जिस्म फरोसी के विरुद्ध सख्त कानून की जरूरत
लड़कियों को आजादी दायरा, नैतिकता और अनुशासन के साथ दी जानी चाहिए
अपने देश में आस्था या धर्म के नाम पर किसी को बेवकूफ बनाना आसान है। अच्छी और लच्छीदार बातों से लोगों का विश्वास जीत कर उन्हें चूना लगाना मुश्किल नहीं है। देश में धर्म के आड़ में सरेआम अवैध धंधे चल रहे हैं। असल में कुकुरमुत्ते की तरह देश में बढ़ते कथित धर्माचार्य, सन्त और बाबा सफेदपोसों और हुक्मरानों की काली करतूतों को धवल वस्त्र प्रदान कर रहे हैं। ये बाबा जनता और अपने भक्तों की दक्षिणा से खुद तो ऐश ओ आराम की जिन्दगी व्यतीत करते हीं है अपने चेलों के लिए विलासितापूर्ण पल उपलब्ध कराने का जरीया भी बनते हैं।
दिल्ली में गिरफ्तार सेक्स रैकेट का सरगना शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ ईच्छाधारी सन्त स्वामी भीमानन्द अकेला ही श्वेत या भगवा वस्त्रधारी बाबा नहीं है। इसके जैसे अभी तमाम दबे पड़े हैं। जिनको पुलिस जानती है लेकिन उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकती। क्योंकि पुलिस को भी डर है कि उन बाबाओं के चेले उनके डिपार्टमेंट और राजनीति में भी हैं। उसकी डायरी से २५ हजार करोर की लेनदेन का मामला भी प्रकाश में आया है।
दरअसल, ये कथित बाबा या सन्त उतने दोषी नहीं हैं जितने हम और आप हैं। जब भी कोई आदर्श की बातें करने लगता है तो हम भारतीय उसे महान मानने लगते हैं। लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह आदर्शवादी कहां से आ गया। इसका अतीत क्या है? यह और क्या गुल खिला रहा है। इन सब बातों को जानने की हमारे पास फुर्सत ही कहां है? हमें तो बस जल्दी है। और यही जल्दी हमारी दुखती नस है। जिसे राजीव रंजन द्विवेदी जैसे आस्था के भेçड़ये निगलने में देर नहीं लगाते। जब इनकी पोल खुलती है तो उस समय हम हार गए जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी हारी हुई कमाई को कसमकसाते और छटपटाते हुए केवल देखता भर है कुछ कर सकने की उसमें नैतिक बल और जोश नहीं होता।
सेक्स सरगना शिवमूर्ति के गिरफ्तारी के दौरान टीवी पर दिखाए जा रहे उन दृश्यों को जरा स्मरण करिए वह कैसे लोगों को आशीर्वाद दे रहा था और आशीर्वाद लेने वाले किस तरह से निहाल हो रहे थे। उसके शरण में जाने वाले कोई एकदम से निपट निरक्षर या गांव के भोलेभाले लोग नहीं हैं। दिल्ली जैसे मेट्रो पोलिटन सिटी में रहने वाले जागरूक लोग हैं। लेकिन, कोई यह जानना जरूरी नहीं समझा कि यह बाबा कहां से अवतरित हो गए।
शिवमूर्त द्विवेदी उर्फ इच्छामूर्ति दिल्ली में ही गार्ड की नौकरी करता था। वह नोएडा पुलिस के हत्थे भी चढ़ चुका है। वह दिनदहाड़े लूट की वारदात को अंजाम दे चुका है। जिस्म्फरोसी के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है। फिर भी लोगों का वह बाबा बन गया। उसके कदमों में धन की बरसात होने लगी। वह मन्दिर और अस्पताल तक बनवा डाला।
दूसरी तरफ, उसके साथ गिरफ्तार लड़कियां भी हाईप्रोफाइल मां-बाप की हाईप्रोफाइल बेटियां हैं। जिनकी जेब खर्चे इतने अधिक हो चुके हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए अपना शरीर बेचने में तनिक भी गुरेज नहीं है। छह में चार से लड़कियां एयर होस्टेस हैं जिनमें से एक एमबीए की छात्रा भी है। यह हमारे बदलते भारत और विकसित भारत की बदलती तस्वीर है जो स्त्री स्वतन्त्रता का हिमायती है। लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए, लेकिन दायरा, नैतिकता और अनुशासन का कड़ा पहरा भी होना चाहिए। यह देखा भी जाना चाहिए कि इस स्वतन्त्रता का बेजा इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। जो लड़कियां पकड़ी गईं हैं केवल वही दोषी नहीं हैं। उनके माता-पिता भी दोषी हैं। जिन्हें न तो अपने बच्चों को देने के लिए संस्कार है और न ही उनकी कार्य गुजारियों का समीक्षा करने के लिए समय। ऐसे में बच्चे तो ऐसे रैकेटों में फंसेंगे ही। क्योंकि, पकड़ी गई सभी लड़कियां अमीर घरों और बड़े कालेजों में पढ़ने वाली हैं। इस शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी के रैकेट में अभी पुलिस पर भरोसा करें तो कम से कम चार सौ से अधिक लड़कियां हैं। इसका नेटवर्क देश के कई बड़े शहरों में फैला हुआ है। जो अपने भक्तों के सुविधा के अनुसार सम्बंधित शहरों में ही लड़कियों को उपलब्ध कराता है।
जिस्म फरोसी के विरुद्ध सख्त और गैर जमानती कानून बनाना होगा. मौजूदा कानून बहुत लचीला. इस तरह के एक मामले में सेक्स रैकेट चलाने वाली सोनू पंजाबन छूट चुकी है. शिवेंद्र भी छूट जायेगा.
