इससे तो यही लगता है उन्हें सचिन के अलावा भारत में और कुछ दिखता ही नहीं है। भारत की पहचान तो भारत से ही है। क्रिकेट के चलते ही मीडिया में दूसरे खेलों में उम्दा प्रदर्शन करने वाले कई खिलाçड़यों को कवरेज नहीं मिल पाता है। जिससे उनकी महानता दब जाती है।
मेरा आशय सचिन की महानता को कम करके आंकना नहीं है। लेकिन, सचिन को केवल खिलाड़ी या इंसान ही रहने दिया जाता तो उनकी महानता और बढ़ जाती। यह सच है कि सचिन किसी की प्रशंसा या बुराई से परे हैं।
पिछले शनिवार को सचिन तेन्दुलकर का 37 वां जन्मदिन पूरे धूमधाम से मनाया गया। हम भी सचिन की लंबी उम्र की कामना करते हैं और चाहते हैं कि वह अगले दस वर्ष तक क्रिकेट खेलें। क्रिकेट से थोड़ा बहुत भी लगाव रखने वाले हर व्यक्ति की यह मंशा है कि सचिन अभी कई रिकार्ड कायम करें। कुछ ऐसा रिकार्ड बना दें जिसे तोड़ने की क्षमता निकट भविष्य में किसी के पास न हो। लेकिन, इस विनम्र और सादगी पसन्द शख्सियत के सम्मान में कुछ लोग, कुछ मीडिया संस्थान कुछ ज्यादे ही उत्साहित हो जा रहे हैं। चाहे उनको भारतरत्न देने की बात हो या उन्हें भगवान की पदवी से विभूषित करने की बात हो हर तरफ जल्दबाजी ही दिख रही है। कुछ बातें ऐसी हैं जिनपर टिप्पणी करना मौजूं जान पड़ता है। हालांकि, सचिन के अंध भक्तों को यह बात बुरी जरूर लग सकती है।
निश्चय ही बतौर खिलाड़ी सचिन महान हैं और उनके आसपास तो क्या उनके आभा मण्डल के समीप भी विश्व क्रिकेट में कोई नहीं दिखता है। इस सच्चाई से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि मौजूदा दौर में हर रिकार्ड सचिन से ही शुरू होकर उन्हीं पर खत्म भी हो रहा है। चाहे बात वनडे/टेस्ट में सर्वाधिक शतक लगाने का हो, ज्यादे मैच खेलने का हो, मैन आफ दी सिरीज/मैन आफ दी मैच हो अथवा वनडे में दो सौ रन बनाने का हो हर जगह एक ही नाम है वह सचिन तेन्दुलकर। तमाम कई ऐसे भी छोटे-मोटे रिकार्ड हैं जो सचिन के नाम पर अंकित हैं। वहीं क्रिकेट के नए संस्करण आईपीएल में भी सचिन ने इस वर्ष सर्वाधिक रन बनाए हैं।
क्या इन उपलब्धियों से ही सचिन को भगवान मान लेना चाहिए? यदि ऐसा है तो मुझे लगता है भगवान शब्द ही गलत है। भगवान का दर्जा तो हर किसी को मिलना चाहिए। सानिया मिर्जा को भी देवी का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने भी भारत का नाम टेनिस के क्षेत्र में रौशन किया है। दूसरी तरफ, सचिन अक्सर मौके पर उम्दा खेल नहीं खेल पाते हैं। कई बार जब उनसे उम्मीद की जाती है वह नहीं चल पाते हैं। इसे उम्मीद का बोझ भी मान सकते हैं। सचिन की आलोचना इसलिए भी होती रही है कि वह कभी जीताऊ खिलाड़ी साबित नहीं हो सके। सचिन के दम पर कितनी सिरीज जीती गई हैं। विश्वकप में भी कोई सचिन अमिट छाप नहीं छोड़ पाए हैं। सचिन का व्यक्तिगत उपलब्धि बेदाग है, लेकिन सचिन की उपस्थिति के बाद भी भारतीय टीम कोई बहुत बड़ी उपलब्धि अभी तक हासिल नहीं कर पाई है।
हद तो तब हो जाती है जब फिल्मों में कई यादगार भूमिका निभाने वाले अनुपम खेर यह कह कर सचिन को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हैं कि सचिन के चलते उन्हें भारतीय होने पर गर्व है। (यह बात 25 अप्रैल को दिनभर कई टीवी चैनलों पर रीडर पट्टी पर चल रही थी) क्या दुनिया में अध्यात्म और ज्ञान की शिक्षा देने वाले भारत की पहचान मात्र सचिन से है। सचिन खेल के एक विधा क्रिकेट के चमकते सितारे हैं। इस तरह की बातें कह कर अनुपम जी क्या साबित करना चाहते हैं। इससे तो यही लगता है उन्हें सचिन के अलावा भारत में और कुछ दिखता ही नहीं है। भारत की पहचान तो भारत से ही है। क्रिकेट के चलते ही मीडिया में दूसरे खेलों में उम्दा प्रदर्शन करने वाले कई खिलाçड़यों को कवरेज नहीं मिल पाता है। जिससे उनकी महानता दब जाती है।
मेरा आशय सचिन की महानता को कम करके आंकना नहीं है। लेकिन, सचिन को केवल खिलाड़ी या इंसान ही रहने दिया जाता तो उनकी महानता और बढ़ जाती। यह सच है कि सचिन किसी की प्रशंसा या बुराई से परे हैं।
April 16, 2010
आईपीएल का खेल की भावना से कोई सरोकार नहीं
आईपीएल की तिलस्म से पर्दा उठना चाहिए
विदेश राज्यमन्त्री और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के ट्वीट वार ने आईपीएल की सच्चाई पर से धीरे-धीरे पर्दा उठाने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए इसी बहाने आईपीएल का तिलस्म देशवासियों के सामने आएगा। जिससे लोग जान सकें कि क्रिकेट के इस तथाकथित खेल पर पैसा पानी की तरह बहाने वाले फ्रेंचाइजी टीमों के शेयरधारक कौन हैं? क्या आईपीएल में पैसा लगाने वाले वाकई अच्छे लोग हैं। आयकर विभाग ने खोजबीन शुरू तो किया है लेकिन, केन्द्र सरकार को भी स्वतन्त्र जांच एजेंसी से जांच करानी चाहिए।
दरअसल, अपने पहले संस्करण से ही आईपीएल धन वर्षा का नायाब स्त्रोत बन गया है। इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोग मालामाल हो रहे हैं। कुछ खिलाड़ी भी प्रदर्शन कर वाहवाही लूट रहे हैं। लेकिन, क्या वाकई कलात्मक खेल देखने को मिल रहा है। इस मुद्दे पर भी चर्चा होनी चाहिए। दुर्भाग्य से इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
दूसरी तरफ, शहरों के नाम पर टीमों का नाम तो रख दिया गया है लेकिन टीम में उन शहरों के खिलाड़ी गिनती के भी नहीं हैं। आईपीएल का मैच देखना ही मुझे समय बर्बाद करना लगता है। इस आईपीएल से देश की न तो अस्मिता ही जुड़ी है और नहीं इसका खेल के कलात्मक विधा से ही कोई सरोकार है। आईपीएल का मुख्य उद्देश्य लोगों की भावनाएं भुनाकर सिर्फ पैसा कमाना भर है। अपने उद्देश्य में आईपीएल को गढ़ने वाले पूर्णरूपेण सफल रहे हैं।
कोच्चि टीम को लेकर जो बातें प्रकाश में आ रही हैं। यदि आईपीएल को सही अर्थों में खेल माना जाता है तो इससे खेल भावना दूषित हुई है। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि आईपीएल में माफियाओं का भी पैसा लगा है। समाचारों पर विश्वास करें तो इसमें डी कंपनी का भी परोक्ष पैसा लगा है। यह तो आयकर विभाग के जांच के बाद सामने आ ही जाएगा। यदि यह सही साबित हुआ तो आईपीएल को फ्रेमवर्क करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। नए घटनाक्रम में अहमदाबाद टीम को लेकर जिस तरह से गुजरात के मुख्यमन्त्री का नाम आ रहा है। इससे तो लगता है कि खेल के इस प्रारूप का एक अलग स्वरूप भी है। जो दिख नहीं रहा है। इससे तो सहज ही अन्दाजा लगता है कि आईपीएल का खेल से कोई लेना-देना नहीं है।
प्रवासी भारतीय मामलों के मन्त्री व्यालार रवि ने ठीक ही कहा है कि इण्डियन प्रीमियर लीग एक तरह का महिमामण्डित जुआं है। उन्होंने कहा कि मैं आईपीएल को पसन्द नहीं करता। यह एक महिमामण्डित जुआ है। मैं तो इसे खेल भी नहीं मानता। यह एक दिवसीय या टेस्ट क्रिकेट नहीं है। यही नहीं कई दिग्गज पूर्व खिलाçड़यों ने भी आईपीएल के तौर-तरीकों पर सवाल उठाया है। गौर करें आईपीएल के दूसरे संस्करण में जिस तरह से कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के कई कप्तानों की परिकल्पना की गई थी उससे सुनील गावस्कर जैसे महान खिलाड़ी भी नाराजगी जाहिर कर चुके थे। कई ऐसे तरीके आईपीएल में ईजाद किए गए हैं जिससे पूर्व दिग्गज खिलाड़ी इत्तेफाक नहीं रखते। वहीं इस बार जब टीमों के जीतने के बाद जिस तरह से शराब और जश्न का दौर चल रहा है निश्चित तौर शबाब की भागीदारी होगी। इससे क्रिकेट के भद्र स्वरूप का मजाक ही उड़ रहा है।
दूसरी तरफ, यदि ललित मोदी केवल कोच्चि फ्रेंचाइजी के शेयरधारकों का नाम जाहिर कर रहे हैं तो इससे उनकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। देश वासी सभी टीमों के शेयरधारकों और उन टीमों के असली मालिकों के बारे में जानना चाहेंगे। यह देश को बताया जाना चाहिए कि उनके आय के क्या स्त्रोत हैं। आईपीएल टीमों के मालिक और शेयरधारक यदि दूसरे खेलों पर भी इसी तरह से पैसा लगाते या स्पांसरशिप खरीदते तो देश निश्चित तौर पर दूसरे खेलों में भी अच्छा नाम कमाता और खिलाçड़यों को पारिश्रमिक के लिए हड़ताल नहीं करना पड़ता।
देश में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। छोटे कस्बों और गांवों के देशज खिलाçड़यों को इन्तजार है किसी ऐसे आईपीएल का जिससे उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन तो ही ही साथ ही देश का नाम भी पूरी दुनिया में खेलों के मामले में आदर के साथ लिया जाए..........
विदेश राज्यमन्त्री और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के ट्वीट वार ने आईपीएल की सच्चाई पर से धीरे-धीरे पर्दा उठाने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए इसी बहाने आईपीएल का तिलस्म देशवासियों के सामने आएगा। जिससे लोग जान सकें कि क्रिकेट के इस तथाकथित खेल पर पैसा पानी की तरह बहाने वाले फ्रेंचाइजी टीमों के शेयरधारक कौन हैं? क्या आईपीएल में पैसा लगाने वाले वाकई अच्छे लोग हैं। आयकर विभाग ने खोजबीन शुरू तो किया है लेकिन, केन्द्र सरकार को भी स्वतन्त्र जांच एजेंसी से जांच करानी चाहिए।
दरअसल, अपने पहले संस्करण से ही आईपीएल धन वर्षा का नायाब स्त्रोत बन गया है। इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोग मालामाल हो रहे हैं। कुछ खिलाड़ी भी प्रदर्शन कर वाहवाही लूट रहे हैं। लेकिन, क्या वाकई कलात्मक खेल देखने को मिल रहा है। इस मुद्दे पर भी चर्चा होनी चाहिए। दुर्भाग्य से इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
दूसरी तरफ, शहरों के नाम पर टीमों का नाम तो रख दिया गया है लेकिन टीम में उन शहरों के खिलाड़ी गिनती के भी नहीं हैं। आईपीएल का मैच देखना ही मुझे समय बर्बाद करना लगता है। इस आईपीएल से देश की न तो अस्मिता ही जुड़ी है और नहीं इसका खेल के कलात्मक विधा से ही कोई सरोकार है। आईपीएल का मुख्य उद्देश्य लोगों की भावनाएं भुनाकर सिर्फ पैसा कमाना भर है। अपने उद्देश्य में आईपीएल को गढ़ने वाले पूर्णरूपेण सफल रहे हैं।
कोच्चि टीम को लेकर जो बातें प्रकाश में आ रही हैं। यदि आईपीएल को सही अर्थों में खेल माना जाता है तो इससे खेल भावना दूषित हुई है। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि आईपीएल में माफियाओं का भी पैसा लगा है। समाचारों पर विश्वास करें तो इसमें डी कंपनी का भी परोक्ष पैसा लगा है। यह तो आयकर विभाग के जांच के बाद सामने आ ही जाएगा। यदि यह सही साबित हुआ तो आईपीएल को फ्रेमवर्क करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। नए घटनाक्रम में अहमदाबाद टीम को लेकर जिस तरह से गुजरात के मुख्यमन्त्री का नाम आ रहा है। इससे तो लगता है कि खेल के इस प्रारूप का एक अलग स्वरूप भी है। जो दिख नहीं रहा है। इससे तो सहज ही अन्दाजा लगता है कि आईपीएल का खेल से कोई लेना-देना नहीं है।
प्रवासी भारतीय मामलों के मन्त्री व्यालार रवि ने ठीक ही कहा है कि इण्डियन प्रीमियर लीग एक तरह का महिमामण्डित जुआं है। उन्होंने कहा कि मैं आईपीएल को पसन्द नहीं करता। यह एक महिमामण्डित जुआ है। मैं तो इसे खेल भी नहीं मानता। यह एक दिवसीय या टेस्ट क्रिकेट नहीं है। यही नहीं कई दिग्गज पूर्व खिलाçड़यों ने भी आईपीएल के तौर-तरीकों पर सवाल उठाया है। गौर करें आईपीएल के दूसरे संस्करण में जिस तरह से कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के कई कप्तानों की परिकल्पना की गई थी उससे सुनील गावस्कर जैसे महान खिलाड़ी भी नाराजगी जाहिर कर चुके थे। कई ऐसे तरीके आईपीएल में ईजाद किए गए हैं जिससे पूर्व दिग्गज खिलाड़ी इत्तेफाक नहीं रखते। वहीं इस बार जब टीमों के जीतने के बाद जिस तरह से शराब और जश्न का दौर चल रहा है निश्चित तौर शबाब की भागीदारी होगी। इससे क्रिकेट के भद्र स्वरूप का मजाक ही उड़ रहा है।
दूसरी तरफ, यदि ललित मोदी केवल कोच्चि फ्रेंचाइजी के शेयरधारकों का नाम जाहिर कर रहे हैं तो इससे उनकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। देश वासी सभी टीमों के शेयरधारकों और उन टीमों के असली मालिकों के बारे में जानना चाहेंगे। यह देश को बताया जाना चाहिए कि उनके आय के क्या स्त्रोत हैं। आईपीएल टीमों के मालिक और शेयरधारक यदि दूसरे खेलों पर भी इसी तरह से पैसा लगाते या स्पांसरशिप खरीदते तो देश निश्चित तौर पर दूसरे खेलों में भी अच्छा नाम कमाता और खिलाçड़यों को पारिश्रमिक के लिए हड़ताल नहीं करना पड़ता।
देश में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। छोटे कस्बों और गांवों के देशज खिलाçड़यों को इन्तजार है किसी ऐसे आईपीएल का जिससे उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन तो ही ही साथ ही देश का नाम भी पूरी दुनिया में खेलों के मामले में आदर के साथ लिया जाए..........
