दूर होती आम आदमी से शिक्षा
आखिरकार दिल्ली सरकार ने पब्लिक स्कूलों को फीस बढ़ाने की अनुमति दे ही दी। पहले से ही फीस की भार से बेजार अभिभावक अब दोहरी मार झेलने को विवश हो जाएंगे। बढ़ी फीस भरने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं बचा है। अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत सितंबर 2008 से बढ़ी फीस देने को लेकर है। उच्च आमदनी वालों के लिए तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन आम आदमी के लिए यह बहुत बड़ी बात है सरकार की घोषणा के मुताबिक पब्लिक स्कूल अपने स्टैंडर्ड के अनुसार सौ रुपये से लेकर पाँच सौ रुपये तक वसूलेंगे। क्योंकि स्कूलों को छठे वेतन आयोग के अनुसार अपने शिक्षकों को एरियर का भुगतान करना है।
सबको शिक्षा उपलब्ध कराने की केंद्र सरकार की घोषणा के बावजूद दिन प्रति दिन महंगी हो रही शिक्षा आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। एक आम आदमी अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में शिक्षा दिलाने का सपना देखने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अव्वल तो उसकी माली हालत उतनी नहीं होगी कि वह फीस वहन कर सके। यदि वह फीस वहन करने की हिम्मत भी कर ले तो बड़े स्कूल उनके बच्चों को एडमीशन नहीं देंगे। दिल्ली में ऐसा ही एक वाकया हालही में प्रकाश में आया है। एक बच्ची को एक नामी स्कूल में इस लिए प्रवेश नहीं दिया गया, क्योंकि उसका पिता फोर्थ ग्रेड का कर्मचारी था। हालांकि, दिल्ली शिक्षा निदेशालय मामले की जांच कर रहा है। यह इकलौता मामला नहीं है ऐसे कई मामले हैं जो प्रकाश में नहीं आते। मजबूरन लोगों को अपने बच्चों को निम्न दर्जे के स्कूल में अथवा एमसीडी के स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है।
यह हालात केवल दिल्ली का ही नहीं है। देश के छोटे-बड़े सभी कस्बों और शहरों का है। जहां अभिभावकों के सामने फीस एक यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है। लोग अपनी कमाई का एक भारी हिस्सा बच्चों की फीस और मकान का किराया देने में ही व्यय कर देते हैं। इन स्कूलों में केवल फीस ही नहीं ली जाती है। विभिन्न तरह के कार्यक्रम आयोजित कराने के लिए भी शुल्क लिए जाते हैं। इसके अलावा यहां प्रोजेक्ट वर्क, ड्रेस, पिकनिक आदि के लिए भी शुल्क लिए जाते हैं। बच्चों के प्राइवेट टूशन और किताब-कापियों पर भी भारी खर्च आता है। अभिभावक अपने बच्चों को कटौती करने के लिए मना भी नहीं कर सकते। इन हालातों में आम लोग अपने होनहार बच्चों को भी साधारण स्कूलों में भेज देते हैं। जहां उनकी प्रतिभा खुलकर सामने नहीं आती।
वैसे यह भी सही है कि बड़े स्कूलों में भले ही फीस आम आदमी की पहुंच से दूर हो, लेकिन वहां उचित शैक्षिक वातावरण मुहय्यया तो कराया ही जाता है।
ऐसे में सरकार को भी चाहिए कि वह अपने स्कूलों का वातावरण सुधारे ताकि आम आदमी का बच्चा भी बड़े स्कूलों सा वातावरण पा सके।
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विचारणीय आलेख.
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