सवाल यह नहीं है कि राजीव रंजन कितना दोषी है। सवाल यह है कि हम और आप कितने दोषी हैं जो ऐसे लोगों को पनपने देने का मौका देते हैं। ऐसे लोगों पर सरकार भी क्या नियन्त्रण लगाएगी जब जनता खुद ही लूटने के लिए इनके पास जाती है।
March 3, 2010
February 17, 2010
इन सिरफिरे माओवादियों को बेरहमी से कुचलना होगा
ये सभ्य समाज में रहने लायक नहीं हैं
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा में 14 ईस्टर्न फ्रंटियर रायफल्स के बेस कैंप पर माओवादियों ने हमला कर अपने रक्तपिपासु और बर्बर जमीर को ही साबित किया है। जिस तरह से इन वामपन्थी आतंकवादियों ने 24 जवानों को मार डाला और इनमें नौ को ज़िन्दा जला डाला इससे तो यही प्रमाणित होता है कि ये निश्चित तौर पर मानसिक और भावनात्मक रूप से पागल हो चुके हैं। आखिर शहीद हुए इन 24 जवानों ने इनका क्या बिगाड़ा था? ये जवान तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे। इनका न तो किसी से दोस्ती थी और न ही दुश्मनी। दूसरी तरफ, इन जवानों की शहादत के लिए सीधे केन्द्र सरकार की ढुलमुल नीतियां ही जिम्मेदार हैं। केन्द्र सरकार अपने नफे-नुकसान को सामने रख कर इनके विरुद्ध कार्रवाई करना चाह रही है। कब तक इन इंसानी भेरियों के भेंट चढ़ते रहेंगे हमारे जवान। इन पागलों के खिलाफ अब सख्त से सख्त कार्रवाई करना ही एकमात्र विकल्प है।
सोमवार को शाम 5.30 बजे अर्धसैनिक बलों के कैंप पर कायरों की तरह जवानों पर हमला करने वाले ये कथित माओवादी या नक्सली किसी भी तरह से क्षमा या सहानुभूति के पात्र नहीं है। जो लोग इनसे सहानुभूति रखते हैं उन्हें न तो सभ्य समाज से मतलब है और न ही लोकतान्त्रिक मूल्यों में तनिक भी विश्वास है। उधर, माओवादी किशन ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा है कि यह चिदंबरम के ऑपरेशन ग्रीन हंट का जवाब है। किशन का जवाब कितना हास्यास्पद और बचकाना है। गृहमन्त्री चिदंबरम कोई अपना व्यक्तिगत मिशन नहीं चला रहे हैं। यह तो केन्द्र सरकार की कार्रवाई है। जो देश में आतंक फैलाने वाले किसी के भी विरुद्ध कार्रवाई कर देशवासियों को सुरक्षा का वातावरण मुहैया कराने के लिए जिम्मेदार है। ये माओवादी इससे पहले भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों और पुलिस वालों की जान ले चुके हैं। सोमवार का हमला अक्षम्य है। क्योंकि ये जवान भी तो किसी के बेटे, भाई, पिता और पति हैं। क्या इन शहीद हुए जवानों के परिजन कभी इन्हें माफ कर सकते हैं। शायद कभी नहीं।
कहने को तो ये माओवादी भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन, इन्हें किसी व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। जिन क्षेत्रों में ये सक्रिय हैं वहां के लोगों को आतंक के बल पर अपना समर्थक बनाए हुए हैं। लोगों से जबरदस्ती लेवी के रूप में धन की उगाही किस बात का संकेत है। लोगों पर अपना कथित कानून थोपना तालिबानी मानसिकता का ही तो द्योतक है।
दरअसल, माओवाद या नक्सलवाद के ये कथित लंबरदार मूल उद्देश्यों से भटके हुए हैं। जिनका उद्देश्य महज धन उगाही, मारकाट और अपना काला कानून गरीबों पर थोपना भर है। नही तो नक्सली आन्दोलन आज अपने अंजाम को प्राप्त कर लिया होता है। क्योंकि, भू आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ नक्सली आन्दोलन इस तरह रक्तपिपासु आन्दोलन में तब्दील नही हो सकता था। कई वामपन्थी पार्टियों ने इस तरह के खून खराबे को बर्बर और घृणित बताया है।
राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और पुलिस से हथियार छिनने के पीछे इनका मकसद अपनी समानान्तर सत्ता कायम करना है। दरअसल, ये सिरफिरे वामपन्थी आतंकवादी इन गतिविधियों को करके जनता में अपना खौफ पैदा करते हैं। ताकि, लोग इनका विरोध न कर सकें। हालांकि, लोगों में अपनी इमेज बनाने और सहानुभूति हासिल करने के लिए बिहार के जहांनाबाद आदि क्षेत्रों में माओवादियों ने सड़क बनवाया है। तो बड़ी संख्या में रेलवे ट्रैक, पुल और सड़क तथा मोबाइल टावरों को ध्वस्त कर दिया है। इससे परेशानी तो आम जनता को ही होती है। सरकार इन बुनियादी सुविधाओं को जनता के पैसों से ही तो मुहैया कराती है।
वैसे, ये कथित माओवादी नेपाल की तरह यहां भी अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन, यह भूल जाते हैं कि भारत में लाल गलियारा का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। नेपाल से कन्याकुमारी तक के लाल गलियारा की सोच कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी। क्योंकि, भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियां नेपाल से भिन्न हैं। रही बात नेपाल की तो वहां राजा ज्ञानेन्द्र अपनी करनी से ही पदच्युत हुए हैं। यदि पूर्व राजा विरेन्द्र विक्रम रहे होते तो माओवादी नेपाल में भी कभी सिर नहीं उठा पाते। फिलहाल, नेपाल के माओवादी जिस तरह सत्ता में वापसी के लिए बौखला रहे हैं उसी तरह भारत में भी कुछ कुंठित माओवादी सत्ता सुख भोगना चाहते हैं।
अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक पाटिüयां क्षेत्रीय आकांक्षाओं से ऊपर उठ कर इन रक्तपिपासु, सिरफिरे और कुंठित कथित माओवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में केन्द्र सरकार का सहयोग करें। दूसरी तरफ, केन्द्र सरकार को संविधान में यह अधिकार प्राप्त है कि देश की अखण्डता और देशवासियों को भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के लिए कोई भी कदम उठाए। माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार को अब राज्य सरकारों का भरोसा छोड़ना होगा। क्योंकि, अब पानी सिर से ऊपर उठ चुका है।
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा में 14 ईस्टर्न फ्रंटियर रायफल्स के बेस कैंप पर माओवादियों ने हमला कर अपने रक्तपिपासु और बर्बर जमीर को ही साबित किया है। जिस तरह से इन वामपन्थी आतंकवादियों ने 24 जवानों को मार डाला और इनमें नौ को ज़िन्दा जला डाला इससे तो यही प्रमाणित होता है कि ये निश्चित तौर पर मानसिक और भावनात्मक रूप से पागल हो चुके हैं। आखिर शहीद हुए इन 24 जवानों ने इनका क्या बिगाड़ा था? ये जवान तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे। इनका न तो किसी से दोस्ती थी और न ही दुश्मनी। दूसरी तरफ, इन जवानों की शहादत के लिए सीधे केन्द्र सरकार की ढुलमुल नीतियां ही जिम्मेदार हैं। केन्द्र सरकार अपने नफे-नुकसान को सामने रख कर इनके विरुद्ध कार्रवाई करना चाह रही है। कब तक इन इंसानी भेरियों के भेंट चढ़ते रहेंगे हमारे जवान। इन पागलों के खिलाफ अब सख्त से सख्त कार्रवाई करना ही एकमात्र विकल्प है।
सोमवार को शाम 5.30 बजे अर्धसैनिक बलों के कैंप पर कायरों की तरह जवानों पर हमला करने वाले ये कथित माओवादी या नक्सली किसी भी तरह से क्षमा या सहानुभूति के पात्र नहीं है। जो लोग इनसे सहानुभूति रखते हैं उन्हें न तो सभ्य समाज से मतलब है और न ही लोकतान्त्रिक मूल्यों में तनिक भी विश्वास है। उधर, माओवादी किशन ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा है कि यह चिदंबरम के ऑपरेशन ग्रीन हंट का जवाब है। किशन का जवाब कितना हास्यास्पद और बचकाना है। गृहमन्त्री चिदंबरम कोई अपना व्यक्तिगत मिशन नहीं चला रहे हैं। यह तो केन्द्र सरकार की कार्रवाई है। जो देश में आतंक फैलाने वाले किसी के भी विरुद्ध कार्रवाई कर देशवासियों को सुरक्षा का वातावरण मुहैया कराने के लिए जिम्मेदार है। ये माओवादी इससे पहले भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों और पुलिस वालों की जान ले चुके हैं। सोमवार का हमला अक्षम्य है। क्योंकि ये जवान भी तो किसी के बेटे, भाई, पिता और पति हैं। क्या इन शहीद हुए जवानों के परिजन कभी इन्हें माफ कर सकते हैं। शायद कभी नहीं।