March 19, 2010
नोटों का माला पहनने से दलितों का उत्थान नहीं होगा मुख्यमंत्री जी
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयन्ती के बहाने शक्ति प्रदर्शन करने वाली बसपा सुप्रीमो उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री नोटों की माला पहन कर क्या सन्देश देना चाहती हैं। यह तो वही बताएंगी। लेकिन, जिस प्रदेश में बुन्देलखण्ड जैसे पिछड़े इलाके हैं जहां कि जनता गरीबी से त्रस्त है वैसे प्रदेश में ऐसा प्रदर्शन निश्चय ही जनता का उपहास उड़ाया जाना ही मानना चाहिए। विपक्ष की हायतौबा से बेपरवाह मुख्यमंत्री जयन्ती के दूसरे दिन भी नोटों की माला पहन कर दलित की गरीब बेटी होने का सबूत दे दिया है। यदि उन पैसों को जयन्ती समारोह में आए गरीबों की बेटियों की शादी और उनकी शिक्षा के लिए दे दिए गया होता तो शायद बहुतों का कल्याण हो गया होता। दरअसल, यहां गरीब जनता की फिक्र किसे है। मायावती को तो विरोधियों के जले पर नमक छिड़कना था और प्रदेश की असल मुद्दों से सबका ध्यान भटकाना था जिसमें बसपा के रणनीतिकार पूरी तरह से सफल रहे।
बसपा संस्थापक की जयन्ती पर रैली के नाम पर उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री धनबल और जनबल का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं रहीं। उत्तरप्रदेश देश के बीमारू राज्यों में शुमार है। प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सिंचाई सहित कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त है। लेकिन, मुख्यमंत्री जयन्ती मनाने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह फूंक देती हैं। योजनाओं को पूरी करने के लिए धन की कमी की बात करती हैं। बजट मुहैय्या कराने में केन्द्र सरकार पर भेदभाव का आरोप भी लगाती हैं। क्या, मायावती और बसपा के रणनीतिकार बताएंगे कि इतनी रकम कहां से आई। जयन्ती समारोह पर कितना खर्च हुआ। क्या बसपा के पार्टी कोष में धन है कि वह अपने खर्च पर इतना बड़ा आयोजन कर सकती है। देश का कोई भी नागरिक इससे इत्तेफाक नहीं रखेगा कि जयन्ती आयोजन में सरकारी धन का दुरुपयोग न हुआ है। हालांकि, उत्तरप्रदेश के लोकनिर्माण मन्त्री का यह कहना कि यह आयोजन और माला के लिए रकम कार्यकर्ताओं द्वारा चन्दा कर जुटाया गया है। गले के नीचे नहीं उतरता। क्या मन्त्री महोदय यह बताएंगे कि प्रदेश में जो प्रतिमाएं लगाई जा रही हैं उसके लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने चन्दा एकत्र कर दिया है। या सरकारी खजाने का ही इस्तेमाल किया गया है।
दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री को अपनी मूर्तियां भी लगवाने का शौक है। सीएम साहिबा आप अच्छा काम करेंगी तो जनता आपकी मूर्ति खुद लगवाएगी। अपने कार्यों की समीक्षा जनता को करने दीजिए। दलित उत्थान और दलित पुरुषों को सम्मान दिलाने के नाम पर फिजूल खर्ची का समर्थन नहीं किया जा सकता। वैसे भी बसपा केवल दलित एजेण्डे के बल पर ही उत्तरप्रदेश में बहुमत की सरकार बनाने में सफल नहीं हुई है। पार्टी को राज्य में सभी जातियों का भरपूर समर्थन मिला है। जो जातियां भाजपा और कांग्रेस की कभी कट्टर समर्थक थीं उन्होंने भी बसपा को वोट देकर सत्ता की चाबी सौंपी थीं। शायद मायावती और उनके सिपाहसलार इस बात को भूल गए हैं। मुख्यमंत्री साहिबा याद रखिए काठ की हाण्डी बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती।
पांच बार देश को प्रधानमन्त्री देने वाले उत्तरप्रदेश का यह दुभाüग्य है कि राज्य के विकास के लिए किसी दल ने ईमानदारी से पहल नहीं किया। यहां पाटिüयां सत्ता हासिल करने और अपनों की जेबें भरने में ही लगी रहीं। आज भी किसी दल केपास प्रदेश के विकास के लिए न तो कोई विजन है और न ही नीति। लेकिन, यहां की जनता पता नहीं क्यों सबकुछ जानते हुए भी पिछड़ेपन का दंश झेलने को बाध्य है।
बसपा संस्थापक की जयन्ती पर रैली के नाम पर उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री धनबल और जनबल का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं रहीं। उत्तरप्रदेश देश के बीमारू राज्यों में शुमार है। प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सिंचाई सहित कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त है। लेकिन, मुख्यमंत्री जयन्ती मनाने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह फूंक देती हैं। योजनाओं को पूरी करने के लिए धन की कमी की बात करती हैं। बजट मुहैय्या कराने में केन्द्र सरकार पर भेदभाव का आरोप भी लगाती हैं। क्या, मायावती और बसपा के रणनीतिकार बताएंगे कि इतनी रकम कहां से आई। जयन्ती समारोह पर कितना खर्च हुआ। क्या बसपा के पार्टी कोष में धन है कि वह अपने खर्च पर इतना बड़ा आयोजन कर सकती है। देश का कोई भी नागरिक इससे इत्तेफाक नहीं रखेगा कि जयन्ती आयोजन में सरकारी धन का दुरुपयोग न हुआ है। हालांकि, उत्तरप्रदेश के लोकनिर्माण मन्त्री का यह कहना कि यह आयोजन और माला के लिए रकम कार्यकर्ताओं द्वारा चन्दा कर जुटाया गया है। गले के नीचे नहीं उतरता। क्या मन्त्री महोदय यह बताएंगे कि प्रदेश में जो प्रतिमाएं लगाई जा रही हैं उसके लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने चन्दा एकत्र कर दिया है। या सरकारी खजाने का ही इस्तेमाल किया गया है।
दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री को अपनी मूर्तियां भी लगवाने का शौक है। सीएम साहिबा आप अच्छा काम करेंगी तो जनता आपकी मूर्ति खुद लगवाएगी। अपने कार्यों की समीक्षा जनता को करने दीजिए। दलित उत्थान और दलित पुरुषों को सम्मान दिलाने के नाम पर फिजूल खर्ची का समर्थन नहीं किया जा सकता। वैसे भी बसपा केवल दलित एजेण्डे के बल पर ही उत्तरप्रदेश में बहुमत की सरकार बनाने में सफल नहीं हुई है। पार्टी को राज्य में सभी जातियों का भरपूर समर्थन मिला है। जो जातियां भाजपा और कांग्रेस की कभी कट्टर समर्थक थीं उन्होंने भी बसपा को वोट देकर सत्ता की चाबी सौंपी थीं। शायद मायावती और उनके सिपाहसलार इस बात को भूल गए हैं। मुख्यमंत्री साहिबा याद रखिए काठ की हाण्डी बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती।
पांच बार देश को प्रधानमन्त्री देने वाले उत्तरप्रदेश का यह दुभाüग्य है कि राज्य के विकास के लिए किसी दल ने ईमानदारी से पहल नहीं किया। यहां पाटिüयां सत्ता हासिल करने और अपनों की जेबें भरने में ही लगी रहीं। आज भी किसी दल केपास प्रदेश के विकास के लिए न तो कोई विजन है और न ही नीति। लेकिन, यहां की जनता पता नहीं क्यों सबकुछ जानते हुए भी पिछड़ेपन का दंश झेलने को बाध्य है।
March 10, 2010
आरक्षण से ही महिलाओं के दुख दूर नहीं हो जाएंगे
जातिवाद की राजनीति करने वालों को मुंहकी खानी ही थी
पिछड़ों, दलितों और मुस्लिम महिलाओं के लिए कोटे के अन्दर कोटे की पैरोकारी करने वाले कथित लंबरदारों के विरोध के बावजूद महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक राज्यसभा में पास होना वाकई ऐतिहासिक कदम है। लेकिन, इससे महिलाओं के सारे दुख दूर हो जाएंगे ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। लेकिन एक उम्मीद तो जगती है। दूसरी तरफ, एक सार्थक विधेयक पर लेफ्ट, राइट और कांग्रेस का एक साथ आना लोकतन्त्र के लिए सुखद है। जो यह बताने के लिए काफी है कि दुनिया में भारतीय लोकतन्त्र की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
महिलाएं चाहे पिछड़े वर्ग की हों, दलित हों या मुस्लिम समुदाय की हों अथवा अगड़ी जातियों से सम्बंधित हों उनकी समस्याएं एक जैसी होती हैं। महिलाओं को आरक्षण के नाम पर बांटना निश्चित तौर पर गलत है। लेकिन, यह बात लालू, मुलायम और शरद यादव को समझ में आए तब न। इन्हें तो लोकतन्त्र में ही विश्वास नहीं है। संसद में जो मर्यादा इन लोगों ने दिखाया उससे देश का हर संभ्रान्त नागरिक दुखी है। लोकतन्त्र में विरोध करने का तरीका होता है। लेकिन, इस तरह का आचरण तनिक भी शोभनीय नहीं है। ऐसे आचरण करने वाले दलों के नेताओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इन दलों की मान्यता तक समाप्त कर दी जानी चाहिए। इसी से देश में जातिवाद की जड़ें खत्म होंगी।
दूसरी तरफ, मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक का विरोध करने का ठोस कारण किसी पार्टी के पास नहीं है। जो दल विरोध कर रहे हैं उसके पीछे उनकी मंशा गलत है। दरअसल, यह दल आरक्षण के आड़ में अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं। इन्हें डर है कि अबतक जो लाभ इन्हें मिलता रहा है। महिलाओं को आरक्षण देने के बाद नहीं मिलेगा। इनके कुनबे को मिलने वाली मलाई बंट जाएगी।
दरअसल, यादव तिकड़ी कोटे के अन्दर कोटे की मांग यों ही नहीं कर रही है। इसके पीछे एक गहरी सोच है। जो मण्डल कमीशन की राजनीति से जुड़ी है। इनकी मंशा स्पष्ट तौर पर सामान्य जाति के लोगों को संसद और विधानसभाओं से बाहर करने की है। आरक्षण के अन्दर आरक्षण की व्यवस्था से असल में कम तो सामान्य वर्ग की सीटें ही होंगी। दूसरी तरफ सामान्य आरक्षण से किसी को कोई नुकसान नहीं होगा। हां, इससे यादव तिकड़ी और अन्य को अपनों को टिकट देने का रास्ता थोड़ा कम हो जाएगा। यही इनके विरोध की वजह है। दूसरी तरफ, सामान्य महिला आरक्षण के विरोध के बहाने ही लालू-मुलायम को अपनी खोई जमीन फिर से हासिल करने का एक रास्ता नज़र आ रहा था। जिसमें वे कामयाब नहीं हो सके। मुलायम और लालू मुस्लिमों को रिझाने के लिए ही सारी कवायद कर रहे थे। वह जानते हैं कि अब भाजपा का हौव्वा खड़ा कर मुस्लिमों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकते। क्योंकि, मुस्लिम मतदाता इनकी नीयत को भांप चुका है। कांग्रेस की तरफ मुस्लिमों का झुकाव इन्हें रास नहीं आ रहा है।
ध्यान रहे जब दो तिहाई बहुमत से राज्य सभा में विधेयक पास हो गया तो नजमा हेपतुल्ला कितनी खुश थीं। वह भी तो मुस्लिम ही हैं। उन्हें तो इससे तनिक भी ऐतराज नहीं है। दूसरी तरफ, आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी ने मांग नहीं की थी। तो क्या वजह है कि सर्वाधिक हितैषी मुलायम और लालू-शरद ही हैं। दरअसल, ये लोग अपनों के अलावा कभी सर्वसमाज के बारे में सोच ही नहीं सकते। यह भूल जाते हैं कि कभी जाति की राजनीति को आधार बनाकर कभी भी सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। उत्तर प्रदेश में मायावती ने जैसे ही तिलक तराजू की बात त्यागीं वैसे ही प्रचण्ड बहुमत से जीतीं। क्या कभी मायावती दलित की राजनीति करके पूर्ण बहुमत से सत्ता में आईं होतीं। यह बात जितनी जल्द लालू मुलायम शरद जैसे जातिवाद फैलाने वाले समझ जाएं उतना ही अच्छा है।
विधेयक पास होने के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद या विधानसभाओं में वैसी महिलाएं चुनकर आएंगी जिन्हें पता हो कि उनका दायित्व क्या है? ऐसा न हो कि चुनाव तो जीत जाएं लेकिन उनका रिमोट किसी और के हाथ में हो। जैसा कि पंचायतों में हो रहा है। सोनिया, सुषमा स्वराज, शीला, मायावती, बिन्दा करात सरीखे महिला नेताओं की देश को जरूरत है। फिलहाल, जो महिलाएं लोकसभा या राज्य सभा में है वे अधिकतर पुरुष नेताओं से ज्यादे शिक्षित और पेशेवर हैं। ऐसी महिलाएं चुनकर आएं तो निश्चित तौर पर हमारा लोकतन्त्र सही अर्थों में सफल हो जाएगा। लेकिन इसकी उम्मीद कम है.
पिछड़ों, दलितों और मुस्लिम महिलाओं के लिए कोटे के अन्दर कोटे की पैरोकारी करने वाले कथित लंबरदारों के विरोध के बावजूद महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक राज्यसभा में पास होना वाकई ऐतिहासिक कदम है। लेकिन, इससे महिलाओं के सारे दुख दूर हो जाएंगे ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। लेकिन एक उम्मीद तो जगती है। दूसरी तरफ, एक सार्थक विधेयक पर लेफ्ट, राइट और कांग्रेस का एक साथ आना लोकतन्त्र के लिए सुखद है। जो यह बताने के लिए काफी है कि दुनिया में भारतीय लोकतन्त्र की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
महिलाएं चाहे पिछड़े वर्ग की हों, दलित हों या मुस्लिम समुदाय की हों अथवा अगड़ी जातियों से सम्बंधित हों उनकी समस्याएं एक जैसी होती हैं। महिलाओं को आरक्षण के नाम पर बांटना निश्चित तौर पर गलत है। लेकिन, यह बात लालू, मुलायम और शरद यादव को समझ में आए तब न। इन्हें तो लोकतन्त्र में ही विश्वास नहीं है। संसद में जो मर्यादा इन लोगों ने दिखाया उससे देश का हर संभ्रान्त नागरिक दुखी है। लोकतन्त्र में विरोध करने का तरीका होता है। लेकिन, इस तरह का आचरण तनिक भी शोभनीय नहीं है। ऐसे आचरण करने वाले दलों के नेताओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इन दलों की मान्यता तक समाप्त कर दी जानी चाहिए। इसी से देश में जातिवाद की जड़ें खत्म होंगी।
दूसरी तरफ, मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक का विरोध करने का ठोस कारण किसी पार्टी के पास नहीं है। जो दल विरोध कर रहे हैं उसके पीछे उनकी मंशा गलत है। दरअसल, यह दल आरक्षण के आड़ में अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं। इन्हें डर है कि अबतक जो लाभ इन्हें मिलता रहा है। महिलाओं को आरक्षण देने के बाद नहीं मिलेगा। इनके कुनबे को मिलने वाली मलाई बंट जाएगी।
दरअसल, यादव तिकड़ी कोटे के अन्दर कोटे की मांग यों ही नहीं कर रही है। इसके पीछे एक गहरी सोच है। जो मण्डल कमीशन की राजनीति से जुड़ी है। इनकी मंशा स्पष्ट तौर पर सामान्य जाति के लोगों को संसद और विधानसभाओं से बाहर करने की है। आरक्षण के अन्दर आरक्षण की व्यवस्था से असल में कम तो सामान्य वर्ग की सीटें ही होंगी। दूसरी तरफ सामान्य आरक्षण से किसी को कोई नुकसान नहीं होगा। हां, इससे यादव तिकड़ी और अन्य को अपनों को टिकट देने का रास्ता थोड़ा कम हो जाएगा। यही इनके विरोध की वजह है। दूसरी तरफ, सामान्य महिला आरक्षण के विरोध के बहाने ही लालू-मुलायम को अपनी खोई जमीन फिर से हासिल करने का एक रास्ता नज़र आ रहा था। जिसमें वे कामयाब नहीं हो सके। मुलायम और लालू मुस्लिमों को रिझाने के लिए ही सारी कवायद कर रहे थे। वह जानते हैं कि अब भाजपा का हौव्वा खड़ा कर मुस्लिमों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकते। क्योंकि, मुस्लिम मतदाता इनकी नीयत को भांप चुका है। कांग्रेस की तरफ मुस्लिमों का झुकाव इन्हें रास नहीं आ रहा है।
ध्यान रहे जब दो तिहाई बहुमत से राज्य सभा में विधेयक पास हो गया तो नजमा हेपतुल्ला कितनी खुश थीं। वह भी तो मुस्लिम ही हैं। उन्हें तो इससे तनिक भी ऐतराज नहीं है। दूसरी तरफ, आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी ने मांग नहीं की थी। तो क्या वजह है कि सर्वाधिक हितैषी मुलायम और लालू-शरद ही हैं। दरअसल, ये लोग अपनों के अलावा कभी सर्वसमाज के बारे में सोच ही नहीं सकते। यह भूल जाते हैं कि कभी जाति की राजनीति को आधार बनाकर कभी भी सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। उत्तर प्रदेश में मायावती ने जैसे ही तिलक तराजू की बात त्यागीं वैसे ही प्रचण्ड बहुमत से जीतीं। क्या कभी मायावती दलित की राजनीति करके पूर्ण बहुमत से सत्ता में आईं होतीं। यह बात जितनी जल्द लालू मुलायम शरद जैसे जातिवाद फैलाने वाले समझ जाएं उतना ही अच्छा है।
विधेयक पास होने के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद या विधानसभाओं में वैसी महिलाएं चुनकर आएंगी जिन्हें पता हो कि उनका दायित्व क्या है? ऐसा न हो कि चुनाव तो जीत जाएं लेकिन उनका रिमोट किसी और के हाथ में हो। जैसा कि पंचायतों में हो रहा है। सोनिया, सुषमा स्वराज, शीला, मायावती, बिन्दा करात सरीखे महिला नेताओं की देश को जरूरत है। फिलहाल, जो महिलाएं लोकसभा या राज्य सभा में है वे अधिकतर पुरुष नेताओं से ज्यादे शिक्षित और पेशेवर हैं। ऐसी महिलाएं चुनकर आएं तो निश्चित तौर पर हमारा लोकतन्त्र सही अर्थों में सफल हो जाएगा। लेकिन इसकी उम्मीद कम है.
March 3, 2010
हमारी आस्था और ये ढोंगी बाबा
जिस्म फरोसी के विरुद्ध सख्त कानून की जरूरत
लड़कियों को आजादी दायरा, नैतिकता और अनुशासन के साथ दी जानी चाहिए
अपने देश में आस्था या धर्म के नाम पर किसी को बेवकूफ बनाना आसान है। अच्छी और लच्छीदार बातों से लोगों का विश्वास जीत कर उन्हें चूना लगाना मुश्किल नहीं है। देश में धर्म के आड़ में सरेआम अवैध धंधे चल रहे हैं। असल में कुकुरमुत्ते की तरह देश में बढ़ते कथित धर्माचार्य, सन्त और बाबा सफेदपोसों और हुक्मरानों की काली करतूतों को धवल वस्त्र प्रदान कर रहे हैं। ये बाबा जनता और अपने भक्तों की दक्षिणा से खुद तो ऐश ओ आराम की जिन्दगी व्यतीत करते हीं है अपने चेलों के लिए विलासितापूर्ण पल उपलब्ध कराने का जरीया भी बनते हैं।
दिल्ली में गिरफ्तार सेक्स रैकेट का सरगना शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ ईच्छाधारी सन्त स्वामी भीमानन्द अकेला ही श्वेत या भगवा वस्त्रधारी बाबा नहीं है। इसके जैसे अभी तमाम दबे पड़े हैं। जिनको पुलिस जानती है लेकिन उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकती। क्योंकि पुलिस को भी डर है कि उन बाबाओं के चेले उनके डिपार्टमेंट और राजनीति में भी हैं। उसकी डायरी से २५ हजार करोर की लेनदेन का मामला भी प्रकाश में आया है।
दरअसल, ये कथित बाबा या सन्त उतने दोषी नहीं हैं जितने हम और आप हैं। जब भी कोई आदर्श की बातें करने लगता है तो हम भारतीय उसे महान मानने लगते हैं। लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह आदर्शवादी कहां से आ गया। इसका अतीत क्या है? यह और क्या गुल खिला रहा है। इन सब बातों को जानने की हमारे पास फुर्सत ही कहां है? हमें तो बस जल्दी है। और यही जल्दी हमारी दुखती नस है। जिसे राजीव रंजन द्विवेदी जैसे आस्था के भेçड़ये निगलने में देर नहीं लगाते। जब इनकी पोल खुलती है तो उस समय हम हार गए जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी हारी हुई कमाई को कसमकसाते और छटपटाते हुए केवल देखता भर है कुछ कर सकने की उसमें नैतिक बल और जोश नहीं होता।
सेक्स सरगना शिवमूर्ति के गिरफ्तारी के दौरान टीवी पर दिखाए जा रहे उन दृश्यों को जरा स्मरण करिए वह कैसे लोगों को आशीर्वाद दे रहा था और आशीर्वाद लेने वाले किस तरह से निहाल हो रहे थे। उसके शरण में जाने वाले कोई एकदम से निपट निरक्षर या गांव के भोलेभाले लोग नहीं हैं। दिल्ली जैसे मेट्रो पोलिटन सिटी में रहने वाले जागरूक लोग हैं। लेकिन, कोई यह जानना जरूरी नहीं समझा कि यह बाबा कहां से अवतरित हो गए।
शिवमूर्त द्विवेदी उर्फ इच्छामूर्ति दिल्ली में ही गार्ड की नौकरी करता था। वह नोएडा पुलिस के हत्थे भी चढ़ चुका है। वह दिनदहाड़े लूट की वारदात को अंजाम दे चुका है। जिस्म्फरोसी के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है। फिर भी लोगों का वह बाबा बन गया। उसके कदमों में धन की बरसात होने लगी। वह मन्दिर और अस्पताल तक बनवा डाला।
दूसरी तरफ, उसके साथ गिरफ्तार लड़कियां भी हाईप्रोफाइल मां-बाप की हाईप्रोफाइल बेटियां हैं। जिनकी जेब खर्चे इतने अधिक हो चुके हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए अपना शरीर बेचने में तनिक भी गुरेज नहीं है। छह में चार से लड़कियां एयर होस्टेस हैं जिनमें से एक एमबीए की छात्रा भी है। यह हमारे बदलते भारत और विकसित भारत की बदलती तस्वीर है जो स्त्री स्वतन्त्रता का हिमायती है। लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए, लेकिन दायरा, नैतिकता और अनुशासन का कड़ा पहरा भी होना चाहिए। यह देखा भी जाना चाहिए कि इस स्वतन्त्रता का बेजा इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। जो लड़कियां पकड़ी गईं हैं केवल वही दोषी नहीं हैं। उनके माता-पिता भी दोषी हैं। जिन्हें न तो अपने बच्चों को देने के लिए संस्कार है और न ही उनकी कार्य गुजारियों का समीक्षा करने के लिए समय। ऐसे में बच्चे तो ऐसे रैकेटों में फंसेंगे ही। क्योंकि, पकड़ी गई सभी लड़कियां अमीर घरों और बड़े कालेजों में पढ़ने वाली हैं। इस शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी के रैकेट में अभी पुलिस पर भरोसा करें तो कम से कम चार सौ से अधिक लड़कियां हैं। इसका नेटवर्क देश के कई बड़े शहरों में फैला हुआ है। जो अपने भक्तों के सुविधा के अनुसार सम्बंधित शहरों में ही लड़कियों को उपलब्ध कराता है।
जिस्म फरोसी के विरुद्ध सख्त और गैर जमानती कानून बनाना होगा. मौजूदा कानून बहुत लचीला. इस तरह के एक मामले में सेक्स रैकेट चलाने वाली सोनू पंजाबन छूट चुकी है. शिवेंद्र भी छूट जायेगा.
सवाल यह नहीं है कि राजीव रंजन कितना दोषी है। सवाल यह है कि हम और आप कितने दोषी हैं जो ऐसे लोगों को पनपने देने का मौका देते हैं। ऐसे लोगों पर सरकार भी क्या नियन्त्रण लगाएगी जब जनता खुद ही लूटने के लिए इनके पास जाती है।
लड़कियों को आजादी दायरा, नैतिकता और अनुशासन के साथ दी जानी चाहिए
अपने देश में आस्था या धर्म के नाम पर किसी को बेवकूफ बनाना आसान है। अच्छी और लच्छीदार बातों से लोगों का विश्वास जीत कर उन्हें चूना लगाना मुश्किल नहीं है। देश में धर्म के आड़ में सरेआम अवैध धंधे चल रहे हैं। असल में कुकुरमुत्ते की तरह देश में बढ़ते कथित धर्माचार्य, सन्त और बाबा सफेदपोसों और हुक्मरानों की काली करतूतों को धवल वस्त्र प्रदान कर रहे हैं। ये बाबा जनता और अपने भक्तों की दक्षिणा से खुद तो ऐश ओ आराम की जिन्दगी व्यतीत करते हीं है अपने चेलों के लिए विलासितापूर्ण पल उपलब्ध कराने का जरीया भी बनते हैं।
दिल्ली में गिरफ्तार सेक्स रैकेट का सरगना शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ ईच्छाधारी सन्त स्वामी भीमानन्द अकेला ही श्वेत या भगवा वस्त्रधारी बाबा नहीं है। इसके जैसे अभी तमाम दबे पड़े हैं। जिनको पुलिस जानती है लेकिन उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकती। क्योंकि पुलिस को भी डर है कि उन बाबाओं के चेले उनके डिपार्टमेंट और राजनीति में भी हैं। उसकी डायरी से २५ हजार करोर की लेनदेन का मामला भी प्रकाश में आया है।
दरअसल, ये कथित बाबा या सन्त उतने दोषी नहीं हैं जितने हम और आप हैं। जब भी कोई आदर्श की बातें करने लगता है तो हम भारतीय उसे महान मानने लगते हैं। लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह आदर्शवादी कहां से आ गया। इसका अतीत क्या है? यह और क्या गुल खिला रहा है। इन सब बातों को जानने की हमारे पास फुर्सत ही कहां है? हमें तो बस जल्दी है। और यही जल्दी हमारी दुखती नस है। जिसे राजीव रंजन द्विवेदी जैसे आस्था के भेçड़ये निगलने में देर नहीं लगाते। जब इनकी पोल खुलती है तो उस समय हम हार गए जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी हारी हुई कमाई को कसमकसाते और छटपटाते हुए केवल देखता भर है कुछ कर सकने की उसमें नैतिक बल और जोश नहीं होता।
सेक्स सरगना शिवमूर्ति के गिरफ्तारी के दौरान टीवी पर दिखाए जा रहे उन दृश्यों को जरा स्मरण करिए वह कैसे लोगों को आशीर्वाद दे रहा था और आशीर्वाद लेने वाले किस तरह से निहाल हो रहे थे। उसके शरण में जाने वाले कोई एकदम से निपट निरक्षर या गांव के भोलेभाले लोग नहीं हैं। दिल्ली जैसे मेट्रो पोलिटन सिटी में रहने वाले जागरूक लोग हैं। लेकिन, कोई यह जानना जरूरी नहीं समझा कि यह बाबा कहां से अवतरित हो गए।
शिवमूर्त द्विवेदी उर्फ इच्छामूर्ति दिल्ली में ही गार्ड की नौकरी करता था। वह नोएडा पुलिस के हत्थे भी चढ़ चुका है। वह दिनदहाड़े लूट की वारदात को अंजाम दे चुका है। जिस्म्फरोसी के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है। फिर भी लोगों का वह बाबा बन गया। उसके कदमों में धन की बरसात होने लगी। वह मन्दिर और अस्पताल तक बनवा डाला।
दूसरी तरफ, उसके साथ गिरफ्तार लड़कियां भी हाईप्रोफाइल मां-बाप की हाईप्रोफाइल बेटियां हैं। जिनकी जेब खर्चे इतने अधिक हो चुके हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए अपना शरीर बेचने में तनिक भी गुरेज नहीं है। छह में चार से लड़कियां एयर होस्टेस हैं जिनमें से एक एमबीए की छात्रा भी है। यह हमारे बदलते भारत और विकसित भारत की बदलती तस्वीर है जो स्त्री स्वतन्त्रता का हिमायती है। लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए, लेकिन दायरा, नैतिकता और अनुशासन का कड़ा पहरा भी होना चाहिए। यह देखा भी जाना चाहिए कि इस स्वतन्त्रता का बेजा इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। जो लड़कियां पकड़ी गईं हैं केवल वही दोषी नहीं हैं। उनके माता-पिता भी दोषी हैं। जिन्हें न तो अपने बच्चों को देने के लिए संस्कार है और न ही उनकी कार्य गुजारियों का समीक्षा करने के लिए समय। ऐसे में बच्चे तो ऐसे रैकेटों में फंसेंगे ही। क्योंकि, पकड़ी गई सभी लड़कियां अमीर घरों और बड़े कालेजों में पढ़ने वाली हैं। इस शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी के रैकेट में अभी पुलिस पर भरोसा करें तो कम से कम चार सौ से अधिक लड़कियां हैं। इसका नेटवर्क देश के कई बड़े शहरों में फैला हुआ है। जो अपने भक्तों के सुविधा के अनुसार सम्बंधित शहरों में ही लड़कियों को उपलब्ध कराता है।
जिस्म फरोसी के विरुद्ध सख्त और गैर जमानती कानून बनाना होगा. मौजूदा कानून बहुत लचीला. इस तरह के एक मामले में सेक्स रैकेट चलाने वाली सोनू पंजाबन छूट चुकी है. शिवेंद्र भी छूट जायेगा.
सवाल यह नहीं है कि राजीव रंजन कितना दोषी है। सवाल यह है कि हम और आप कितने दोषी हैं जो ऐसे लोगों को पनपने देने का मौका देते हैं। ऐसे लोगों पर सरकार भी क्या नियन्त्रण लगाएगी जब जनता खुद ही लूटने के लिए इनके पास जाती है।
February 17, 2010
इन सिरफिरे माओवादियों को बेरहमी से कुचलना होगा
ये सभ्य समाज में रहने लायक नहीं हैं
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा में 14 ईस्टर्न फ्रंटियर रायफल्स के बेस कैंप पर माओवादियों ने हमला कर अपने रक्तपिपासु और बर्बर जमीर को ही साबित किया है। जिस तरह से इन वामपन्थी आतंकवादियों ने 24 जवानों को मार डाला और इनमें नौ को ज़िन्दा जला डाला इससे तो यही प्रमाणित होता है कि ये निश्चित तौर पर मानसिक और भावनात्मक रूप से पागल हो चुके हैं। आखिर शहीद हुए इन 24 जवानों ने इनका क्या बिगाड़ा था? ये जवान तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे। इनका न तो किसी से दोस्ती थी और न ही दुश्मनी। दूसरी तरफ, इन जवानों की शहादत के लिए सीधे केन्द्र सरकार की ढुलमुल नीतियां ही जिम्मेदार हैं। केन्द्र सरकार अपने नफे-नुकसान को सामने रख कर इनके विरुद्ध कार्रवाई करना चाह रही है। कब तक इन इंसानी भेरियों के भेंट चढ़ते रहेंगे हमारे जवान। इन पागलों के खिलाफ अब सख्त से सख्त कार्रवाई करना ही एकमात्र विकल्प है।
सोमवार को शाम 5.30 बजे अर्धसैनिक बलों के कैंप पर कायरों की तरह जवानों पर हमला करने वाले ये कथित माओवादी या नक्सली किसी भी तरह से क्षमा या सहानुभूति के पात्र नहीं है। जो लोग इनसे सहानुभूति रखते हैं उन्हें न तो सभ्य समाज से मतलब है और न ही लोकतान्त्रिक मूल्यों में तनिक भी विश्वास है। उधर, माओवादी किशन ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा है कि यह चिदंबरम के ऑपरेशन ग्रीन हंट का जवाब है। किशन का जवाब कितना हास्यास्पद और बचकाना है। गृहमन्त्री चिदंबरम कोई अपना व्यक्तिगत मिशन नहीं चला रहे हैं। यह तो केन्द्र सरकार की कार्रवाई है। जो देश में आतंक फैलाने वाले किसी के भी विरुद्ध कार्रवाई कर देशवासियों को सुरक्षा का वातावरण मुहैया कराने के लिए जिम्मेदार है। ये माओवादी इससे पहले भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों और पुलिस वालों की जान ले चुके हैं। सोमवार का हमला अक्षम्य है। क्योंकि ये जवान भी तो किसी के बेटे, भाई, पिता और पति हैं। क्या इन शहीद हुए जवानों के परिजन कभी इन्हें माफ कर सकते हैं। शायद कभी नहीं।
कहने को तो ये माओवादी भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन, इन्हें किसी व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। जिन क्षेत्रों में ये सक्रिय हैं वहां के लोगों को आतंक के बल पर अपना समर्थक बनाए हुए हैं। लोगों से जबरदस्ती लेवी के रूप में धन की उगाही किस बात का संकेत है। लोगों पर अपना कथित कानून थोपना तालिबानी मानसिकता का ही तो द्योतक है।
दरअसल, माओवाद या नक्सलवाद के ये कथित लंबरदार मूल उद्देश्यों से भटके हुए हैं। जिनका उद्देश्य महज धन उगाही, मारकाट और अपना काला कानून गरीबों पर थोपना भर है। नही तो नक्सली आन्दोलन आज अपने अंजाम को प्राप्त कर लिया होता है। क्योंकि, भू आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ नक्सली आन्दोलन इस तरह रक्तपिपासु आन्दोलन में तब्दील नही हो सकता था। कई वामपन्थी पार्टियों ने इस तरह के खून खराबे को बर्बर और घृणित बताया है।
राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और पुलिस से हथियार छिनने के पीछे इनका मकसद अपनी समानान्तर सत्ता कायम करना है। दरअसल, ये सिरफिरे वामपन्थी आतंकवादी इन गतिविधियों को करके जनता में अपना खौफ पैदा करते हैं। ताकि, लोग इनका विरोध न कर सकें। हालांकि, लोगों में अपनी इमेज बनाने और सहानुभूति हासिल करने के लिए बिहार के जहांनाबाद आदि क्षेत्रों में माओवादियों ने सड़क बनवाया है। तो बड़ी संख्या में रेलवे ट्रैक, पुल और सड़क तथा मोबाइल टावरों को ध्वस्त कर दिया है। इससे परेशानी तो आम जनता को ही होती है। सरकार इन बुनियादी सुविधाओं को जनता के पैसों से ही तो मुहैया कराती है।
वैसे, ये कथित माओवादी नेपाल की तरह यहां भी अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन, यह भूल जाते हैं कि भारत में लाल गलियारा का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। नेपाल से कन्याकुमारी तक के लाल गलियारा की सोच कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी। क्योंकि, भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियां नेपाल से भिन्न हैं। रही बात नेपाल की तो वहां राजा ज्ञानेन्द्र अपनी करनी से ही पदच्युत हुए हैं। यदि पूर्व राजा विरेन्द्र विक्रम रहे होते तो माओवादी नेपाल में भी कभी सिर नहीं उठा पाते। फिलहाल, नेपाल के माओवादी जिस तरह सत्ता में वापसी के लिए बौखला रहे हैं उसी तरह भारत में भी कुछ कुंठित माओवादी सत्ता सुख भोगना चाहते हैं।
अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक पाटिüयां क्षेत्रीय आकांक्षाओं से ऊपर उठ कर इन रक्तपिपासु, सिरफिरे और कुंठित कथित माओवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में केन्द्र सरकार का सहयोग करें। दूसरी तरफ, केन्द्र सरकार को संविधान में यह अधिकार प्राप्त है कि देश की अखण्डता और देशवासियों को भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के लिए कोई भी कदम उठाए। माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार को अब राज्य सरकारों का भरोसा छोड़ना होगा। क्योंकि, अब पानी सिर से ऊपर उठ चुका है।