कहने को तो ये माओवादी भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन, इन्हें किसी व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। जिन क्षेत्रों में ये सक्रिय हैं वहां के लोगों को आतंक के बल पर अपना समर्थक बनाए हुए हैं। लोगों से जबरदस्ती लेवी के रूप में धन की उगाही किस बात का संकेत है। लोगों पर अपना कथित कानून थोपना तालिबानी मानसिकता का ही तो द्योतक है।
दरअसल, माओवाद या नक्सलवाद के ये कथित लंबरदार मूल उद्देश्यों से भटके हुए हैं। जिनका उद्देश्य महज धन उगाही, मारकाट और अपना काला कानून गरीबों पर थोपना भर है। नही तो नक्सली आन्दोलन आज अपने अंजाम को प्राप्त कर लिया होता है। क्योंकि, भू आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ नक्सली आन्दोलन इस तरह रक्तपिपासु आन्दोलन में तब्दील नही हो सकता था। कई वामपन्थी पार्टियों ने इस तरह के खून खराबे को बर्बर और घृणित बताया है।
राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और पुलिस से हथियार छिनने के पीछे इनका मकसद अपनी समानान्तर सत्ता कायम करना है। दरअसल, ये सिरफिरे वामपन्थी आतंकवादी इन गतिविधियों को करके जनता में अपना खौफ पैदा करते हैं। ताकि, लोग इनका विरोध न कर सकें। हालांकि, लोगों में अपनी इमेज बनाने और सहानुभूति हासिल करने के लिए बिहार के जहांनाबाद आदि क्षेत्रों में माओवादियों ने सड़क बनवाया है। तो बड़ी संख्या में रेलवे ट्रैक, पुल और सड़क तथा मोबाइल टावरों को ध्वस्त कर दिया है। इससे परेशानी तो आम जनता को ही होती है। सरकार इन बुनियादी सुविधाओं को जनता के पैसों से ही तो मुहैया कराती है।
वैसे, ये कथित माओवादी नेपाल की तरह यहां भी अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन, यह भूल जाते हैं कि भारत में लाल गलियारा का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। नेपाल से कन्याकुमारी तक के लाल गलियारा की सोच कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी। क्योंकि, भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियां नेपाल से भिन्न हैं। रही बात नेपाल की तो वहां राजा ज्ञानेन्द्र अपनी करनी से ही पदच्युत हुए हैं। यदि पूर्व राजा विरेन्द्र विक्रम रहे होते तो माओवादी नेपाल में भी कभी सिर नहीं उठा पाते। फिलहाल, नेपाल के माओवादी जिस तरह सत्ता में वापसी के लिए बौखला रहे हैं उसी तरह भारत में भी कुछ कुंठित माओवादी सत्ता सुख भोगना चाहते हैं।
अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक पाटिüयां क्षेत्रीय आकांक्षाओं से ऊपर उठ कर इन रक्तपिपासु, सिरफिरे और कुंठित कथित माओवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में केन्द्र सरकार का सहयोग करें। दूसरी तरफ, केन्द्र सरकार को संविधान में यह अधिकार प्राप्त है कि देश की अखण्डता और देशवासियों को भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के लिए कोई भी कदम उठाए। माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार को अब राज्य सरकारों का भरोसा छोड़ना होगा। क्योंकि, अब पानी सिर से ऊपर उठ चुका है।
February 12, 2010
गृहमन्त्री जी कश्मीरी पण्डितों को वापसी का प्रस्ताव कब देंगे?
अपने ही देश में शरणार्थी बने हैं कश्मीरी पण्डित
कांग्रेस का समर्थन परंपरागत तुष्टिकरण का ही नीति है
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमन्त्री उमर अब्दुल्ला के पाक अधिकृत कश्मीर गए युवाओं के वापस आने और उनके पुनर्वास और समर्पण के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार की सहमति मिलना कांग्रेस की परंपरागत तुष्टिकरण नीतियों का ही परिचायक है। अचानक आए इस वक्तव्य से केन्द्र और राज्य सरकार की नीयत पर प्रश्नचिंह उठना स्वाभाविक है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के एक मन्त्री तक ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है। हालांकि, मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस प्रस्ताव का तीव्र विरोध कर विपक्षी दल के धर्म का निर्वाह कर दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी किस दमदार तरीके से केन्द्र और राज्य सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध करती है। जो लोग पाकिस्तान या पीओके गए हैं उनकी पूरी छानबीन कर यह जानने की कभी कोशिश की गई है कि वे लोग वहां क्या कर रहे हैं? भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वालों को पुनर्वास नहीं उन्हें सजा-ए-मौत मिलनी चाहिए। ताकि, दूसरे कथित तौर पर भटके युवाओं को सीख मिले। क्या केन्द्र और राज्य सरकार देशवासियों को यह निश्चित आश्वासन दे पाएंगी कि वे युवक फिर से नहीं भटकेंगे? यदि फिर से भटकते हैं या उनके साथ दूसरे तरीके से घुसपैठ होती है तो इसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही किसकी होगी?
दूसरी तरफ, राज्य के विकास का सब्जबाग दिखाने वाले मुख्यमन्त्री उमर ने कश्मीरी पण्डितों के राज्य में वापसी के लिए अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं दिया और नहीं पण्डितों को यह भरोसा ही दिलाया कि यदि वे वापस लौटते हैं तो राज्य में उनको पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी। वहीं केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार ही अपनी दूसरी पारी में इस सम्बंध में कुछ करती नहीं दिख रही है। ऐसे में देशद्रोह कर पाकिस्तान गए और वहां से भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने वाले लोगों और युवाओं के पुनर्वास और समर्पण का पुरजोर समर्थन करना केन्द्र की मंशा तुष्टिकरण से ज्यादा कुछ नहीं लगती। लाखों कश्मीरी पण्डित अपनी जमीन जायदाद और संपत्ति छोड़कर आज देश के कई शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। उनकी सुधी लेने की न तो फुरसत कांग्रेस की केन्द्र सरकार को है और नही कांग्रेस की समर्थन से चल रही जम्मू-कश्मीर सरकार को है। क्या कश्मीरी पण्डितों को अपने पूर्वजों के राज्य में रहने का सपना पूरा नहीं होना चाहिए। अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी से उखड़ने का दर्द क्या होता है इसे जानना हो तो कश्मीरी पण्डितों के शरणार्थी शिविरों में जाकर देखा जा सकता है।
क्या देश के प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री और कश्मीर के मुख्यमन्त्री उमर अब्दुल्ला ने कभी उन पण्डितों से मिलकर उनके दुखदर्द को जानने की कोशिश की? सरकारों ने उनकी समस्याओं को जानने के लिए कभी पहल ही नहीं कीं। क्या इसकी वजह यही है कि वे लोग हिन्दू हैं? जो अपने ही देश में शरणार्थी बने हैं। आज भी वे अपने राज्य में वापस लौटने का इन्तजार कर रहे हैं। कई तो इसी इन्तजार में कालकवलित हो गए। लेकिन, केन्द्र सरकार को उनकी खोज खबर लेने की कोई जरूरत ही महसूस नहीं होती।
यह कितना अफसोसनाक है कि जो लोग आतंकवादियों से मिलकर देश को तबाह करने की कोशिश में लगे हैं। हजारों निर्दोषों का खून बहा चुके हैं, उनकी पुनर्वास की बात की जा रही है। उन्हें भटका हुआ युवक बताया जा रहा है। राज्य का मुख्यमन्त्री उन्हें आम माफी दिलाने की वकालत करता है। लेकिन, मुख्यमन्त्री को बेगुनाह लोगों की कोई चिन्ता नहीं है जो शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं। उनकी गलती बस इतना ही है कि वे कश्मीर के हिन्दू हैं जिनका इतिहास गौरवशाली रहा है। जो वास्तव में वहां के अर्थात जम्मू-कश्मीर के मूल बाशिन्दे हैं।
सबसे ज्यादा दुख तो इस बात का है कि कोई भी दल इन कश्मीरी पण्डितों की बात नहीं करता। कोई भी दल अपने घोषणापत्र में इनके पुनर्वास की बात नहीं उठाता। गृहमन्त्री पी. चिदंबरम को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। जिस जल्दबाजी में उन्होंने उमर अब्दुल्ला का समर्थन किया है, उसी के साथ गृहमन्त्री को मुख्यमन्त्री से पूछना चाहिए था कि इन पण्डितों के पुनर्वास के लिए सरकार क्या कर रही है। राज्य सरकार इनकी वापसी के लिए अबतक कौन-कौन से कदम उठाई है? यदि नहीं उठाई है तो क्यों? क्या यह हिम्मत गृहमन्त्री पी. चिदंबरम दिखा पाएंगे? इस सवाल का जवाब कश्मीरी पण्डितों के साथ सभी देशवासियों को है।