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा में 14 ईस्टर्न फ्रंटियर रायफल्स के बेस कैंप पर माओवादियों ने हमला कर अपने रक्तपिपासु और बर्बर जमीर को ही साबित किया है। जिस तरह से इन वामपन्थी आतंकवादियों ने 24 जवानों को मार डाला और इनमें नौ को ज़िन्दा जला डाला इससे तो यही प्रमाणित होता है कि ये निश्चित तौर पर मानसिक और भावनात्मक रूप से पागल हो चुके हैं। आखिर शहीद हुए इन 24 जवानों ने इनका क्या बिगाड़ा था? ये जवान तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे। इनका न तो किसी से दोस्ती थी और न ही दुश्मनी। दूसरी तरफ, इन जवानों की शहादत के लिए सीधे केन्द्र सरकार की ढुलमुल नीतियां ही जिम्मेदार हैं। केन्द्र सरकार अपने नफे-नुकसान को सामने रख कर इनके विरुद्ध कार्रवाई करना चाह रही है। कब तक इन इंसानी भेरियों के भेंट चढ़ते रहेंगे हमारे जवान। इन पागलों के खिलाफ अब सख्त से सख्त कार्रवाई करना ही एकमात्र विकल्प है।
सोमवार को शाम 5.30 बजे अर्धसैनिक बलों के कैंप पर कायरों की तरह जवानों पर हमला करने वाले ये कथित माओवादी या नक्सली किसी भी तरह से क्षमा या सहानुभूति के पात्र नहीं है। जो लोग इनसे सहानुभूति रखते हैं उन्हें न तो सभ्य समाज से मतलब है और न ही लोकतान्त्रिक मूल्यों में तनिक भी विश्वास है। उधर, माओवादी किशन ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा है कि यह चिदंबरम के ऑपरेशन ग्रीन हंट का जवाब है। किशन का जवाब कितना हास्यास्पद और बचकाना है। गृहमन्त्री चिदंबरम कोई अपना व्यक्तिगत मिशन नहीं चला रहे हैं। यह तो केन्द्र सरकार की कार्रवाई है। जो देश में आतंक फैलाने वाले किसी के भी विरुद्ध कार्रवाई कर देशवासियों को सुरक्षा का वातावरण मुहैया कराने के लिए जिम्मेदार है। ये माओवादी इससे पहले भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों और पुलिस वालों की जान ले चुके हैं। सोमवार का हमला अक्षम्य है। क्योंकि ये जवान भी तो किसी के बेटे, भाई, पिता और पति हैं। क्या इन शहीद हुए जवानों के परिजन कभी इन्हें माफ कर सकते हैं। शायद कभी नहीं।
कहने को तो ये माओवादी भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन, इन्हें किसी व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। जिन क्षेत्रों में ये सक्रिय हैं वहां के लोगों को आतंक के बल पर अपना समर्थक बनाए हुए हैं। लोगों से जबरदस्ती लेवी के रूप में धन की उगाही किस बात का संकेत है। लोगों पर अपना कथित कानून थोपना तालिबानी मानसिकता का ही तो द्योतक है।
दरअसल, माओवाद या नक्सलवाद के ये कथित लंबरदार मूल उद्देश्यों से भटके हुए हैं। जिनका उद्देश्य महज धन उगाही, मारकाट और अपना काला कानून गरीबों पर थोपना भर है। नही तो नक्सली आन्दोलन आज अपने अंजाम को प्राप्त कर लिया होता है। क्योंकि, भू आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ नक्सली आन्दोलन इस तरह रक्तपिपासु आन्दोलन में तब्दील नही हो सकता था। कई वामपन्थी पार्टियों ने इस तरह के खून खराबे को बर्बर और घृणित बताया है।
राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और पुलिस से हथियार छिनने के पीछे इनका मकसद अपनी समानान्तर सत्ता कायम करना है। दरअसल, ये सिरफिरे वामपन्थी आतंकवादी इन गतिविधियों को करके जनता में अपना खौफ पैदा करते हैं। ताकि, लोग इनका विरोध न कर सकें। हालांकि, लोगों में अपनी इमेज बनाने और सहानुभूति हासिल करने के लिए बिहार के जहांनाबाद आदि क्षेत्रों में माओवादियों ने सड़क बनवाया है। तो बड़ी संख्या में रेलवे ट्रैक, पुल और सड़क तथा मोबाइल टावरों को ध्वस्त कर दिया है। इससे परेशानी तो आम जनता को ही होती है। सरकार इन बुनियादी सुविधाओं को जनता के पैसों से ही तो मुहैया कराती है।
वैसे, ये कथित माओवादी नेपाल की तरह यहां भी अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन, यह भूल जाते हैं कि भारत में लाल गलियारा का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। नेपाल से कन्याकुमारी तक के लाल गलियारा की सोच कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी। क्योंकि, भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियां नेपाल से भिन्न हैं। रही बात नेपाल की तो वहां राजा ज्ञानेन्द्र अपनी करनी से ही पदच्युत हुए हैं। यदि पूर्व राजा विरेन्द्र विक्रम रहे होते तो माओवादी नेपाल में भी कभी सिर नहीं उठा पाते। फिलहाल, नेपाल के माओवादी जिस तरह सत्ता में वापसी के लिए बौखला रहे हैं उसी तरह भारत में भी कुछ कुंठित माओवादी सत्ता सुख भोगना चाहते हैं।
अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक पाटिüयां क्षेत्रीय आकांक्षाओं से ऊपर उठ कर इन रक्तपिपासु, सिरफिरे और कुंठित कथित माओवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में केन्द्र सरकार का सहयोग करें। दूसरी तरफ, केन्द्र सरकार को संविधान में यह अधिकार प्राप्त है कि देश की अखण्डता और देशवासियों को भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के लिए कोई भी कदम उठाए। माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार को अब राज्य सरकारों का भरोसा छोड़ना होगा। क्योंकि, अब पानी सिर से ऊपर उठ चुका है।
February 12, 2010
गृहमन्त्री जी कश्मीरी पण्डितों को वापसी का प्रस्ताव कब देंगे?
अपने ही देश में शरणार्थी बने हैं कश्मीरी पण्डित
कांग्रेस का समर्थन परंपरागत तुष्टिकरण का ही नीति है
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमन्त्री उमर अब्दुल्ला के पाक अधिकृत कश्मीर गए युवाओं के वापस आने और उनके पुनर्वास और समर्पण के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार की सहमति मिलना कांग्रेस की परंपरागत तुष्टिकरण नीतियों का ही परिचायक है। अचानक आए इस वक्तव्य से केन्द्र और राज्य सरकार की नीयत पर प्रश्नचिंह उठना स्वाभाविक है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के एक मन्त्री तक ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है। हालांकि, मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस प्रस्ताव का तीव्र विरोध कर विपक्षी दल के धर्म का निर्वाह कर दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी किस दमदार तरीके से केन्द्र और राज्य सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध करती है। जो लोग पाकिस्तान या पीओके गए हैं उनकी पूरी छानबीन कर यह जानने की कभी कोशिश की गई है कि वे लोग वहां क्या कर रहे हैं? भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वालों को पुनर्वास नहीं उन्हें सजा-ए-मौत मिलनी चाहिए। ताकि, दूसरे कथित तौर पर भटके युवाओं को सीख मिले। क्या केन्द्र और राज्य सरकार देशवासियों को यह निश्चित आश्वासन दे पाएंगी कि वे युवक फिर से नहीं भटकेंगे? यदि फिर से भटकते हैं या उनके साथ दूसरे तरीके से घुसपैठ होती है तो इसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही किसकी होगी?
दूसरी तरफ, राज्य के विकास का सब्जबाग दिखाने वाले मुख्यमन्त्री उमर ने कश्मीरी पण्डितों के राज्य में वापसी के लिए अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं दिया और नहीं पण्डितों को यह भरोसा ही दिलाया कि यदि वे वापस लौटते हैं तो राज्य में उनको पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी। वहीं केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार ही अपनी दूसरी पारी में इस सम्बंध में कुछ करती नहीं दिख रही है। ऐसे में देशद्रोह कर पाकिस्तान गए और वहां से भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने वाले लोगों और युवाओं के पुनर्वास और समर्पण का पुरजोर समर्थन करना केन्द्र की मंशा तुष्टिकरण से ज्यादा कुछ नहीं लगती। लाखों कश्मीरी पण्डित अपनी जमीन जायदाद और संपत्ति छोड़कर आज देश के कई शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। उनकी सुधी लेने की न तो फुरसत कांग्रेस की केन्द्र सरकार को है और नही कांग्रेस की समर्थन से चल रही जम्मू-कश्मीर सरकार को है। क्या कश्मीरी पण्डितों को अपने पूर्वजों के राज्य में रहने का सपना पूरा नहीं होना चाहिए। अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी से उखड़ने का दर्द क्या होता है इसे जानना हो तो कश्मीरी पण्डितों के शरणार्थी शिविरों में जाकर देखा जा सकता है।
क्या देश के प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री और कश्मीर के मुख्यमन्त्री उमर अब्दुल्ला ने कभी उन पण्डितों से मिलकर उनके दुखदर्द को जानने की कोशिश की? सरकारों ने उनकी समस्याओं को जानने के लिए कभी पहल ही नहीं कीं। क्या इसकी वजह यही है कि वे लोग हिन्दू हैं? जो अपने ही देश में शरणार्थी बने हैं। आज भी वे अपने राज्य में वापस लौटने का इन्तजार कर रहे हैं। कई तो इसी इन्तजार में कालकवलित हो गए। लेकिन, केन्द्र सरकार को उनकी खोज खबर लेने की कोई जरूरत ही महसूस नहीं होती।
यह कितना अफसोसनाक है कि जो लोग आतंकवादियों से मिलकर देश को तबाह करने की कोशिश में लगे हैं। हजारों निर्दोषों का खून बहा चुके हैं, उनकी पुनर्वास की बात की जा रही है। उन्हें भटका हुआ युवक बताया जा रहा है। राज्य का मुख्यमन्त्री उन्हें आम माफी दिलाने की वकालत करता है। लेकिन, मुख्यमन्त्री को बेगुनाह लोगों की कोई चिन्ता नहीं है जो शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं। उनकी गलती बस इतना ही है कि वे कश्मीर के हिन्दू हैं जिनका इतिहास गौरवशाली रहा है। जो वास्तव में वहां के अर्थात जम्मू-कश्मीर के मूल बाशिन्दे हैं।
सबसे ज्यादा दुख तो इस बात का है कि कोई भी दल इन कश्मीरी पण्डितों की बात नहीं करता। कोई भी दल अपने घोषणापत्र में इनके पुनर्वास की बात नहीं उठाता। गृहमन्त्री पी. चिदंबरम को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। जिस जल्दबाजी में उन्होंने उमर अब्दुल्ला का समर्थन किया है, उसी के साथ गृहमन्त्री को मुख्यमन्त्री से पूछना चाहिए था कि इन पण्डितों के पुनर्वास के लिए सरकार क्या कर रही है। राज्य सरकार इनकी वापसी के लिए अबतक कौन-कौन से कदम उठाई है? यदि नहीं उठाई है तो क्यों? क्या यह हिम्मत गृहमन्त्री पी. चिदंबरम दिखा पाएंगे? इस सवाल का जवाब कश्मीरी पण्डितों के साथ सभी देशवासियों को है।
February 9, 2010
राहुल का मुम्बई दौरा बचकाना जिद से ज्यादा कुछ नहीं था
देश में बढ़ता भाषाई नफरत कांग्रेस की ही देन है
शिवसेना शाहरुख विवाद के पीछे की राजनीति को समझना होगा
पिछले दिनों राहुल गांधी के महाराष्ट्र दौरे को मीडिया में जमकर बेचा गया। मानो राहुल गांधी महाराष्ट्र का दौरा कर उत्तर भारतीयों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान कर आए हों या यों कहें कि वहां सांप्रदायिक सौहार्द की नींव ही मजबूत कर आए हों। पांच फरवरी को पूरे चार घंटे तक और उसके बाद भी मीडिया के पास राहुल दौरा के अलावा कोई दूसरा समाचार ही नहीं था। क्या राहुल का मुम्बई दौरा वास्तव में उल्लेखनीय था? क्या इससे महाराष्ट्र की जनता को कुछ हासिल हो पाया? अथवा महाराष्ट्र में राज ठाकरे और शिव सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा सताए जा रहे लोगों के जख्म पर थोड़ा बहुत भी मरहम लग पाया? सच तो यह है कि राहुल का दौरा छोटे बच्चों के जिद के अलावा और कुछ था ही नहीं। उनके दौरे से सरकारी काम काज ही प्रभावित हुआ। क्योंकि, प्रदेश के मुख्यमन्त्री सहित पूरा प्रशासनिक अमला राहुल के सुरक्षा में ही लगा रहा। इससे आम आदमी को हुई परेशानी का किसे एहसास है? क्या कांग्रेस की प्रदेश सरकार और राहुल गांधी यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके दौरे के बाद वहां उत्तर भारतीयों पर हमले नहीं होंगे? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है क्योंकि, राज ठाकरे भी तो कांग्रेस के मूक समर्थन से पुष्पित पल्लवित हुए हैं।
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हो रहे हमलों के लिए शुद्ध रूप से कांग्रेस की अदूरदर्शी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। दरअसल, नेहरू जी ने भाषा को राज्यों के गठन का आधार मान कर भविष्य के लिए विष वृक्ष लगा दिया था। जिसका जहरीला फल आज भी महाराष्ट्र सरीखे अन्य राज्यों में हिन्दी भाषियों को खाना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में दो दशक से कांग्रेस की सरकार है और इन्हीं दो दशकों में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों के निवासियों पर वहां हमले किए गए। कांग्रेस राज की पुलिस तमाशबीन की तरह उत्तर भारतीयों को पीटते देखती रही। लेकिन, कार्रवाई के नाम पर केवल मीडिया में बयान जारी करके सरकार ने अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिया।
जिस तरह से राहुल गांधी के दौरे को लेकर फुलप्रुफ सुरक्षा व्यवस्था खड़ा किया गया था यदि इसके थोड़े हिस्से को भी उत्तर भारतीयों के सुरक्षा में लगा दिया गया होता तो उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग नहीं पीटे गए होते और न ही राज ठाकरे के गुण्डों को अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का मौका मिला होता।
दूसरी तरफ, शाहरुख खान ने भी क्या सामयिक मौका तलाशा। उनकी फिल्म जल्द ही रिलीज होने वाली है। उस फिल्म के प्रचार के लिए कितना शानदार मुद्दा तलाश लिया। क्रिकेट के बहाने ही उन्होंने बयान देकर उस पर प्रतिक्रिया के लिए शिव सेना को प्रेरित किया। महाराष्ट्र में जो कुछ भी बवाल हुआ वह सब उनकी गैर मौजूदगी में ही हुआ। उनके स्वदेश लौटते ही सारा विवाद शान्त हो गया। दोनों तरफ से कोई उत्तेजक बयान नहीं आए। पर्दे के पीछे कहीं कोई और बात तो नहीं छिपी है! इस राज को समझना कोई कठिन नहीं है। शाहरुख खान और बाल ठाकरे दोनों ही कलाकार हैं। फर्क इतना ही है कि बाल ठाकरे आज राजनीति के शीर्ष से ढलान पर आ गए हैं जबकि, शाहरुख फिल्मी दुनिया के शीर्ष पर अभी भी काबिज हैं। शाहरुख जानते हैं कि कौन सी चाल उनकी फिल्म के लिए रामबाण हो सकती है। और यही हुआ बैठे बिठाए ही उनकी नई फिल्म का जमकर प्रमोशन हो गया। रिलीज होने से पहले ही उनकी फिल्म सुर्खियां बटोर चुकी है। खबरों के मुताबिक पाकिस्तान में उनकी फिल्म का अवैध सीडी कारोबार लगभग एक अरब केआसपास पहुंच गया है।
दूसरी तरफ, ठाकरे परिवार को उनकी औकात बताने के लिए राहुल गांधी को मुम्बई जाना पड़ाता है। क्या यह केवल ठाकरे के बयान से उपजा विवाद भर ही है या बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव की राहुल की तैयारी है। क्या कांग्रेस की दोहरी चाल को लोग नही समझ पा रहे हैं? उस समय राहुल कहां थे जब बिहार और उत्तरप्र देश के छात्र मुम्बई रेलवे स्टेशन पर दौड़ा दौड़ा क र पीटे जा रहे थे। उसे समय राहुल राज ठाकरे को औकात बताने क्यों नहीं गए?