February 9, 2010
राहुल का मुम्बई दौरा बचकाना जिद से ज्यादा कुछ नहीं था
देश में बढ़ता भाषाई नफरत कांग्रेस की ही देन है
शिवसेना शाहरुख विवाद के पीछे की राजनीति को समझना होगा
पिछले दिनों राहुल गांधी के महाराष्ट्र दौरे को मीडिया में जमकर बेचा गया। मानो राहुल गांधी महाराष्ट्र का दौरा कर उत्तर भारतीयों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान कर आए हों या यों कहें कि वहां सांप्रदायिक सौहार्द की नींव ही मजबूत कर आए हों। पांच फरवरी को पूरे चार घंटे तक और उसके बाद भी मीडिया के पास राहुल दौरा के अलावा कोई दूसरा समाचार ही नहीं था। क्या राहुल का मुम्बई दौरा वास्तव में उल्लेखनीय था? क्या इससे महाराष्ट्र की जनता को कुछ हासिल हो पाया? अथवा महाराष्ट्र में राज ठाकरे और शिव सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा सताए जा रहे लोगों के जख्म पर थोड़ा बहुत भी मरहम लग पाया? सच तो यह है कि राहुल का दौरा छोटे बच्चों के जिद के अलावा और कुछ था ही नहीं। उनके दौरे से सरकारी काम काज ही प्रभावित हुआ। क्योंकि, प्रदेश के मुख्यमन्त्री सहित पूरा प्रशासनिक अमला राहुल के सुरक्षा में ही लगा रहा। इससे आम आदमी को हुई परेशानी का किसे एहसास है? क्या कांग्रेस की प्रदेश सरकार और राहुल गांधी यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके दौरे के बाद वहां उत्तर भारतीयों पर हमले नहीं होंगे? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है क्योंकि, राज ठाकरे भी तो कांग्रेस के मूक समर्थन से पुष्पित पल्लवित हुए हैं।
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हो रहे हमलों के लिए शुद्ध रूप से कांग्रेस की अदूरदर्शी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। दरअसल, नेहरू जी ने भाषा को राज्यों के गठन का आधार मान कर भविष्य के लिए विष वृक्ष लगा दिया था। जिसका जहरीला फल आज भी महाराष्ट्र सरीखे अन्य राज्यों में हिन्दी भाषियों को खाना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में दो दशक से कांग्रेस की सरकार है और इन्हीं दो दशकों में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों के निवासियों पर वहां हमले किए गए। कांग्रेस राज की पुलिस तमाशबीन की तरह उत्तर भारतीयों को पीटते देखती रही। लेकिन, कार्रवाई के नाम पर केवल मीडिया में बयान जारी करके सरकार ने अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिया।
जिस तरह से राहुल गांधी के दौरे को लेकर फुलप्रुफ सुरक्षा व्यवस्था खड़ा किया गया था यदि इसके थोड़े हिस्से को भी उत्तर भारतीयों के सुरक्षा में लगा दिया गया होता तो उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग नहीं पीटे गए होते और न ही राज ठाकरे के गुण्डों को अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का मौका मिला होता।
दूसरी तरफ, शाहरुख खान ने भी क्या सामयिक मौका तलाशा। उनकी फिल्म जल्द ही रिलीज होने वाली है। उस फिल्म के प्रचार के लिए कितना शानदार मुद्दा तलाश लिया। क्रिकेट के बहाने ही उन्होंने बयान देकर उस पर प्रतिक्रिया के लिए शिव सेना को प्रेरित किया। महाराष्ट्र में जो कुछ भी बवाल हुआ वह सब उनकी गैर मौजूदगी में ही हुआ। उनके स्वदेश लौटते ही सारा विवाद शान्त हो गया। दोनों तरफ से कोई उत्तेजक बयान नहीं आए। पर्दे के पीछे कहीं कोई और बात तो नहीं छिपी है! इस राज को समझना कोई कठिन नहीं है। शाहरुख खान और बाल ठाकरे दोनों ही कलाकार हैं। फर्क इतना ही है कि बाल ठाकरे आज राजनीति के शीर्ष से ढलान पर आ गए हैं जबकि, शाहरुख फिल्मी दुनिया के शीर्ष पर अभी भी काबिज हैं। शाहरुख जानते हैं कि कौन सी चाल उनकी फिल्म के लिए रामबाण हो सकती है। और यही हुआ बैठे बिठाए ही उनकी नई फिल्म का जमकर प्रमोशन हो गया। रिलीज होने से पहले ही उनकी फिल्म सुर्खियां बटोर चुकी है। खबरों के मुताबिक पाकिस्तान में उनकी फिल्म का अवैध सीडी कारोबार लगभग एक अरब केआसपास पहुंच गया है।
दूसरी तरफ, ठाकरे परिवार को उनकी औकात बताने के लिए राहुल गांधी को मुम्बई जाना पड़ाता है। क्या यह केवल ठाकरे के बयान से उपजा विवाद भर ही है या बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव की राहुल की तैयारी है। क्या कांग्रेस की दोहरी चाल को लोग नही समझ पा रहे हैं? उस समय राहुल कहां थे जब बिहार और उत्तरप्र देश के छात्र मुम्बई रेलवे स्टेशन पर दौड़ा दौड़ा क र पीटे जा रहे थे। उसे समय राहुल राज ठाकरे को औकात बताने क्यों नहीं गए?
January 29, 2010
महानगरों में कम होते जिन्दगी के मायने
बात-बात पर जान लेने से पीछे नहीं हट रहे दिल्ली वाले
लगता है दिल्ली सरीखे महानगरों में रहने लोग मानवीय संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि, छोटी-छोटी बातों पर भी लोग एक दूसरे की जान लेने से नहीं चूक रहे हैं। लोगों का गुस्सा और तनाव तो आदिम युग की बर्बरता की कहानियों को ताजा करने लगा है। क्या महानगरों में जिन्दगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? दिल्ली की यह खबर तो शायद कुछ इसी तरफ ही इशारा करती है।
पिछले दिन देश की राजधानी में एक युवक की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह कुछ लोगों को अपने घर के सामने लघुशंका करने से मना कर रहा था। समाचारों के अनुसार मृत युवक के घर के सामने ही एक फैक्टरी है। वहां काम करने वाले मजदूर और अन्य कर्मचारी अक्सर उसके घर के सामने लघुशंका करते थे। घटना के दिन फैक्टरी मालिक अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पी रखा था। इसके बाद फैक्टरी मालिक अपने दोस्तों के साथ युवक के घर के सामने पेशाब करने लगा। जिस पर युवक ने मना किया तो उसने अपने दोस्तों और कर्मचारियों के साथ मिलकर उसे इतना पीटा कि वह युवक दम ही तोड़ दिया। हालांकि, पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फैक्टरी मालिक को गिरफ्तार कर लिया और अन्य की तलाश कर रही है।
सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। सवाल इस बात का है कि दिल्ली हमारे देश की राजधानी है। ऐसे में यहां रहने वाले लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हों तो इससे शर्मिन्दगी और अधिक क्या हो सकती है? यह सच है कि एक या दो घटनाओं से पूरे महानगर को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है यह भी सच है कि जो लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं उनकी शैक्षणिक और सामाजिक स्तर दोयम दर्जे की है। लेकिन, इससे दिल्ली वालों के व्यवहार की पैरोकारी नहीं की जा सकती। क्योंकि, ऐसा देखने में आता है कि दिल्ली में पले बढ़े युवक सड़क पर खुद ही गलत दिशा में चलते हैं और आपकी गाड़ी में टक्कर भी मारेंगे और आपकी न केवल पिटाई करेंगे बल्कि जान भी लेने से नहीं चूकते हैं। ये युवक अपने आप को काफी शिक्षित और स्मार्ट मानते हैं।
दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में छोटमोटी बातों पर लोग हत्या करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है एक युवक की हत्या महज बीस रुपये के लिए कर दी गई। इस तरह की लगभग दर्जन भर घटनाएं हैं जिसमें छोटी-छोटी बातों के लिए कत्ल कर देने की घटनाएं प्रकाश में आईं हैं।
दूसरी तरफ 31 दिसम्बर की रात जब पूरी दुनिया नए वर्ष के आगमन की खुशियां मना रही है तो दिल्ली में पान गुटका बेचकर अपनी जीविका चला रहे किशोर की दूसरे किशोर ने इस लिए हत्या कर दी कि उसके पास ठण्ड से बचने के लिए कुछ नहीं था। मृतक किशोर उसी दिन नया कंबल खरीद कर लाया था लेकिन उसे कंबल नसीब नहीं हो सका।
ये बातें मानवीय सोच की संकीर्ण होते दायरे को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आज हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। यदि गलत दिशा में जा रहा है तो इसके लिए हम आप क्या कर रहे हैं?