January 29, 2010
महानगरों में कम होते जिन्दगी के मायने
बात-बात पर जान लेने से पीछे नहीं हट रहे दिल्ली वाले
लगता है दिल्ली सरीखे महानगरों में रहने लोग मानवीय संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि, छोटी-छोटी बातों पर भी लोग एक दूसरे की जान लेने से नहीं चूक रहे हैं। लोगों का गुस्सा और तनाव तो आदिम युग की बर्बरता की कहानियों को ताजा करने लगा है। क्या महानगरों में जिन्दगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? दिल्ली की यह खबर तो शायद कुछ इसी तरफ ही इशारा करती है।
पिछले दिन देश की राजधानी में एक युवक की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह कुछ लोगों को अपने घर के सामने लघुशंका करने से मना कर रहा था। समाचारों के अनुसार मृत युवक के घर के सामने ही एक फैक्टरी है। वहां काम करने वाले मजदूर और अन्य कर्मचारी अक्सर उसके घर के सामने लघुशंका करते थे। घटना के दिन फैक्टरी मालिक अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पी रखा था। इसके बाद फैक्टरी मालिक अपने दोस्तों के साथ युवक के घर के सामने पेशाब करने लगा। जिस पर युवक ने मना किया तो उसने अपने दोस्तों और कर्मचारियों के साथ मिलकर उसे इतना पीटा कि वह युवक दम ही तोड़ दिया। हालांकि, पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फैक्टरी मालिक को गिरफ्तार कर लिया और अन्य की तलाश कर रही है।
सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। सवाल इस बात का है कि दिल्ली हमारे देश की राजधानी है। ऐसे में यहां रहने वाले लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हों तो इससे शर्मिन्दगी और अधिक क्या हो सकती है? यह सच है कि एक या दो घटनाओं से पूरे महानगर को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है यह भी सच है कि जो लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं उनकी शैक्षणिक और सामाजिक स्तर दोयम दर्जे की है। लेकिन, इससे दिल्ली वालों के व्यवहार की पैरोकारी नहीं की जा सकती। क्योंकि, ऐसा देखने में आता है कि दिल्ली में पले बढ़े युवक सड़क पर खुद ही गलत दिशा में चलते हैं और आपकी गाड़ी में टक्कर भी मारेंगे और आपकी न केवल पिटाई करेंगे बल्कि जान भी लेने से नहीं चूकते हैं। ये युवक अपने आप को काफी शिक्षित और स्मार्ट मानते हैं।
दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में छोटमोटी बातों पर लोग हत्या करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है एक युवक की हत्या महज बीस रुपये के लिए कर दी गई। इस तरह की लगभग दर्जन भर घटनाएं हैं जिसमें छोटी-छोटी बातों के लिए कत्ल कर देने की घटनाएं प्रकाश में आईं हैं।
दूसरी तरफ 31 दिसम्बर की रात जब पूरी दुनिया नए वर्ष के आगमन की खुशियां मना रही है तो दिल्ली में पान गुटका बेचकर अपनी जीविका चला रहे किशोर की दूसरे किशोर ने इस लिए हत्या कर दी कि उसके पास ठण्ड से बचने के लिए कुछ नहीं था। मृतक किशोर उसी दिन नया कंबल खरीद कर लाया था लेकिन उसे कंबल नसीब नहीं हो सका।
ये बातें मानवीय सोच की संकीर्ण होते दायरे को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आज हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। यदि गलत दिशा में जा रहा है तो इसके लिए हम आप क्या कर रहे हैं?
दिल्ली की उपरोक्त घटनाओं के लिए क्या वहीं जिम्मेदार हैं जो इन घटनाओं को अंजाम दिए हैं? क्या हमारा समाज इसके लिए कम दोषी है?
लगता है दिल्ली सरीखे महानगरों में रहने लोग मानवीय संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि, छोटी-छोटी बातों पर भी लोग एक दूसरे की जान लेने से नहीं चूक रहे हैं। लोगों का गुस्सा और तनाव तो आदिम युग की बर्बरता की कहानियों को ताजा करने लगा है। क्या महानगरों में जिन्दगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? दिल्ली की यह खबर तो शायद कुछ इसी तरफ ही इशारा करती है।
पिछले दिन देश की राजधानी में एक युवक की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह कुछ लोगों को अपने घर के सामने लघुशंका करने से मना कर रहा था। समाचारों के अनुसार मृत युवक के घर के सामने ही एक फैक्टरी है। वहां काम करने वाले मजदूर और अन्य कर्मचारी अक्सर उसके घर के सामने लघुशंका करते थे। घटना के दिन फैक्टरी मालिक अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पी रखा था। इसके बाद फैक्टरी मालिक अपने दोस्तों के साथ युवक के घर के सामने पेशाब करने लगा। जिस पर युवक ने मना किया तो उसने अपने दोस्तों और कर्मचारियों के साथ मिलकर उसे इतना पीटा कि वह युवक दम ही तोड़ दिया। हालांकि, पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फैक्टरी मालिक को गिरफ्तार कर लिया और अन्य की तलाश कर रही है।
सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। सवाल इस बात का है कि दिल्ली हमारे देश की राजधानी है। ऐसे में यहां रहने वाले लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हों तो इससे शर्मिन्दगी और अधिक क्या हो सकती है? यह सच है कि एक या दो घटनाओं से पूरे महानगर को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है यह भी सच है कि जो लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं उनकी शैक्षणिक और सामाजिक स्तर दोयम दर्जे की है। लेकिन, इससे दिल्ली वालों के व्यवहार की पैरोकारी नहीं की जा सकती। क्योंकि, ऐसा देखने में आता है कि दिल्ली में पले बढ़े युवक सड़क पर खुद ही गलत दिशा में चलते हैं और आपकी गाड़ी में टक्कर भी मारेंगे और आपकी न केवल पिटाई करेंगे बल्कि जान भी लेने से नहीं चूकते हैं। ये युवक अपने आप को काफी शिक्षित और स्मार्ट मानते हैं।
दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में छोटमोटी बातों पर लोग हत्या करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है एक युवक की हत्या महज बीस रुपये के लिए कर दी गई। इस तरह की लगभग दर्जन भर घटनाएं हैं जिसमें छोटी-छोटी बातों के लिए कत्ल कर देने की घटनाएं प्रकाश में आईं हैं।
दूसरी तरफ 31 दिसम्बर की रात जब पूरी दुनिया नए वर्ष के आगमन की खुशियां मना रही है तो दिल्ली में पान गुटका बेचकर अपनी जीविका चला रहे किशोर की दूसरे किशोर ने इस लिए हत्या कर दी कि उसके पास ठण्ड से बचने के लिए कुछ नहीं था। मृतक किशोर उसी दिन नया कंबल खरीद कर लाया था लेकिन उसे कंबल नसीब नहीं हो सका।
ये बातें मानवीय सोच की संकीर्ण होते दायरे को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आज हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। यदि गलत दिशा में जा रहा है तो इसके लिए हम आप क्या कर रहे हैं?
दिल्ली की उपरोक्त घटनाओं के लिए क्या वहीं जिम्मेदार हैं जो इन घटनाओं को अंजाम दिए हैं? क्या हमारा समाज इसके लिए कम दोषी है?
January 15, 2010
तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं?
उत्तरप्रदेश में सपा निश्चित तौर पर और कमजोर होगी
अमर भी नुकसान में रहेंगें
तो क्या अपने कुनबे के मोह में मुलायम सिंह यादव अमरसिंह के समाजवादी पार्टी के लिए किए गए योगदान को भूला देंगे? तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं? या कुछ और खेल है। जिस सपा और उसके मुखिया मुलायम के लिए अमर सिंह को भारतीय राजनीति का दलाल तक कह दिया गया। क्या उन्हें भुला पाना मुलायम के लिए आसान है। बेशक, मुलायम के भाई रामगोपाल यादव आज अमर की औकातं की बात कर रहे हों और उनकी हैसियत गांव के प्रधानी का चुनाव जीतने भर भी नहीं आंक रहे हों। लेकिन, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि अमर सिंह ने ही सपा को औद्योगिक घरानों से जोड़कर आर्थिक रूप से समृद्ध किया। क्योंकि, सरकार चलाने के बाद भी सपा की माली हालत ठीक नहीं थी। अमर सिंह ने जिस भाई-भतीजावादी मुद्दे पर पार्टी से बगावती तेवर अपनाया है वह भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत है। वैसे मुलायम और अमर को एक दूसरे की जरूरत है। अलग होने से मुलायम और अमर दोनों को नुकसान ही होगा।
हालांकि, अमर सिंह के लिए मुलायम ने पार्टी के कई संस्थापक सिपहसलारों को खोया है। लेकिन लोहिया के समाजवाद की बात करने वाले मुलायम जिस तरह से अपने कुनबे के मोह में फंसते जा रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के जनाधार को और कमजोर ही करेगा। केवल जातिवाद और मुस्लिमप्रस्त राजनीति करके सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। आज यादव और मुस्लिमों की पार्टी की छवि से बाहर निकल कर सपा समाज के लगभग सभी वर्गों में पैठ बना रही है तो इसके पीछे निश्चित तौर पर अमरसिंह का ही हाथ है। अमरसिंह ने सपा से न केवल राजपूतों को जोड़ा बल्कि अन्य सवर्ण जातियों को भी सपा में खींच लाने में कामयाबी हासिल की। जब भाजपा को ही उत्तरप्रदेश में सभी सवर्ण जातियां अपना दल मानती थीं वैसे माहौल में अमर सिंह ने क्षत्रियों और अन्य को सपा से जोड़कर भाजपा को कमजोर किया था। यही वजह है कि आज भाजपा उत्तरप्रदेश में चौथे स्थान पर पहुंच गई है।
दूसरी तरफ आज भी अमर सिंह की दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय स्तर पर मुलायम और उनके प्रोफेसर भाई से ज्यादा स्वीकार्यता है। विदेशी नेताओं से भी अमर के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम को असरदार बनाने में अमर सिंह का अहम योगदान रहा है। आज भी राष्ट्रीय राजनीति में अमर सिंह का लगभग सभी दलों के नेताओं से अच्छा संबंध है। अमर सिंह ने मुलायम और पार्टी को आगे बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान दिया है। और रामगोपाल और अखिलेश की छवि महज यह है कि दोनों मुलायम के भाई और पुत्र हैं।
सपा से औद्योगिक घरानों और फिल्मी कलाकारों को जोड़ने का काम अमर सिंह ने ही किया था। जब मुलायम सिंह पिछली बार मुख्यमंत्री बने थे तो इसके पीछे भी अमर का ही अमर हाथ था। उस समय सरकार बनने के बाद उत्तरप्रदेश विकास परिषद का गठन कराकर मुलायम सरकार को आर्थिक मजबूती प्रदान किया था। जिसके बल पर ही मुलायम तमाम योजनाएं चला सके थे। हालांकि, फिल्मी कलाकारों से सपा को कोई खास लाभ तो नहीं मिला लेकिन इनके जुड़ने से पार्टी की स्वीकार्यता तो बढ़ी ही है।
दूसरी तरफ, अमर के आने से पहले जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय उन्हें यादव और मुसलमानों के अलावा दलितों का भी पर्याप्त समर्थन मिला था। मुलायम की पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दलितों के नेता की छवि बनी थी। समाज के इन वर्गों में उनकी स्वीकार्यता भी थी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, मायावती के उत्थान के बाद तो दलितों ने न केवल मुलायम और सपा से कन्नी काट लिया बल्कि मुसलमान भी मुलायम का साथ छोड़ने लगे थे, कुछ जुड़े भी थे तो वह आजम और राजब्बर व दूसरे मुस्लिम नेताओं के चलते और कांग्रेस की कमजोर स्थिति और भाजपा को रोकने के लिए ही। लेकिन, अमर सिंह के सपा में अवतार के बाद से राजपूतों का झुकाव सपा की तरफ हुआ और उन्होंने दलितों की रिक्ति को कम करके सपा को मजबूत किया।
अमर सिंह जिस मुद्दे को लेकर पार्टी से नाता तोड़ने वाले हैं वह मुद्दा स्वागत योग्य है। हालांकि पर्दे के पीछे और मुद्दे हैं जो दिखाई नहीं पड़ते। अगर अमर सिंह मुलायम के कुनबे के बढ़ते दबदबे का विरोध कर रहे हैं तो यह सही कदम है। कोई भी पार्टी एक व्यक्ति की पारिवारिक पार्टी नहीं हो सकती है। लेकिन, भारतीय राजनीति का यह दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता पार्टी और वामदलों को छोड़कर कांग्रेस सहित तमाम छोटे-बड़े दल भाई भतीजावाद और कुनबाई मानसिकता से ग्रसित हैं। इन दलों में सभी महत्वपूर्ण पदों पर एक ही परिवार के सदस्य या उनके दूर तक के रिश्तेदार काबिज हैं। ऐसे में अमर सिंह का मुलायम के भाई, पुत्र और बहू के मोह का विरोध करना और पार्टी तक छोड़ने की बात कहना सुकून पहुंचाता है।
दूसरी तरफ मुलायम का दौर अब अस्ताचल की ओर जा रहा है। अब उनकी, पार्टी में अंतिम राय नहीं हो सकती। अपने कुनबे के सामने झुकना उनकी मजबूरी होगी। यदि रामगोपाल और अखिलेश अमर के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं मुलायम का ही हाथ है। लेकिन रामगोपाल और अखिलेश यादव को यह याद रखना होगा कि अमर के जाते ही सपा और कमजोर होगी। अमर के चलते जो लोग सपा से जुड़े थे वे लोग भी बॉय बोलने में देर नहीं लगाएंगे और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा और उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा फिर कभी मजबूत नहीं हो सकती।
अमर भी नुकसान में रहेंगें
तो क्या अपने कुनबे के मोह में मुलायम सिंह यादव अमरसिंह के समाजवादी पार्टी के लिए किए गए योगदान को भूला देंगे? तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं? या कुछ और खेल है। जिस सपा और उसके मुखिया मुलायम के लिए अमर सिंह को भारतीय राजनीति का दलाल तक कह दिया गया। क्या उन्हें भुला पाना मुलायम के लिए आसान है। बेशक, मुलायम के भाई रामगोपाल यादव आज अमर की औकातं की बात कर रहे हों और उनकी हैसियत गांव के प्रधानी का चुनाव जीतने भर भी नहीं आंक रहे हों। लेकिन, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि अमर सिंह ने ही सपा को औद्योगिक घरानों से जोड़कर आर्थिक रूप से समृद्ध किया। क्योंकि, सरकार चलाने के बाद भी सपा की माली हालत ठीक नहीं थी। अमर सिंह ने जिस भाई-भतीजावादी मुद्दे पर पार्टी से बगावती तेवर अपनाया है वह भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत है। वैसे मुलायम और अमर को एक दूसरे की जरूरत है। अलग होने से मुलायम और अमर दोनों को नुकसान ही होगा।
हालांकि, अमर सिंह के लिए मुलायम ने पार्टी के कई संस्थापक सिपहसलारों को खोया है। लेकिन लोहिया के समाजवाद की बात करने वाले मुलायम जिस तरह से अपने कुनबे के मोह में फंसते जा रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के जनाधार को और कमजोर ही करेगा। केवल जातिवाद और मुस्लिमप्रस्त राजनीति करके सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। आज यादव और मुस्लिमों की पार्टी की छवि से बाहर निकल कर सपा समाज के लगभग सभी वर्गों में पैठ बना रही है तो इसके पीछे निश्चित तौर पर अमरसिंह का ही हाथ है। अमरसिंह ने सपा से न केवल राजपूतों को जोड़ा बल्कि अन्य सवर्ण जातियों को भी सपा में खींच लाने में कामयाबी हासिल की। जब भाजपा को ही उत्तरप्रदेश में सभी सवर्ण जातियां अपना दल मानती थीं वैसे माहौल में अमर सिंह ने क्षत्रियों और अन्य को सपा से जोड़कर भाजपा को कमजोर किया था। यही वजह है कि आज भाजपा उत्तरप्रदेश में चौथे स्थान पर पहुंच गई है।
दूसरी तरफ आज भी अमर सिंह की दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय स्तर पर मुलायम और उनके प्रोफेसर भाई से ज्यादा स्वीकार्यता है। विदेशी नेताओं से भी अमर के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम को असरदार बनाने में अमर सिंह का अहम योगदान रहा है। आज भी राष्ट्रीय राजनीति में अमर सिंह का लगभग सभी दलों के नेताओं से अच्छा संबंध है। अमर सिंह ने मुलायम और पार्टी को आगे बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान दिया है। और रामगोपाल और अखिलेश की छवि महज यह है कि दोनों मुलायम के भाई और पुत्र हैं।