दिल्ली की उपरोक्त घटनाओं के लिए क्या वहीं जिम्मेदार हैं जो इन घटनाओं को अंजाम दिए हैं? क्या हमारा समाज इसके लिए कम दोषी है?
लगता है दिल्ली सरीखे महानगरों में रहने लोग मानवीय संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि, छोटी-छोटी बातों पर भी लोग एक दूसरे की जान लेने से नहीं चूक रहे हैं। लोगों का गुस्सा और तनाव तो आदिम युग की बर्बरता की कहानियों को ताजा करने लगा है। क्या महानगरों में जिन्दगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? दिल्ली की यह खबर तो शायद कुछ इसी तरफ ही इशारा करती है।
पिछले दिन देश की राजधानी में एक युवक की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह कुछ लोगों को अपने घर के सामने लघुशंका करने से मना कर रहा था। समाचारों के अनुसार मृत युवक के घर के सामने ही एक फैक्टरी है। वहां काम करने वाले मजदूर और अन्य कर्मचारी अक्सर उसके घर के सामने लघुशंका करते थे। घटना के दिन फैक्टरी मालिक अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पी रखा था। इसके बाद फैक्टरी मालिक अपने दोस्तों के साथ युवक के घर के सामने पेशाब करने लगा। जिस पर युवक ने मना किया तो उसने अपने दोस्तों और कर्मचारियों के साथ मिलकर उसे इतना पीटा कि वह युवक दम ही तोड़ दिया। हालांकि, पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फैक्टरी मालिक को गिरफ्तार कर लिया और अन्य की तलाश कर रही है।
सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। सवाल इस बात का है कि दिल्ली हमारे देश की राजधानी है। ऐसे में यहां रहने वाले लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हों तो इससे शर्मिन्दगी और अधिक क्या हो सकती है? यह सच है कि एक या दो घटनाओं से पूरे महानगर को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है यह भी सच है कि जो लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं उनकी शैक्षणिक और सामाजिक स्तर दोयम दर्जे की है। लेकिन, इससे दिल्ली वालों के व्यवहार की पैरोकारी नहीं की जा सकती। क्योंकि, ऐसा देखने में आता है कि दिल्ली में पले बढ़े युवक सड़क पर खुद ही गलत दिशा में चलते हैं और आपकी गाड़ी में टक्कर भी मारेंगे और आपकी न केवल पिटाई करेंगे बल्कि जान भी लेने से नहीं चूकते हैं। ये युवक अपने आप को काफी शिक्षित और स्मार्ट मानते हैं।
दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में छोटमोटी बातों पर लोग हत्या करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है एक युवक की हत्या महज बीस रुपये के लिए कर दी गई। इस तरह की लगभग दर्जन भर घटनाएं हैं जिसमें छोटी-छोटी बातों के लिए कत्ल कर देने की घटनाएं प्रकाश में आईं हैं।
दूसरी तरफ 31 दिसम्बर की रात जब पूरी दुनिया नए वर्ष के आगमन की खुशियां मना रही है तो दिल्ली में पान गुटका बेचकर अपनी जीविका चला रहे किशोर की दूसरे किशोर ने इस लिए हत्या कर दी कि उसके पास ठण्ड से बचने के लिए कुछ नहीं था। मृतक किशोर उसी दिन नया कंबल खरीद कर लाया था लेकिन उसे कंबल नसीब नहीं हो सका।
ये बातें मानवीय सोच की संकीर्ण होते दायरे को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आज हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। यदि गलत दिशा में जा रहा है तो इसके लिए हम आप क्या कर रहे हैं?
दिल्ली की उपरोक्त घटनाओं के लिए क्या वहीं जिम्मेदार हैं जो इन घटनाओं को अंजाम दिए हैं? क्या हमारा समाज इसके लिए कम दोषी है?
January 15, 2010
तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं?
उत्तरप्रदेश में सपा निश्चित तौर पर और कमजोर होगी
अमर भी नुकसान में रहेंगें
तो क्या अपने कुनबे के मोह में मुलायम सिंह यादव अमरसिंह के समाजवादी पार्टी के लिए किए गए योगदान को भूला देंगे? तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं? या कुछ और खेल है। जिस सपा और उसके मुखिया मुलायम के लिए अमर सिंह को भारतीय राजनीति का दलाल तक कह दिया गया। क्या उन्हें भुला पाना मुलायम के लिए आसान है। बेशक, मुलायम के भाई रामगोपाल यादव आज अमर की औकातं की बात कर रहे हों और उनकी हैसियत गांव के प्रधानी का चुनाव जीतने भर भी नहीं आंक रहे हों। लेकिन, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि अमर सिंह ने ही सपा को औद्योगिक घरानों से जोड़कर आर्थिक रूप से समृद्ध किया। क्योंकि, सरकार चलाने के बाद भी सपा की माली हालत ठीक नहीं थी। अमर सिंह ने जिस भाई-भतीजावादी मुद्दे पर पार्टी से बगावती तेवर अपनाया है वह भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत है। वैसे मुलायम और अमर को एक दूसरे की जरूरत है। अलग होने से मुलायम और अमर दोनों को नुकसान ही होगा।
हालांकि, अमर सिंह के लिए मुलायम ने पार्टी के कई संस्थापक सिपहसलारों को खोया है। लेकिन लोहिया के समाजवाद की बात करने वाले मुलायम जिस तरह से अपने कुनबे के मोह में फंसते जा रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के जनाधार को और कमजोर ही करेगा। केवल जातिवाद और मुस्लिमप्रस्त राजनीति करके सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। आज यादव और मुस्लिमों की पार्टी की छवि से बाहर निकल कर सपा समाज के लगभग सभी वर्गों में पैठ बना रही है तो इसके पीछे निश्चित तौर पर अमरसिंह का ही हाथ है। अमरसिंह ने सपा से न केवल राजपूतों को जोड़ा बल्कि अन्य सवर्ण जातियों को भी सपा में खींच लाने में कामयाबी हासिल की। जब भाजपा को ही उत्तरप्रदेश में सभी सवर्ण जातियां अपना दल मानती थीं वैसे माहौल में अमर सिंह ने क्षत्रियों और अन्य को सपा से जोड़कर भाजपा को कमजोर किया था। यही वजह है कि आज भाजपा उत्तरप्रदेश में चौथे स्थान पर पहुंच गई है।
दूसरी तरफ आज भी अमर सिंह की दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय स्तर पर मुलायम और उनके प्रोफेसर भाई से ज्यादा स्वीकार्यता है। विदेशी नेताओं से भी अमर के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम को असरदार बनाने में अमर सिंह का अहम योगदान रहा है। आज भी राष्ट्रीय राजनीति में अमर सिंह का लगभग सभी दलों के नेताओं से अच्छा संबंध है। अमर सिंह ने मुलायम और पार्टी को आगे बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान दिया है। और रामगोपाल और अखिलेश की छवि महज यह है कि दोनों मुलायम के भाई और पुत्र हैं।
सपा से औद्योगिक घरानों और फिल्मी कलाकारों को जोड़ने का काम अमर सिंह ने ही किया था। जब मुलायम सिंह पिछली बार मुख्यमंत्री बने थे तो इसके पीछे भी अमर का ही अमर हाथ था। उस समय सरकार बनने के बाद उत्तरप्रदेश विकास परिषद का गठन कराकर मुलायम सरकार को आर्थिक मजबूती प्रदान किया था। जिसके बल पर ही मुलायम तमाम योजनाएं चला सके थे। हालांकि, फिल्मी कलाकारों से सपा को कोई खास लाभ तो नहीं मिला लेकिन इनके जुड़ने से पार्टी की स्वीकार्यता तो बढ़ी ही है।
दूसरी तरफ, अमर के आने से पहले जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय उन्हें यादव और मुसलमानों के अलावा दलितों का भी पर्याप्त समर्थन मिला था। मुलायम की पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दलितों के नेता की छवि बनी थी। समाज के इन वर्गों में उनकी स्वीकार्यता भी थी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, मायावती के उत्थान के बाद तो दलितों ने न केवल मुलायम और सपा से कन्नी काट लिया बल्कि मुसलमान भी मुलायम का साथ छोड़ने लगे थे, कुछ जुड़े भी थे तो वह आजम और राजब्बर व दूसरे मुस्लिम नेताओं के चलते और कांग्रेस की कमजोर स्थिति और भाजपा को रोकने के लिए ही। लेकिन, अमर सिंह के सपा में अवतार के बाद से राजपूतों का झुकाव सपा की तरफ हुआ और उन्होंने दलितों की रिक्ति को कम करके सपा को मजबूत किया।
अमर सिंह जिस मुद्दे को लेकर पार्टी से नाता तोड़ने वाले हैं वह मुद्दा स्वागत योग्य है। हालांकि पर्दे के पीछे और मुद्दे हैं जो दिखाई नहीं पड़ते। अगर अमर सिंह मुलायम के कुनबे के बढ़ते दबदबे का विरोध कर रहे हैं तो यह सही कदम है। कोई भी पार्टी एक व्यक्ति की पारिवारिक पार्टी नहीं हो सकती है। लेकिन, भारतीय राजनीति का यह दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता पार्टी और वामदलों को छोड़कर कांग्रेस सहित तमाम छोटे-बड़े दल भाई भतीजावाद और कुनबाई मानसिकता से ग्रसित हैं। इन दलों में सभी महत्वपूर्ण पदों पर एक ही परिवार के सदस्य या उनके दूर तक के रिश्तेदार काबिज हैं। ऐसे में अमर सिंह का मुलायम के भाई, पुत्र और बहू के मोह का विरोध करना और पार्टी तक छोड़ने की बात कहना सुकून पहुंचाता है।
दूसरी तरफ मुलायम का दौर अब अस्ताचल की ओर जा रहा है। अब उनकी, पार्टी में अंतिम राय नहीं हो सकती। अपने कुनबे के सामने झुकना उनकी मजबूरी होगी। यदि रामगोपाल और अखिलेश अमर के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं मुलायम का ही हाथ है। लेकिन रामगोपाल और अखिलेश यादव को यह याद रखना होगा कि अमर के जाते ही सपा और कमजोर होगी। अमर के चलते जो लोग सपा से जुड़े थे वे लोग भी बॉय बोलने में देर नहीं लगाएंगे और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा और उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा फिर कभी मजबूत नहीं हो सकती।
अमर भी नुकसान में रहेंगें
तो क्या अपने कुनबे के मोह में मुलायम सिंह यादव अमरसिंह के समाजवादी पार्टी के लिए किए गए योगदान को भूला देंगे? तो क्या वाकई अमर मुलायम के कुनबाई मोह का विरोध कर रहे हैं? या कुछ और खेल है। जिस सपा और उसके मुखिया मुलायम के लिए अमर सिंह को भारतीय राजनीति का दलाल तक कह दिया गया। क्या उन्हें भुला पाना मुलायम के लिए आसान है। बेशक, मुलायम के भाई रामगोपाल यादव आज अमर की औकातं की बात कर रहे हों और उनकी हैसियत गांव के प्रधानी का चुनाव जीतने भर भी नहीं आंक रहे हों। लेकिन, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि अमर सिंह ने ही सपा को औद्योगिक घरानों से जोड़कर आर्थिक रूप से समृद्ध किया। क्योंकि, सरकार चलाने के बाद भी सपा की माली हालत ठीक नहीं थी। अमर सिंह ने जिस भाई-भतीजावादी मुद्दे पर पार्टी से बगावती तेवर अपनाया है वह भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत है। वैसे मुलायम और अमर को एक दूसरे की जरूरत है। अलग होने से मुलायम और अमर दोनों को नुकसान ही होगा।
हालांकि, अमर सिंह के लिए मुलायम ने पार्टी के कई संस्थापक सिपहसलारों को खोया है। लेकिन लोहिया के समाजवाद की बात करने वाले मुलायम जिस तरह से अपने कुनबे के मोह में फंसते जा रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के जनाधार को और कमजोर ही करेगा। केवल जातिवाद और मुस्लिमप्रस्त राजनीति करके सत्ता शीर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। आज यादव और मुस्लिमों की पार्टी की छवि से बाहर निकल कर सपा समाज के लगभग सभी वर्गों में पैठ बना रही है तो इसके पीछे निश्चित तौर पर अमरसिंह का ही हाथ है। अमरसिंह ने सपा से न केवल राजपूतों को जोड़ा बल्कि अन्य सवर्ण जातियों को भी सपा में खींच लाने में कामयाबी हासिल की। जब भाजपा को ही उत्तरप्रदेश में सभी सवर्ण जातियां अपना दल मानती थीं वैसे माहौल में अमर सिंह ने क्षत्रियों और अन्य को सपा से जोड़कर भाजपा को कमजोर किया था। यही वजह है कि आज भाजपा उत्तरप्रदेश में चौथे स्थान पर पहुंच गई है।
दूसरी तरफ आज भी अमर सिंह की दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय स्तर पर मुलायम और उनके प्रोफेसर भाई से ज्यादा स्वीकार्यता है। विदेशी नेताओं से भी अमर के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम को असरदार बनाने में अमर सिंह का अहम योगदान रहा है। आज भी राष्ट्रीय राजनीति में अमर सिंह का लगभग सभी दलों के नेताओं से अच्छा संबंध है। अमर सिंह ने मुलायम और पार्टी को आगे बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान दिया है। और रामगोपाल और अखिलेश की छवि महज यह है कि दोनों मुलायम के भाई और पुत्र हैं।
सपा से औद्योगिक घरानों और फिल्मी कलाकारों को जोड़ने का काम अमर सिंह ने ही किया था। जब मुलायम सिंह पिछली बार मुख्यमंत्री बने थे तो इसके पीछे भी अमर का ही अमर हाथ था। उस समय सरकार बनने के बाद उत्तरप्रदेश विकास परिषद का गठन कराकर मुलायम सरकार को आर्थिक मजबूती प्रदान किया था। जिसके बल पर ही मुलायम तमाम योजनाएं चला सके थे। हालांकि, फिल्मी कलाकारों से सपा को कोई खास लाभ तो नहीं मिला लेकिन इनके जुड़ने से पार्टी की स्वीकार्यता तो बढ़ी ही है।
दूसरी तरफ, अमर के आने से पहले जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय उन्हें यादव और मुसलमानों के अलावा दलितों का भी पर्याप्त समर्थन मिला था। मुलायम की पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दलितों के नेता की छवि बनी थी। समाज के इन वर्गों में उनकी स्वीकार्यता भी थी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, मायावती के उत्थान के बाद तो दलितों ने न केवल मुलायम और सपा से कन्नी काट लिया बल्कि मुसलमान भी मुलायम का साथ छोड़ने लगे थे, कुछ जुड़े भी थे तो वह आजम और राजब्बर व दूसरे मुस्लिम नेताओं के चलते और कांग्रेस की कमजोर स्थिति और भाजपा को रोकने के लिए ही। लेकिन, अमर सिंह के सपा में अवतार के बाद से राजपूतों का झुकाव सपा की तरफ हुआ और उन्होंने दलितों की रिक्ति को कम करके सपा को मजबूत किया।