सपा से औद्योगिक घरानों और फिल्मी कलाकारों को जोड़ने का काम अमर सिंह ने ही किया था। जब मुलायम सिंह पिछली बार मुख्यमंत्री बने थे तो इसके पीछे भी अमर का ही अमर हाथ था। उस समय सरकार बनने के बाद उत्तरप्रदेश विकास परिषद का गठन कराकर मुलायम सरकार को आर्थिक मजबूती प्रदान किया था। जिसके बल पर ही मुलायम तमाम योजनाएं चला सके थे। हालांकि, फिल्मी कलाकारों से सपा को कोई खास लाभ तो नहीं मिला लेकिन इनके जुड़ने से पार्टी की स्वीकार्यता तो बढ़ी ही है।
दूसरी तरफ, अमर के आने से पहले जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय उन्हें यादव और मुसलमानों के अलावा दलितों का भी पर्याप्त समर्थन मिला था। मुलायम की पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दलितों के नेता की छवि बनी थी। समाज के इन वर्गों में उनकी स्वीकार्यता भी थी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, मायावती के उत्थान के बाद तो दलितों ने न केवल मुलायम और सपा से कन्नी काट लिया बल्कि मुसलमान भी मुलायम का साथ छोड़ने लगे थे, कुछ जुड़े भी थे तो वह आजम और राजब्बर व दूसरे मुस्लिम नेताओं के चलते और कांग्रेस की कमजोर स्थिति और भाजपा को रोकने के लिए ही। लेकिन, अमर सिंह के सपा में अवतार के बाद से राजपूतों का झुकाव सपा की तरफ हुआ और उन्होंने दलितों की रिक्ति को कम करके सपा को मजबूत किया।
अमर सिंह जिस मुद्दे को लेकर पार्टी से नाता तोड़ने वाले हैं वह मुद्दा स्वागत योग्य है। हालांकि पर्दे के पीछे और मुद्दे हैं जो दिखाई नहीं पड़ते। अगर अमर सिंह मुलायम के कुनबे के बढ़ते दबदबे का विरोध कर रहे हैं तो यह सही कदम है। कोई भी पार्टी एक व्यक्ति की पारिवारिक पार्टी नहीं हो सकती है। लेकिन, भारतीय राजनीति का यह दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता पार्टी और वामदलों को छोड़कर कांग्रेस सहित तमाम छोटे-बड़े दल भाई भतीजावाद और कुनबाई मानसिकता से ग्रसित हैं। इन दलों में सभी महत्वपूर्ण पदों पर एक ही परिवार के सदस्य या उनके दूर तक के रिश्तेदार काबिज हैं। ऐसे में अमर सिंह का मुलायम के भाई, पुत्र और बहू के मोह का विरोध करना और पार्टी तक छोड़ने की बात कहना सुकून पहुंचाता है।
दूसरी तरफ मुलायम का दौर अब अस्ताचल की ओर जा रहा है। अब उनकी, पार्टी में अंतिम राय नहीं हो सकती। अपने कुनबे के सामने झुकना उनकी मजबूरी होगी। यदि रामगोपाल और अखिलेश अमर के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं मुलायम का ही हाथ है। लेकिन रामगोपाल और अखिलेश यादव को यह याद रखना होगा कि अमर के जाते ही सपा और कमजोर होगी। अमर के चलते जो लोग सपा से जुड़े थे वे लोग भी बॉय बोलने में देर नहीं लगाएंगे और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा और उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा फिर कभी मजबूत नहीं हो सकती।
January 11, 2010
क्यों जाते हैं भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया
अभी नितिन गर्ग की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि ऑस्टे्रलिया में फिर एक भारतीय युवक जसप्रीत सिंह (29) को निशाना बनाया गया। इस बार ऑस्ट्रेलियाइयों ने तो सारी हदें पार करते हुए उस युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया। इस हमले में वह 20 फीसदी तक जल गया। इस कृत्य को ऑस्ट्रेलिया सरकार की विफलता माना जाए या वहां के निवासियों की दरिंदगी अथवा इसे ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता और संस्कृति ही मान लिया जाए। यह एक बहस का मुद्दा है। वर्ष 2009 में भारतीय छात्रों पर हमले की करीब 100 घटनाएं हो चुकी हैं।
क्या इसके लिए भारत की केंद्र सरकार और भारतीय छात्र जिम्मेदार नहीं हैं? अव्वल तो भारतीय छात्रों को ऐसे नस्लीय देशों में जाना ही नहीं चाहिए। जहां के नागरिकों में इंसानियत से कोई सरोकार ही नहीं है। जो छात्र लाखों खर्च करके ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उससे कम पैसे में भारत में भी वही शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। अपने देश में भी मेडिकल, आईटी और प्रबंधन की पढ़ाई विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से तनिक भी कम नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि विदेशों से शिक्षा ग्रहण कर लौटे छात्रों को कंपनियां यहां हाथों-हाथ लेती हैं या उनमें अतिरिक्त पेशेवराना कौशल होता है। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विदेश में जाकर पढ़ाई करने के पीछे कुछ छात्र और उनके परिवार दिखावे की ग्रंथी से भी प्रेरित होते हैं। लेकिन, अधिकांश छात्र भारत की आईटी, प्रबंधन और मेडिकल संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था की मार से ही विदेशों में जाने को विवश हैं और अपनी जान गवां रहे हैं। चूँकि यहां इन संस्थानों में कोटा निर्धारित है। जिससे बहुत से छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाना पड़ता है। यदि सरकार भारी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान देश के हर कोने में खेल देती तो यहां के छात्र विदेशों में अपमानित और हमले के शिकार नहीं होते। दूसरे अपने देश का पैसा विदेशों में नहीं जाता। दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी सरकार चलाने के अलावा इस ओर सोचने का मौका ही नहीं मिलता।
भारत को आजादी मिलने से कुछ साल पहले ही जापान को बर्बाद कर दिया गया था लेकिन आज वही जापान भारत और विश्व के अन्य देशों से विकास और अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में दशकों आगे है। इसके पीछे उनकी ईमानदार और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है। ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करना अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन पढ़ाई के साथ सुरक्षा कारणों को भी ध्यान रखना होगा। ऑस्ट्रेलिया से बेहतर पढ़ाई न्यूजीलैंड, शिंगापुर, मॉरिशस सहित कई दूसरे पश्चिमी देशों में होती है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में बीजा नियमों में ढील दी जाती है इसलिए भी भारतीय सहित अन्य दूसरे देशों के छात्र वहां जाकर पढ़ाई करना पसंद करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक दूसरे देशों से आने वाले छात्र ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में 13 अरब डॉलर का योगदान देते हैं। लगातार हो रहे हमलों से आने वाले समय में भारतीय छात्रों की ऑस्ट्रेलिया जाने की दर पचास फीसदी तक कम होगी। जिससे ऑस्ट्रेलिया को करीब 7 करोड़ डालर का नुकसान होगा।
विदेशों में भारतीयों की दुर्दशा के लिए भारत सरकार भी कम दोषी नहीं है। जब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर छोटे-मोटे हमले हो रहे थे तो उस समय हमारी सरकार सोई हुई थी। यदि उस दौरान ही सरकार कड़ा रुख अपनाती तो शायद आज कई घरों का चिराग बूझने से बच गया होता। लेकिन यह तो भारत की सरकार है जब समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है तब उसकी तंद्रा टूटती है। छात्रों पर हमले होते रहे हमारे देश के नेता जी लोग चुप रहे।
ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर भारतीय छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करते हैं या टैक्सी चलाते हैं। छात्रों की अक्सर वहां टैçक्सयों को निशाना बनाया जाता रहा है। यही नहीं वे कंपनियों में वहां के स्थानीय युवकों की अपेक्षा कम पैसे में काम करने को तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि कंपनियां भारतीय छात्रों को ज्यादा पसंद करती हैं। दूसरे भारतीय छात्र अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं। जबकि, ऑस्ट्रेलियाई छात्रों में यह गुण कम पाया जाता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई युवक भारतीयों से जलते हैं। उनको लगता है कि भारतीय उनके अवसरों पर कब्ज कर रहे हैं।
क्या हमारी सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने नागरिकों को वेहतर सुविधाएं और छात्रों को उच्च शिक्षण संसथान उपलब्ध कराए। ताकि विदेशों में जान गवांने या जान जाने की नौबत ही न आए।
क्या इसके लिए भारत की केंद्र सरकार और भारतीय छात्र जिम्मेदार नहीं हैं? अव्वल तो भारतीय छात्रों को ऐसे नस्लीय देशों में जाना ही नहीं चाहिए। जहां के नागरिकों में इंसानियत से कोई सरोकार ही नहीं है। जो छात्र लाखों खर्च करके ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उससे कम पैसे में भारत में भी वही शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। अपने देश में भी मेडिकल, आईटी और प्रबंधन की पढ़ाई विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से तनिक भी कम नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि विदेशों से शिक्षा ग्रहण कर लौटे छात्रों को कंपनियां यहां हाथों-हाथ लेती हैं या उनमें अतिरिक्त पेशेवराना कौशल होता है। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विदेश में जाकर पढ़ाई करने के पीछे कुछ छात्र और उनके परिवार दिखावे की ग्रंथी से भी प्रेरित होते हैं। लेकिन, अधिकांश छात्र भारत की आईटी, प्रबंधन और मेडिकल संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था की मार से ही विदेशों में जाने को विवश हैं और अपनी जान गवां रहे हैं। चूँकि यहां इन संस्थानों में कोटा निर्धारित है। जिससे बहुत से छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाना पड़ता है। यदि सरकार भारी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान देश के हर कोने में खेल देती तो यहां के छात्र विदेशों में अपमानित और हमले के शिकार नहीं होते। दूसरे अपने देश का पैसा विदेशों में नहीं जाता। दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी सरकार चलाने के अलावा इस ओर सोचने का मौका ही नहीं मिलता।
भारत को आजादी मिलने से कुछ साल पहले ही जापान को बर्बाद कर दिया गया था लेकिन आज वही जापान भारत और विश्व के अन्य देशों से विकास और अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में दशकों आगे है। इसके पीछे उनकी ईमानदार और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है। ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करना अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन पढ़ाई के साथ सुरक्षा कारणों को भी ध्यान रखना होगा। ऑस्ट्रेलिया से बेहतर पढ़ाई न्यूजीलैंड, शिंगापुर, मॉरिशस सहित कई दूसरे पश्चिमी देशों में होती है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में बीजा नियमों में ढील दी जाती है इसलिए भी भारतीय सहित अन्य दूसरे देशों के छात्र वहां जाकर पढ़ाई करना पसंद करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक दूसरे देशों से आने वाले छात्र ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में 13 अरब डॉलर का योगदान देते हैं। लगातार हो रहे हमलों से आने वाले समय में भारतीय छात्रों की ऑस्ट्रेलिया जाने की दर पचास फीसदी तक कम होगी। जिससे ऑस्ट्रेलिया को करीब 7 करोड़ डालर का नुकसान होगा।
विदेशों में भारतीयों की दुर्दशा के लिए भारत सरकार भी कम दोषी नहीं है। जब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर छोटे-मोटे हमले हो रहे थे तो उस समय हमारी सरकार सोई हुई थी। यदि उस दौरान ही सरकार कड़ा रुख अपनाती तो शायद आज कई घरों का चिराग बूझने से बच गया होता। लेकिन यह तो भारत की सरकार है जब समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है तब उसकी तंद्रा टूटती है। छात्रों पर हमले होते रहे हमारे देश के नेता जी लोग चुप रहे।
ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर भारतीय छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करते हैं या टैक्सी चलाते हैं। छात्रों की अक्सर वहां टैçक्सयों को निशाना बनाया जाता रहा है। यही नहीं वे कंपनियों में वहां के स्थानीय युवकों की अपेक्षा कम पैसे में काम करने को तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि कंपनियां भारतीय छात्रों को ज्यादा पसंद करती हैं। दूसरे भारतीय छात्र अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं। जबकि, ऑस्ट्रेलियाई छात्रों में यह गुण कम पाया जाता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई युवक भारतीयों से जलते हैं। उनको लगता है कि भारतीय उनके अवसरों पर कब्ज कर रहे हैं।
क्या हमारी सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने नागरिकों को वेहतर सुविधाएं और छात्रों को उच्च शिक्षण संसथान उपलब्ध कराए। ताकि विदेशों में जान गवांने या जान जाने की नौबत ही न आए।
January 1, 2010
December 7, 2009
केंद्र की नाकामियों और महंगाई पर क्यों मौन है मीडिया ?
भारतीय मीडिया का दोहरा चरित्र
एक बार प्याज महंगी हुई तो भाजपा की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। आज ऐसा कोई भी खाद्यान्न या सब्जी नहीं है जिसे सस्ता कहा जा सके। लेकिन, कहीं भी उन दिनों की महंगी प्याज की तरह आज की महंगाई की चर्चा नहीं होती। मीडिया वाले भी कभी कभार महंगाई की खबर ब्रेक कर अपनी लोकतांत्रिक छवि का साक्ष्य पेश कर देते हैं। क्या आज की वही मीडिया है जब भाजपा सत्ता में थी तो महंगी प्याज पर हायतौबा मचा रही थी? या क्या इसे मान लेना चाहिए कि मौजूदा दौर की मीडिया संस्थानों में कांग्रेस नीत सरकार का विरोध करने अथवा किसी समस्या पर घेरने का मादा ही नहीं है। या उन दिनों भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए गहरी साजिश थी। जो भी हो आज मीडिया की भूमिका साफ सुथरी नहीं मानी जाएगी।
अटल जी के कार्यकाल में प्याज महंगी हो गई थी तो लोगों ने महंगाई पर जुमले और गाने तक बना डाले थे। उन दिनों यूपी और बिहार में एक गाना बड़ा गाया जाता था। अब का खईब सलाद हो अटल चाचा, पियजिया अनार हो गईल...। आज न केवल प्याज महंगी है बल्कि तमाम भोज्य पदार्थ महंगे हो चुके हैं। आज कोई नहीं कहता कि प्याज गरीबों के भोजन का अहम हिस्सा है। 20 रुपया किला प्याज, 40 किलो चीनी, 90 रुपया किलो अरहर की दाल और अन्य आवश्यक चीजों के दाम तो इस कांग्रेस की सरकार में ही बेहिसाब बढ़ रहे हैं। सरकार के मंत्री और रणनीतिकार हाथ खड़े कर चुके हैं। एक रटा रटाया सा जवाब आ जाता है कि जमाखोरी से महंगाई बढ़ रही है। मीडिया भी इसे तूल देने से बच रही है। क्या अटल सरकार के कार्यकाल में प्याज की जमाखोरी नहीं हुई थी। उस दौरान तो एक नीति के तहत जमाखोरी कराई गई थी। अटल सरकार के विरुद्ध मीडिया में माहौल पैदा कराया गया था। क्योंकि सरकार मीडिया के आकाओं को तृप्त नहीं कर पा रही थी।
आज एक औसत आमदनी का आम आदमी किसी तरह अपनी जिंदगी इस महंगाई के दौर में ढो रहा है। उसे बयां करना आसान नहीं है। लोगों को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ रहा है। हर जरूरतों में कटौती कर किसी तरह काम चलाने की नीति अपना कर लोग गुजारा करने पर मजबूर हैं। लेकिन, इसकी मीडिया संस्थानों को इसकी भनक नहीं है।