अमर सिंह जिस मुद्दे को लेकर पार्टी से नाता तोड़ने वाले हैं वह मुद्दा स्वागत योग्य है। हालांकि पर्दे के पीछे और मुद्दे हैं जो दिखाई नहीं पड़ते। अगर अमर सिंह मुलायम के कुनबे के बढ़ते दबदबे का विरोध कर रहे हैं तो यह सही कदम है। कोई भी पार्टी एक व्यक्ति की पारिवारिक पार्टी नहीं हो सकती है। लेकिन, भारतीय राजनीति का यह दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता पार्टी और वामदलों को छोड़कर कांग्रेस सहित तमाम छोटे-बड़े दल भाई भतीजावाद और कुनबाई मानसिकता से ग्रसित हैं। इन दलों में सभी महत्वपूर्ण पदों पर एक ही परिवार के सदस्य या उनके दूर तक के रिश्तेदार काबिज हैं। ऐसे में अमर सिंह का मुलायम के भाई, पुत्र और बहू के मोह का विरोध करना और पार्टी तक छोड़ने की बात कहना सुकून पहुंचाता है।
दूसरी तरफ मुलायम का दौर अब अस्ताचल की ओर जा रहा है। अब उनकी, पार्टी में अंतिम राय नहीं हो सकती। अपने कुनबे के सामने झुकना उनकी मजबूरी होगी। यदि रामगोपाल और अखिलेश अमर के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं मुलायम का ही हाथ है। लेकिन रामगोपाल और अखिलेश यादव को यह याद रखना होगा कि अमर के जाते ही सपा और कमजोर होगी। अमर के चलते जो लोग सपा से जुड़े थे वे लोग भी बॉय बोलने में देर नहीं लगाएंगे और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा और उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा फिर कभी मजबूत नहीं हो सकती।
January 11, 2010
क्यों जाते हैं भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया
अभी नितिन गर्ग की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि ऑस्टे्रलिया में फिर एक भारतीय युवक जसप्रीत सिंह (29) को निशाना बनाया गया। इस बार ऑस्ट्रेलियाइयों ने तो सारी हदें पार करते हुए उस युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया। इस हमले में वह 20 फीसदी तक जल गया। इस कृत्य को ऑस्ट्रेलिया सरकार की विफलता माना जाए या वहां के निवासियों की दरिंदगी अथवा इसे ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता और संस्कृति ही मान लिया जाए। यह एक बहस का मुद्दा है। वर्ष 2009 में भारतीय छात्रों पर हमले की करीब 100 घटनाएं हो चुकी हैं।
क्या इसके लिए भारत की केंद्र सरकार और भारतीय छात्र जिम्मेदार नहीं हैं? अव्वल तो भारतीय छात्रों को ऐसे नस्लीय देशों में जाना ही नहीं चाहिए। जहां के नागरिकों में इंसानियत से कोई सरोकार ही नहीं है। जो छात्र लाखों खर्च करके ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उससे कम पैसे में भारत में भी वही शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। अपने देश में भी मेडिकल, आईटी और प्रबंधन की पढ़ाई विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से तनिक भी कम नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि विदेशों से शिक्षा ग्रहण कर लौटे छात्रों को कंपनियां यहां हाथों-हाथ लेती हैं या उनमें अतिरिक्त पेशेवराना कौशल होता है। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विदेश में जाकर पढ़ाई करने के पीछे कुछ छात्र और उनके परिवार दिखावे की ग्रंथी से भी प्रेरित होते हैं। लेकिन, अधिकांश छात्र भारत की आईटी, प्रबंधन और मेडिकल संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था की मार से ही विदेशों में जाने को विवश हैं और अपनी जान गवां रहे हैं। चूँकि यहां इन संस्थानों में कोटा निर्धारित है। जिससे बहुत से छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाना पड़ता है। यदि सरकार भारी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान देश के हर कोने में खेल देती तो यहां के छात्र विदेशों में अपमानित और हमले के शिकार नहीं होते। दूसरे अपने देश का पैसा विदेशों में नहीं जाता। दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी सरकार चलाने के अलावा इस ओर सोचने का मौका ही नहीं मिलता।
भारत को आजादी मिलने से कुछ साल पहले ही जापान को बर्बाद कर दिया गया था लेकिन आज वही जापान भारत और विश्व के अन्य देशों से विकास और अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में दशकों आगे है। इसके पीछे उनकी ईमानदार और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है। ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करना अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन पढ़ाई के साथ सुरक्षा कारणों को भी ध्यान रखना होगा। ऑस्ट्रेलिया से बेहतर पढ़ाई न्यूजीलैंड, शिंगापुर, मॉरिशस सहित कई दूसरे पश्चिमी देशों में होती है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में बीजा नियमों में ढील दी जाती है इसलिए भी भारतीय सहित अन्य दूसरे देशों के छात्र वहां जाकर पढ़ाई करना पसंद करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक दूसरे देशों से आने वाले छात्र ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में 13 अरब डॉलर का योगदान देते हैं। लगातार हो रहे हमलों से आने वाले समय में भारतीय छात्रों की ऑस्ट्रेलिया जाने की दर पचास फीसदी तक कम होगी। जिससे ऑस्ट्रेलिया को करीब 7 करोड़ डालर का नुकसान होगा।
विदेशों में भारतीयों की दुर्दशा के लिए भारत सरकार भी कम दोषी नहीं है। जब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर छोटे-मोटे हमले हो रहे थे तो उस समय हमारी सरकार सोई हुई थी। यदि उस दौरान ही सरकार कड़ा रुख अपनाती तो शायद आज कई घरों का चिराग बूझने से बच गया होता। लेकिन यह तो भारत की सरकार है जब समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है तब उसकी तंद्रा टूटती है। छात्रों पर हमले होते रहे हमारे देश के नेता जी लोग चुप रहे।
ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर भारतीय छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करते हैं या टैक्सी चलाते हैं। छात्रों की अक्सर वहां टैçक्सयों को निशाना बनाया जाता रहा है। यही नहीं वे कंपनियों में वहां के स्थानीय युवकों की अपेक्षा कम पैसे में काम करने को तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि कंपनियां भारतीय छात्रों को ज्यादा पसंद करती हैं। दूसरे भारतीय छात्र अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं। जबकि, ऑस्ट्रेलियाई छात्रों में यह गुण कम पाया जाता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई युवक भारतीयों से जलते हैं। उनको लगता है कि भारतीय उनके अवसरों पर कब्ज कर रहे हैं।
क्या हमारी सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने नागरिकों को वेहतर सुविधाएं और छात्रों को उच्च शिक्षण संसथान उपलब्ध कराए। ताकि विदेशों में जान गवांने या जान जाने की नौबत ही न आए।