अटल सरकार की पैरोकारी करना अथवा बीजेपी की तरफदारी करना मेरा मकसद नहीं है। बीजेपी से मेरा दूर तक कुछ लेना देना नहीं है। और नही मीडिया को किसी पार्टी विशेष से जोड़ने का आशय है। लेकिन यह सच्चाई है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों की छोटी सी गलतियों को भी तिल का ताड़ बना कर पेश किया जाता है। मानों भाजपा की सरकारें देश की सबसे बड़ी शत्रु हैं। अभी दूर जाने की जरूरत नहीं है भाजपा का कर्नाटक संकट पर जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कवरेज किया उसे पत्रकारिता का उच्च मानदंड तो नहीं कहा जा सकता है। एक चैनल के संवाददाता (जो चैनल में राजनीतिक संपादक के पद पर हैं) जिनकी विशेषता है कि तीन वाक्य को दो शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, ने भाजपा संकट को कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस ने संकट को आंध्र में ही सुलझा लिया लेकिन भाजपा का कर्नाटक संकट दिल्ली तक पहुंचने के बाद भी नहीं सुलझ पा रहा है। अब आप बताएं दोनों पार्टियाँ एक तरह से ही कार्य करने लगें तो क्या होगा। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के निर्णय को बदलने की किसी में हिम्मत नहीं है। मतलब साफ है कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में ही आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। वहां सोनिया-राहुल के निर्णय को कोई चुनौती नहीं दे सकता यदि देता भी है तो उसे निश्चित तौर पर पार्टी से बाहर जाना होगा। वहीं भाजपा में कमोबेश अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। जिसका कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में संवाददाता का नजरिया कहां तक स्वस्थ है। आप किसी भी राजनीतिक पार्टी को दूसरे दल के नजरिये से नहीं देख सकते।
अटल सरकार की कई महत्वपूर्ण और जनकल्याणकारी योजनाओं का मीडिया द्वारा नजरअंदाज किया गया। यही नहीं प्रदेशों में भाजपा की सरकारों द्वारा किए जा रहे तमाम लोक कल्याणकारी कार्यों को महत्व नहीं मिल रहा है। गुजरात को ही लें वहां विकास के ढेरों कार्य कराए जा रहे हैं। लेकिन, उसकी चर्चा नहीं होती है। चर्चा जिस बात की होती है वह मोदी की नकारात्मक छवि की।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री ए राजा की स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के बाद भी मीडिया द्वारा ज्यादा तूल नहीं दिया गया। केंद्र सरकार कितनी चालाकी से मधु कोड़ा का मामला उठा कर अपने मंत्री के स्कैंडल को फिलहाल दबाने में कामयाब हो गई तो इसका श्रेय कांग्रेस परस्त कुछ मीडिया संस्थानों को ही जाता है।
एक उदात्त लोकतंत्र के लिए अदालतों और मीडिया का स्वतंत्र होना संजीवनी जैसा है। दुर्भाग्य से देश में इस समय कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस की केंद्र सरकार की पिछलग्गू मालूम पड़ते हैं। मीडिया संस्थानों को आर्थिक हितों के लिए पत्रकारिता के मानदंडों से समझौता नहीं करना चाहिए तभी भारत का लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सकेगा।
एक बार प्याज महंगी हुई तो भाजपा की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। आज ऐसा कोई भी खाद्यान्न या सब्जी नहीं है जिसे सस्ता कहा जा सके। लेकिन, कहीं भी उन दिनों की महंगी प्याज की तरह आज की महंगाई की चर्चा नहीं होती। मीडिया वाले भी कभी कभार महंगाई की खबर ब्रेक कर अपनी लोकतांत्रिक छवि का साक्ष्य पेश कर देते हैं। क्या आज की वही मीडिया है जब भाजपा सत्ता में थी तो महंगी प्याज पर हायतौबा मचा रही थी? या क्या इसे मान लेना चाहिए कि मौजूदा दौर की मीडिया संस्थानों में कांग्रेस नीत सरकार का विरोध करने अथवा किसी समस्या पर घेरने का मादा ही नहीं है। या उन दिनों भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए गहरी साजिश थी। जो भी हो आज मीडिया की भूमिका साफ सुथरी नहीं मानी जाएगी।
अटल जी के कार्यकाल में प्याज महंगी हो गई थी तो लोगों ने महंगाई पर जुमले और गाने तक बना डाले थे। उन दिनों यूपी और बिहार में एक गाना बड़ा गाया जाता था। अब का खईब सलाद हो अटल चाचा, पियजिया अनार हो गईल...। आज न केवल प्याज महंगी है बल्कि तमाम भोज्य पदार्थ महंगे हो चुके हैं। आज कोई नहीं कहता कि प्याज गरीबों के भोजन का अहम हिस्सा है। 20 रुपया किला प्याज, 40 किलो चीनी, 90 रुपया किलो अरहर की दाल और अन्य आवश्यक चीजों के दाम तो इस कांग्रेस की सरकार में ही बेहिसाब बढ़ रहे हैं। सरकार के मंत्री और रणनीतिकार हाथ खड़े कर चुके हैं। एक रटा रटाया सा जवाब आ जाता है कि जमाखोरी से महंगाई बढ़ रही है। मीडिया भी इसे तूल देने से बच रही है। क्या अटल सरकार के कार्यकाल में प्याज की जमाखोरी नहीं हुई थी। उस दौरान तो एक नीति के तहत जमाखोरी कराई गई थी। अटल सरकार के विरुद्ध मीडिया में माहौल पैदा कराया गया था। क्योंकि सरकार मीडिया के आकाओं को तृप्त नहीं कर पा रही थी।
आज एक औसत आमदनी का आम आदमी किसी तरह अपनी जिंदगी इस महंगाई के दौर में ढो रहा है। उसे बयां करना आसान नहीं है। लोगों को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ रहा है। हर जरूरतों में कटौती कर किसी तरह काम चलाने की नीति अपना कर लोग गुजारा करने पर मजबूर हैं। लेकिन, इसकी मीडिया संस्थानों को इसकी भनक नहीं है।
अटल सरकार की पैरोकारी करना अथवा बीजेपी की तरफदारी करना मेरा मकसद नहीं है। बीजेपी से मेरा दूर तक कुछ लेना देना नहीं है। और नही मीडिया को किसी पार्टी विशेष से जोड़ने का आशय है। लेकिन यह सच्चाई है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों की छोटी सी गलतियों को भी तिल का ताड़ बना कर पेश किया जाता है। मानों भाजपा की सरकारें देश की सबसे बड़ी शत्रु हैं। अभी दूर जाने की जरूरत नहीं है भाजपा का कर्नाटक संकट पर जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कवरेज किया उसे पत्रकारिता का उच्च मानदंड तो नहीं कहा जा सकता है। एक चैनल के संवाददाता (जो चैनल में राजनीतिक संपादक के पद पर हैं) जिनकी विशेषता है कि तीन वाक्य को दो शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, ने भाजपा संकट को कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस ने संकट को आंध्र में ही सुलझा लिया लेकिन भाजपा का कर्नाटक संकट दिल्ली तक पहुंचने के बाद भी नहीं सुलझ पा रहा है। अब आप बताएं दोनों पार्टियाँ एक तरह से ही कार्य करने लगें तो क्या होगा। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के निर्णय को बदलने की किसी में हिम्मत नहीं है। मतलब साफ है कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में ही आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। वहां सोनिया-राहुल के निर्णय को कोई चुनौती नहीं दे सकता यदि देता भी है तो उसे निश्चित तौर पर पार्टी से बाहर जाना होगा। वहीं भाजपा में कमोबेश अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। जिसका कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में संवाददाता का नजरिया कहां तक स्वस्थ है। आप किसी भी राजनीतिक पार्टी को दूसरे दल के नजरिये से नहीं देख सकते।
अटल सरकार की कई महत्वपूर्ण और जनकल्याणकारी योजनाओं का मीडिया द्वारा नजरअंदाज किया गया। यही नहीं प्रदेशों में भाजपा की सरकारों द्वारा किए जा रहे तमाम लोक कल्याणकारी कार्यों को महत्व नहीं मिल रहा है। गुजरात को ही लें वहां विकास के ढेरों कार्य कराए जा रहे हैं। लेकिन, उसकी चर्चा नहीं होती है। चर्चा जिस बात की होती है वह मोदी की नकारात्मक छवि की।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री ए राजा की स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के बाद भी मीडिया द्वारा ज्यादा तूल नहीं दिया गया। केंद्र सरकार कितनी चालाकी से मधु कोड़ा का मामला उठा कर अपने मंत्री के स्कैंडल को फिलहाल दबाने में कामयाब हो गई तो इसका श्रेय कांग्रेस परस्त कुछ मीडिया संस्थानों को ही जाता है।
एक उदात्त लोकतंत्र के लिए अदालतों और मीडिया का स्वतंत्र होना संजीवनी जैसा है। दुर्भाग्य से देश में इस समय कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस की केंद्र सरकार की पिछलग्गू मालूम पड़ते हैं। मीडिया संस्थानों को आर्थिक हितों के लिए पत्रकारिता के मानदंडों से समझौता नहीं करना चाहिए तभी भारत का लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सकेगा।
November 3, 2009
यह तो जेब काटने वाला कांग्रेसी हाथ है
डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर दिल्ली सरकार अपनी नाकामयाबी ढक रही है
दिल्ली सरकार ने डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर एक बार फिर आम आदमी की जेब ढीली कर दी है। कांग्रेसी बड़े गर्व से कहते हैं कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। लेकिन यह हाथ जनकल्याण के लिए नहीं लोगों की जेब काटने के लिए लगता है। यह कैसा हाथ है जो मध्यम वर्ग और गरीबों का केवल कान ही ऐंठने का काम करता है। यही नहीं अगले साल से दिल्ली में पेयजल भी महंगा हो जाएगा। दिल्ली मेट्रो ने पहले ही किराया बढ़ाकर जन हितैषी होने का प्रमाण दे दिया है। अब तो मदर डेयरी के दुग्ध के दाम भी बढ़ गए हैं। बिजली भी महंगी हो गई है। ऐसे में आम आदमी अपना सिर पीटने के अलावा और क्या करे। शीला दीक्षित को एक बार फिर से मौका देने वाले दिल्ली वालों को उनकी सरकार का विरोध करने का भी हक नहीं बनता। कांग्रेस के कार्यकाल में चारों तरफ महंगाई ही महंगाई है। हालांकि, भाजपा सहित विरोधी दल महंगाई और बसों के किराया बढ़ाने का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन, एक हताश और थके हुए विपक्ष की बात कितनी सुनी जाएगी यह अंदाजा लगाना कठिन नही है।
किराया बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उनके पास नोट छापने वाली मशीन नहीं है। क्या मुख्यमंत्री सरीखे शख्सियतों से यही उम्मीद की जा सकती है? यह ठीक है कि सरकार की अपनी कुछ परेशानियां होती हैं। लेकिन अपनी नाकामयाबियों को छुपाने के लिए आप गरीबों और आम आदमी का गिरेबां तो नहीं पकड़ लेंगे। हर मर्ज के लिए बली का बकरा जनता को ही तो नहीं बनाया जा सकता।
डीटीसी का घाटा किराया कम होने से नहीं हुआ है। बल्की निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुनियादी ढांचा का सही इस्तेमाल न होना है। डीटीसी में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार चरम पर है। दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्रालय और निगम की अदूरदर्शिता और लापरवाही से डीटीसी का दिवाला निकल गया है। अक्सर डीटीसी की बसें पीक ऑवर में भी डिपो से नहीं निकलती हैं। सुबह और शाम को ही डीटीसी की बसों को चलाया जाए तो कम से इतना घाटा तो नहीं होगा जितना प्रचारित किया जा रहा है। बसें चलती भी हैं तो चालक स्टैंडों पर बसें नहीं रोकते हैं। यदि रोक भी दें सवारियां भरने से पहले ही बसें भगा ले जाते हैं। यही नहीं डीटीसी के चालक बसों को ब्लू लाइन बसों के पीछे ले जाते हैं। ऐसे में सवारियां पहले ब्लू लाइन बसों में ही बैठ जाती हैं। दूसरे डीटीसी की बसों का कोई निर्धारित समय भी नहीं होता है कि लोग प्रतीक्षा कर सकें। पता चला कि आप बस की प्रतीक्षा ही करते रह गए और आपका समय बर्बाद हो गया और बस आई भी नहीं।
यही नहीं डीटीसी बसों के अधिकतर कंडक्टर एकदम से लालची होते हैं। चंद रुपयों के लिए उतरते वक्त सवारियों से टिकट ले लेते हैं और बाद में वही टिकट दूसरे यात्री को देकर पैसा अपने पास रख लेते हैं। अक्सर तो कम दूरी का टिकट भी नहीं देते हैं केवल पैसा ही ले लेते हैं। ऐसे में डीटीसी को घाटा नहीं तो क्या होगा?
डीटीसी के पास प्रशिक्षित चालकों और परिचालकों की भारी कमी है। जो कर्मचारी हैं भी तो दूसरे गैर जरूरी कामों में लगाए गए हैं। कर्मचारियों की कमी से भी बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पाती हैं। जिससे सभी बसों का इस्तेमाल नहीं हो पाता। कुछ देर के लिए डीटीसी का किराया बढ़ाना मजबूरी मान भी लिया जाए तो ब्लू लाइन बसों का किराया बढ़ाने का क्या तुक है। ब्लू लाइन कंडक्टर पहले से ही कम दूरी की निर्धारित किराया से अधिक वसूलते हैं। उनकी तो बैठे-बिठाये मौज हो गई।
दिल्ली सरकार ने डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर एक बार फिर आम आदमी की जेब ढीली कर दी है। कांग्रेसी बड़े गर्व से कहते हैं कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। लेकिन यह हाथ जनकल्याण के लिए नहीं लोगों की जेब काटने के लिए लगता है। यह कैसा हाथ है जो मध्यम वर्ग और गरीबों का केवल कान ही ऐंठने का काम करता है। यही नहीं अगले साल से दिल्ली में पेयजल भी महंगा हो जाएगा। दिल्ली मेट्रो ने पहले ही किराया बढ़ाकर जन हितैषी होने का प्रमाण दे दिया है। अब तो मदर डेयरी के दुग्ध के दाम भी बढ़ गए हैं। बिजली भी महंगी हो गई है। ऐसे में आम आदमी अपना सिर पीटने के अलावा और क्या करे। शीला दीक्षित को एक बार फिर से मौका देने वाले दिल्ली वालों को उनकी सरकार का विरोध करने का भी हक नहीं बनता। कांग्रेस के कार्यकाल में चारों तरफ महंगाई ही महंगाई है। हालांकि, भाजपा सहित विरोधी दल महंगाई और बसों के किराया बढ़ाने का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन, एक हताश और थके हुए विपक्ष की बात कितनी सुनी जाएगी यह अंदाजा लगाना कठिन नही है।
किराया बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उनके पास नोट छापने वाली मशीन नहीं है। क्या मुख्यमंत्री सरीखे शख्सियतों से यही उम्मीद की जा सकती है? यह ठीक है कि सरकार की अपनी कुछ परेशानियां होती हैं। लेकिन अपनी नाकामयाबियों को छुपाने के लिए आप गरीबों और आम आदमी का गिरेबां तो नहीं पकड़ लेंगे। हर मर्ज के लिए बली का बकरा जनता को ही तो नहीं बनाया जा सकता।
डीटीसी का घाटा किराया कम होने से नहीं हुआ है। बल्की निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुनियादी ढांचा का सही इस्तेमाल न होना है। डीटीसी में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार चरम पर है। दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्रालय और निगम की अदूरदर्शिता और लापरवाही से डीटीसी का दिवाला निकल गया है। अक्सर डीटीसी की बसें पीक ऑवर में भी डिपो से नहीं निकलती हैं। सुबह और शाम को ही डीटीसी की बसों को चलाया जाए तो कम से इतना घाटा तो नहीं होगा जितना प्रचारित किया जा रहा है। बसें चलती भी हैं तो चालक स्टैंडों पर बसें नहीं रोकते हैं। यदि रोक भी दें सवारियां भरने से पहले ही बसें भगा ले जाते हैं। यही नहीं डीटीसी के चालक बसों को ब्लू लाइन बसों के पीछे ले जाते हैं। ऐसे में सवारियां पहले ब्लू लाइन बसों में ही बैठ जाती हैं। दूसरे डीटीसी की बसों का कोई निर्धारित समय भी नहीं होता है कि लोग प्रतीक्षा कर सकें। पता चला कि आप बस की प्रतीक्षा ही करते रह गए और आपका समय बर्बाद हो गया और बस आई भी नहीं।
यही नहीं डीटीसी बसों के अधिकतर कंडक्टर एकदम से लालची होते हैं। चंद रुपयों के लिए उतरते वक्त सवारियों से टिकट ले लेते हैं और बाद में वही टिकट दूसरे यात्री को देकर पैसा अपने पास रख लेते हैं। अक्सर तो कम दूरी का टिकट भी नहीं देते हैं केवल पैसा ही ले लेते हैं। ऐसे में डीटीसी को घाटा नहीं तो क्या होगा?
डीटीसी के पास प्रशिक्षित चालकों और परिचालकों की भारी कमी है। जो कर्मचारी हैं भी तो दूसरे गैर जरूरी कामों में लगाए गए हैं। कर्मचारियों की कमी से भी बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पाती हैं। जिससे सभी बसों का इस्तेमाल नहीं हो पाता। कुछ देर के लिए डीटीसी का किराया बढ़ाना मजबूरी मान भी लिया जाए तो ब्लू लाइन बसों का किराया बढ़ाने का क्या तुक है। ब्लू लाइन कंडक्टर पहले से ही कम दूरी की निर्धारित किराया से अधिक वसूलते हैं। उनकी तो बैठे-बिठाये मौज हो गई।
October 25, 2009
यह कांग्रेस की जीत तो कतई नहीं है
विकल्पहीनता की स्थिति में जनता ने कांग्रेस को वोट दिया
तीन राज्यों की विधानसभा चुनाव में मिली जीत का श्रेय कांग्रेसियों और कुछ कांग्रेसप्रस्त मीडिया संस्थानों ने सोनिया और राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन को दिया है। जबकि, कुछ कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कुशल नीतियों को भी जीत का एक बड़ा कारण मानते हैं। वैसे, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत को एकदम से स्वीकार कर लेना पक्षपात होगा, क्योंकि, इन राज्यों में विपक्ष एकदम से दीशाहीनता और किंकर्तव्यबिमूढ़ता की स्थिति में रहा है। विपक्ष के पास जनता के भरोसे लायक कोई मुद्दा ही नहीं था। प्रचार अभियान के दौरान पार्टियों में आक्रामकता था ही नहीं। सभी दल थके और अवसादग्रस्त नजर आ रहे थे।
22 अक्टूबर को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे आ रहे थे वैसे-वैसे टीवी चैनलों के रिपोर्टर और चुनाव विश्लेषक अपने तरीके से जनता की भावनाओं का ब्याख्या कर रहे थे। कोई इसे कांग्रेस की नीतियों और स्थानीय कांग्रेसी सरकारों की जनकल्याणकारी कार्यों की जीत बता रहा था तो कोई देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के खात्मे की भविष्यवाणी कर रहा था। सबकी अपनी डफली अपना राग। मतलब सच्चाई से कोसों दूर।
तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों को देखा जाए तो निर्विवाद रूप से जनता ने कांग्रेस को विकल्पहीनता की अवस्था में ही वोट दिया है। जनता विपक्षी पार्टियों को भरोसे के लायक या कह कहना ज्यादा समीचीन जान पड़ता है कि जनता किसी भी विरोधी पार्टी को पांच साल तक सरकार चलाने लायक ही नहीं समझा। लोगों ने न तो सोनिया या राहुल की बातों को सुनकर वोट दिया और न ही प्रधानमंत्री के तथाकथित कुशल नेतृत्व को, बल्कि, जनता ने यह सोचकर कांग्रेस को वोट दिया कि अगले पांच सालों तक केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार रहेगी ऐसे में प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बनने पर प्रदेशवासियों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ जरूर मिलेगा।
इससे स्पष्ट होता है कि जनता अभी भी राहुल सोनिया को अपना नेता नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से महाराष्ट्र और हरियाणा में भी कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला होता। मतदाताओं ने कांग्रेसी नारा आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ की हवा निकाल दी। हालांकि, अरूणांचल प्रदेश में कांग्रेस को जनता ने जरूर हाथों-हाथ लिया है। इसका कारण मात्र विपक्ष की अनुपस्थिति ही थी। वहां पर टीमएसी और एनसीपी को तो कांग्रेस का पार्टनर ही माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों पाटिüयां केंद्र सरकार में साझीदार हैं। रही बात भाजपा की तो वहां पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। कुछ सीटें भाजपा को मिलना महज संयोग ही कहा जाएगा।
महाराष्ट्र और हरियाणा में अपने कार्यकाल में कांग्रेस की सरकारों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं तो उत्तरभारतियों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। पेयजल और बरसात में जलनिकासी की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई है। शहरी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो ग्रामीण इलाकों में लोगों की परेशानियां बढ़ी हैं। वहीं, हरियाणा में बिजली कटौती और पेयजल की किल्लत से लोगों का बुरा हाल है। हालात तो यह है कि प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था एकदम से चरमरा गई है। अर्थव्यवस्था का आधार कृषि के लिए राज्य सरकार ने कोई अलग से नीति घोषित नहीं की है। अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। यह अलग बात है कि भूपेंद्र ¨सह हुड्डा 40 साल में जैसा विकास नहीं हुआ वैसा विकास करने का दावा कर रहे हैं। जनता ने उनके इस दावे को पूरी तरह से नकार दी है।
दरअसल, इन प्रदेशों में विरोधी पार्टियाँ अपना प्रभाव जनता पर नहीं छोड़ पाईं हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष जनता में यह भरोसा ही पैदा नहीं कर पाया कि वह कांग्रेस से ज्यादे टिकाऊ और कल्याणकारी सरकार दे सकता है। विरोधी पार्टियाँ अपनों से ही निपटने की रणनीति बनाती रह गईं। संबंधित राज्य सरकारों की खामियों को जनता के सामने उम्दा तरीके से विपक्ष पेश नहीं कर सका। महाराष्ट्र में शिवसेना राजठाकरे से बाहर निकल ही नहीं पाई तो भाजपा उद्धव राज के झगड़े को ही देखती ही रह गई। भाजपा विपक्ष का तेवर दिखा पाने में नाकाम रही। सरकार की तमाम गलतियों को जोरदार तरीके से भाजपा गठबंधन उठा पाने में असफल रहा। हरियाणा में अंत तक भाजपा गठबंधन को लेकर ही द्वंद्व में रही। यदि वहां चौटाला या भजनलाल की पार्टी से गठबंधन किया गया होता तो निश्चित तौर पर यह गठबंधन कामयाब रहता।
बहरहाल, जिस तरह से देश में कांग्रेस को सर्वमान्य पार्टी और सोनिया-राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता बनाने की कुछ मीडिया घरानों द्वारा माहौल तैयार किया जा रहा है। वह लोकतंत्र के लिए खतरनारक है। एक परिपक्व और स्थाई लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना बेहद जरूरी है। विपक्ष सरकार की गलत नीतियों को उठाकर जन कल्याण के लिए योजनाएं बनाने के लिए सरकार को बाध्य कर सकता है। लेकिन, दुर्भाग्य से इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी अंतर्कलह से गुजर रही है। देश की जनता भाजपा से यह उम्मीद करती है कि वह एक दमदार और आक्रामक विपक्ष के रूप में फिर से खड़ा हो।
तीन राज्यों की विधानसभा चुनाव में मिली जीत का श्रेय कांग्रेसियों और कुछ कांग्रेसप्रस्त मीडिया संस्थानों ने सोनिया और राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन को दिया है। जबकि, कुछ कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कुशल नीतियों को भी जीत का एक बड़ा कारण मानते हैं। वैसे, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत को एकदम से स्वीकार कर लेना पक्षपात होगा, क्योंकि, इन राज्यों में विपक्ष एकदम से दीशाहीनता और किंकर्तव्यबिमूढ़ता की स्थिति में रहा है। विपक्ष के पास जनता के भरोसे लायक कोई मुद्दा ही नहीं था। प्रचार अभियान के दौरान पार्टियों में आक्रामकता था ही नहीं। सभी दल थके और अवसादग्रस्त नजर आ रहे थे।
22 अक्टूबर को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे आ रहे थे वैसे-वैसे टीवी चैनलों के रिपोर्टर और चुनाव विश्लेषक अपने तरीके से जनता की भावनाओं का ब्याख्या कर रहे थे। कोई इसे कांग्रेस की नीतियों और स्थानीय कांग्रेसी सरकारों की जनकल्याणकारी कार्यों की जीत बता रहा था तो कोई देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के खात्मे की भविष्यवाणी कर रहा था। सबकी अपनी डफली अपना राग। मतलब सच्चाई से कोसों दूर।
तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों को देखा जाए तो निर्विवाद रूप से जनता ने कांग्रेस को विकल्पहीनता की अवस्था में ही वोट दिया है। जनता विपक्षी पार्टियों को भरोसे के लायक या कह कहना ज्यादा समीचीन जान पड़ता है कि जनता किसी भी विरोधी पार्टी को पांच साल तक सरकार चलाने लायक ही नहीं समझा। लोगों ने न तो सोनिया या राहुल की बातों को सुनकर वोट दिया और न ही प्रधानमंत्री के तथाकथित कुशल नेतृत्व को, बल्कि, जनता ने यह सोचकर कांग्रेस को वोट दिया कि अगले पांच सालों तक केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार रहेगी ऐसे में प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बनने पर प्रदेशवासियों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ जरूर मिलेगा।
इससे स्पष्ट होता है कि जनता अभी भी राहुल सोनिया को अपना नेता नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से महाराष्ट्र और हरियाणा में भी कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला होता। मतदाताओं ने कांग्रेसी नारा आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ की हवा निकाल दी। हालांकि, अरूणांचल प्रदेश में कांग्रेस को जनता ने जरूर हाथों-हाथ लिया है। इसका कारण मात्र विपक्ष की अनुपस्थिति ही थी। वहां पर टीमएसी और एनसीपी को तो कांग्रेस का पार्टनर ही माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों पाटिüयां केंद्र सरकार में साझीदार हैं। रही बात भाजपा की तो वहां पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। कुछ सीटें भाजपा को मिलना महज संयोग ही कहा जाएगा।
महाराष्ट्र और हरियाणा में अपने कार्यकाल में कांग्रेस की सरकारों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं तो उत्तरभारतियों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। पेयजल और बरसात में जलनिकासी की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई है। शहरी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो ग्रामीण इलाकों में लोगों की परेशानियां बढ़ी हैं। वहीं, हरियाणा में बिजली कटौती और पेयजल की किल्लत से लोगों का बुरा हाल है। हालात तो यह है कि प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था एकदम से चरमरा गई है। अर्थव्यवस्था का आधार कृषि के लिए राज्य सरकार ने कोई अलग से नीति घोषित नहीं की है। अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। यह अलग बात है कि भूपेंद्र ¨सह हुड्डा 40 साल में जैसा विकास नहीं हुआ वैसा विकास करने का दावा कर रहे हैं। जनता ने उनके इस दावे को पूरी तरह से नकार दी है।
दरअसल, इन प्रदेशों में विरोधी पार्टियाँ अपना प्रभाव जनता पर नहीं छोड़ पाईं हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष जनता में यह भरोसा ही पैदा नहीं कर पाया कि वह कांग्रेस से ज्यादे टिकाऊ और कल्याणकारी सरकार दे सकता है। विरोधी पार्टियाँ अपनों से ही निपटने की रणनीति बनाती रह गईं। संबंधित राज्य सरकारों की खामियों को जनता के सामने उम्दा तरीके से विपक्ष पेश नहीं कर सका। महाराष्ट्र में शिवसेना राजठाकरे से बाहर निकल ही नहीं पाई तो भाजपा उद्धव राज के झगड़े को ही देखती ही रह गई। भाजपा विपक्ष का तेवर दिखा पाने में नाकाम रही। सरकार की तमाम गलतियों को जोरदार तरीके से भाजपा गठबंधन उठा पाने में असफल रहा। हरियाणा में अंत तक भाजपा गठबंधन को लेकर ही द्वंद्व में रही। यदि वहां चौटाला या भजनलाल की पार्टी से गठबंधन किया गया होता तो निश्चित तौर पर यह गठबंधन कामयाब रहता।
बहरहाल, जिस तरह से देश में कांग्रेस को सर्वमान्य पार्टी और सोनिया-राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता बनाने की कुछ मीडिया घरानों द्वारा माहौल तैयार किया जा रहा है। वह लोकतंत्र के लिए खतरनारक है। एक परिपक्व और स्थाई लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना बेहद जरूरी है। विपक्ष सरकार की गलत नीतियों को उठाकर जन कल्याण के लिए योजनाएं बनाने के लिए सरकार को बाध्य कर सकता है। लेकिन, दुर्भाग्य से इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी अंतर्कलह से गुजर रही है। देश की जनता भाजपा से यह उम्मीद करती है कि वह एक दमदार और आक्रामक विपक्ष के रूप में फिर से खड़ा हो।
October 14, 2009
चीन को उसी के लहजे में जवाब देना होगा
ड्रैगन को ललकारे भारत
लगता है अब चीन भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य महत्वपूर्ण शख्सियतों का दौरा निर्धारित करेगा कि उन्हें अपने देश में कहां भ्रमण करना चाहिए और कहां नहीं। चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री द्वारा अरुणांचल प्रदेश का दौरा करने पर चीन ने जिस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त किया है वह संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के अखंडता पर सीधा चोट है। भारत को केवल गहरी नाराजगी जता कर ही संतोष नहीं कर लेना चाहिए। भारत जब तक कठोरता से और दोटूक जवाब नहीं देगा तब तक चीन इस तरह की ओछी हरकतें करता रहेगा। हालांकि, चीन के राजदूत को तलब किया गया है जो केवल रश्म अदायगी भर ही लगता है।
चीन की दुस्साहस अब हद से आगे बढ़ने लगी है। यदि भारत इसी तरह से रश्म अदायगी के लिए क्वगहरी नाराजगी जताता रहा तो चीन कल को उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत को विवादित जोन बताते हुए उस पर अपना हक जताने लगेगा। भारत का शीर्ष नेतृत्व सिर्फ नाराजगी जता कर ही रह जाएगा।
इस मामले में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का यह कहना कि चीन इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है, महज अपनी कमजोरी या दब्बूपन दिखाना है। चीन द्वारा कब्जा की गई जमीन को जब तक लेने के लिए कूटनीतिक प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक ऐसी हरकतें पड़ोसी देश करता रहेगा। अरुणांचल प्रदेश भारत का है उसके लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। वैसे भी अरुणांचल को हमारे प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में सूर्य का देश माना गया है। ऐसे में कोई कैसे कह देगा वह भारत का नहीं विवादित क्षेत्र है।
दरअसल, कुछ विदेशी ताकतों का यह षड्यंत्र है कि भारत को चौतरफा उलझा कर रखा जाए। यही वजह है कि नेपाल में भी माओवादियों की नेतृत्व वाली सरकार भारत को आंख तरेर रही थी। यदि भारत अपने पर आ जाए तो नेपाल का दाना-पानी भी बंद हो जाएगा। हालांकि, देश का नेतृत्व इस बात को समझता तो है लेकिन गंभीरता दिखाने में कोताही बरतता है। इससे काम नहीं चलने वाला है।
दूसरी तरफ चीन भारत पर टिप्पणी कर पूरे एशिया का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि, रूस को छोड़ दिया (रूस यूरेशिया के अंतर्गत आता है) जाए तो केवल भारत ही चीन को जवाब दे सकने की स्थिति में है। ऐसे में चीन के लिए यह जरूरी है कि भारत को फुफकारता रहे। यदि भारत सख्ती से ड्रैगन को ललकारे तो वह अपनी मांद में ही रहने को बाध्य हो जाएगा। चीन को अभी भी मुगालता है कि भारत की सैन्य क्षमता कम है। बेशक, चीन से ज्यादा नहीं तो किसी भी मामले में
(कुछ अपवाद को छोड़कर) भारतीय रक्षा प्रणाली कमतर नहीं है। आज भारत हर मामले में चीन के बराबरी पर है। आईटी सेक्टर में तो भारत चीन से कई गुना आगे है। और यही बात चीन को चुभती है। इसी लिए वह पाकिस्तान और भारत विरोधी तत्वों को आगे कर परोक्ष वार कर रहा है।
वैसे जिस तरह से सभी पार्टियाँ चीन की रवैये पर आक्रोश व्यक्त कर रही हैं। वह सुखद लगता है। केवल वाम दलों को लगता है कि अमेरिका भारत को चीन से लड़वाना चाहता है। यह उनकी चीन भक्ति का सबूत ही है। भारत में रह कर चीन की तरफदारी करने वाले वामपंथियों को अब सबक सिखाने का वक्त आ गया है। दरअसल, वामदलों को कभी भारतीयता पर विश्वास ही नहीं रहा, जनता इस बात को जितना जल्द समझ ले उतना ही देश के लिए अच्छा होगा।
दूसरी तरफ अब समय आ गया है कि भारत अपने विदेश नीति को दमदार और धारदार बनाए ताकि कोई अन्य देश आंख तरेरने की हिमाकत न कर पाए। लचीलेपन और दब्बूपन के चलते कभी-कभी कभार बांग्लादेश भी भारत को आंख दिखाने से बाज नहीं आ रहा है।
भारत को अपना पक्ष विश्व समुदाय के समक्ष काफी मजबूती से रखना होगा और यह बताना पड़ेगा कि भारत केवल शांति का ही पुजारी नहीं है वह गीता में भगवान कृष्ण के उस उपदेश का भी पालन करता है जिसमें उन्होंने कहा है कि, अर्जुन! यदि आप पर या आपके परिवार पर कोई आक्रमण करता है तो उसका जवाब देना धर्म के अनुकूल है।
भारत ने अब बहुत सहन कर लिया अब अधिक चुप रहना कमजोरी दर्शाना होगा। वैसे भी चीन क्या दुनिया का कोई भी देश भारत पर आक्रमण करने की मुर्खता नहीं करेगा। क्योंकि भारत के पास अब आत्मरक्षा करने और मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पर्याप्त क्षमता है। आवश्यकता है तो सिर्फ हमारे कमजोर नेतृत्व को आक्रामक और मजबूत होने का, और इसे हर देशवासी सिद्दत से इंतजार कर रहा है........
October 4, 2009
उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की....
उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की। हालांकि, वह शादीशुदा हैं और पिता भी बन चुके हैं, लेकिन अभी भी उनकी प्रेम पिपासा शांत नहीं हुई है, अलबत्ता दिन प्रति बढ़ती ही जा रही है। हर मामले में उनका अपना नजरिया है। इस मामले में भी वह अपने को सही ठहराते हैं। फिलवक्त वह मीडिया के क्षेत्र में अच्छी तरह से स्थापित हो चुके हैं।
वह मेरे आदरणीय मित्र और संबंधी हैं। मैं अबतक के कैरियर में जिन लोगों का सम्मान करता हूं वह उन सब में सबसे ऊपर हैं। उनके विजन पर ही मैं दो साल पहले दिल्ली आया था। फिलहाल, आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा हूं और मुझे विश्वास है कि मेरी कामयाबी में उनका बहुत बड़ा योगदान होगा।
उनकी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आप को कभी ना नहीं करेंगे। यही नहीं वह मौके पर आपको अपनी बातों से खुश कर देंगे बाद में आप भले ही उनकी बातों से सहमत न हों। वह ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे आप नाराजं हो सकते हैं, खुश हो सकते हैं लेकिन कभी उदासीन नहीं हो सकते। उनको झूठ बोलने से परहेज तो नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं कि किसी का कोई नुकसान हो जाए।
उनकी पत्नी सुशिक्षित और संस्कारों वाली हैं। वह मुझे हमेशा परिवार को साथ लेकर चलने का सुझाव देती हैं उनका कहना है कि आदमी पूरे परिवार के आशीर्वाद से ही आगे बढ़ सकता है।
अब हम आते हैं असल मुद्दे पर पिछले दिन मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे कहा कि एक अदद प्रेमिका की उनकी तलाश पूरी नहीं हुई है। मैने जब कहा कि शादी के बाद प्रेम-ब्रेम या प्रेमिका के चक्कर में पड़ना ठीक नहीं है। तब उनका कहना था कि विश्व में जितने भी महान लोग हुए हैं उनके पीछे प्रेमिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसे में प्रेमिकाओं और प्रेम का होना कैरियर के लिहाज से बेहद जरूरी है। मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में बहुत ज्यादा दम है। यह भी संभव है कि बहुत सारे लोग उनसे सहमत हों।
अब ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्हें किस तरह का प्रेम चाहिए। कॉलेज या स्कूलों में पढ़ने वाले टीनएजेर्स का या चीनी कम वाले नायकं का। यह तो वही बताएंगे। लेकिन, मुझे नहीं लगता है कि उन्हें चीनी कम वाले नायक सा प्रेम और प्रेमिका चाहिए। आपको क्या लगता है जरूर बताएं.......।
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