क्या इसके लिए भारत की केंद्र सरकार और भारतीय छात्र जिम्मेदार नहीं हैं? अव्वल तो भारतीय छात्रों को ऐसे नस्लीय देशों में जाना ही नहीं चाहिए। जहां के नागरिकों में इंसानियत से कोई सरोकार ही नहीं है। जो छात्र लाखों खर्च करके ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उससे कम पैसे में भारत में भी वही शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। अपने देश में भी मेडिकल, आईटी और प्रबंधन की पढ़ाई विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से तनिक भी कम नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि विदेशों से शिक्षा ग्रहण कर लौटे छात्रों को कंपनियां यहां हाथों-हाथ लेती हैं या उनमें अतिरिक्त पेशेवराना कौशल होता है। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विदेश में जाकर पढ़ाई करने के पीछे कुछ छात्र और उनके परिवार दिखावे की ग्रंथी से भी प्रेरित होते हैं। लेकिन, अधिकांश छात्र भारत की आईटी, प्रबंधन और मेडिकल संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था की मार से ही विदेशों में जाने को विवश हैं और अपनी जान गवां रहे हैं। चूँकि यहां इन संस्थानों में कोटा निर्धारित है। जिससे बहुत से छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाना पड़ता है। यदि सरकार भारी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान देश के हर कोने में खेल देती तो यहां के छात्र विदेशों में अपमानित और हमले के शिकार नहीं होते। दूसरे अपने देश का पैसा विदेशों में नहीं जाता। दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी सरकार चलाने के अलावा इस ओर सोचने का मौका ही नहीं मिलता।
भारत को आजादी मिलने से कुछ साल पहले ही जापान को बर्बाद कर दिया गया था लेकिन आज वही जापान भारत और विश्व के अन्य देशों से विकास और अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में दशकों आगे है। इसके पीछे उनकी ईमानदार और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है। ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करना अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन पढ़ाई के साथ सुरक्षा कारणों को भी ध्यान रखना होगा। ऑस्ट्रेलिया से बेहतर पढ़ाई न्यूजीलैंड, शिंगापुर, मॉरिशस सहित कई दूसरे पश्चिमी देशों में होती है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में बीजा नियमों में ढील दी जाती है इसलिए भी भारतीय सहित अन्य दूसरे देशों के छात्र वहां जाकर पढ़ाई करना पसंद करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक दूसरे देशों से आने वाले छात्र ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में 13 अरब डॉलर का योगदान देते हैं। लगातार हो रहे हमलों से आने वाले समय में भारतीय छात्रों की ऑस्ट्रेलिया जाने की दर पचास फीसदी तक कम होगी। जिससे ऑस्ट्रेलिया को करीब 7 करोड़ डालर का नुकसान होगा।
विदेशों में भारतीयों की दुर्दशा के लिए भारत सरकार भी कम दोषी नहीं है। जब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर छोटे-मोटे हमले हो रहे थे तो उस समय हमारी सरकार सोई हुई थी। यदि उस दौरान ही सरकार कड़ा रुख अपनाती तो शायद आज कई घरों का चिराग बूझने से बच गया होता। लेकिन यह तो भारत की सरकार है जब समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है तब उसकी तंद्रा टूटती है। छात्रों पर हमले होते रहे हमारे देश के नेता जी लोग चुप रहे।
ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर भारतीय छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करते हैं या टैक्सी चलाते हैं। छात्रों की अक्सर वहां टैçक्सयों को निशाना बनाया जाता रहा है। यही नहीं वे कंपनियों में वहां के स्थानीय युवकों की अपेक्षा कम पैसे में काम करने को तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि कंपनियां भारतीय छात्रों को ज्यादा पसंद करती हैं। दूसरे भारतीय छात्र अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं। जबकि, ऑस्ट्रेलियाई छात्रों में यह गुण कम पाया जाता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई युवक भारतीयों से जलते हैं। उनको लगता है कि भारतीय उनके अवसरों पर कब्ज कर रहे हैं।
क्या हमारी सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने नागरिकों को वेहतर सुविधाएं और छात्रों को उच्च शिक्षण संसथान उपलब्ध कराए। ताकि विदेशों में जान गवांने या जान जाने की नौबत ही न आए।
January 1, 2010
December 7, 2009
केंद्र की नाकामियों और महंगाई पर क्यों मौन है मीडिया ?
भारतीय मीडिया का दोहरा चरित्र
एक बार प्याज महंगी हुई तो भाजपा की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। आज ऐसा कोई भी खाद्यान्न या सब्जी नहीं है जिसे सस्ता कहा जा सके। लेकिन, कहीं भी उन दिनों की महंगी प्याज की तरह आज की महंगाई की चर्चा नहीं होती। मीडिया वाले भी कभी कभार महंगाई की खबर ब्रेक कर अपनी लोकतांत्रिक छवि का साक्ष्य पेश कर देते हैं। क्या आज की वही मीडिया है जब भाजपा सत्ता में थी तो महंगी प्याज पर हायतौबा मचा रही थी? या क्या इसे मान लेना चाहिए कि मौजूदा दौर की मीडिया संस्थानों में कांग्रेस नीत सरकार का विरोध करने अथवा किसी समस्या पर घेरने का मादा ही नहीं है। या उन दिनों भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए गहरी साजिश थी। जो भी हो आज मीडिया की भूमिका साफ सुथरी नहीं मानी जाएगी।
अटल जी के कार्यकाल में प्याज महंगी हो गई थी तो लोगों ने महंगाई पर जुमले और गाने तक बना डाले थे। उन दिनों यूपी और बिहार में एक गाना बड़ा गाया जाता था। अब का खईब सलाद हो अटल चाचा, पियजिया अनार हो गईल...। आज न केवल प्याज महंगी है बल्कि तमाम भोज्य पदार्थ महंगे हो चुके हैं। आज कोई नहीं कहता कि प्याज गरीबों के भोजन का अहम हिस्सा है। 20 रुपया किला प्याज, 40 किलो चीनी, 90 रुपया किलो अरहर की दाल और अन्य आवश्यक चीजों के दाम तो इस कांग्रेस की सरकार में ही बेहिसाब बढ़ रहे हैं। सरकार के मंत्री और रणनीतिकार हाथ खड़े कर चुके हैं। एक रटा रटाया सा जवाब आ जाता है कि जमाखोरी से महंगाई बढ़ रही है। मीडिया भी इसे तूल देने से बच रही है। क्या अटल सरकार के कार्यकाल में प्याज की जमाखोरी नहीं हुई थी। उस दौरान तो एक नीति के तहत जमाखोरी कराई गई थी। अटल सरकार के विरुद्ध मीडिया में माहौल पैदा कराया गया था। क्योंकि सरकार मीडिया के आकाओं को तृप्त नहीं कर पा रही थी।
आज एक औसत आमदनी का आम आदमी किसी तरह अपनी जिंदगी इस महंगाई के दौर में ढो रहा है। उसे बयां करना आसान नहीं है। लोगों को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ रहा है। हर जरूरतों में कटौती कर किसी तरह काम चलाने की नीति अपना कर लोग गुजारा करने पर मजबूर हैं। लेकिन, इसकी मीडिया संस्थानों को इसकी भनक नहीं है।
अटल सरकार की पैरोकारी करना अथवा बीजेपी की तरफदारी करना मेरा मकसद नहीं है। बीजेपी से मेरा दूर तक कुछ लेना देना नहीं है। और नही मीडिया को किसी पार्टी विशेष से जोड़ने का आशय है। लेकिन यह सच्चाई है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों की छोटी सी गलतियों को भी तिल का ताड़ बना कर पेश किया जाता है। मानों भाजपा की सरकारें देश की सबसे बड़ी शत्रु हैं। अभी दूर जाने की जरूरत नहीं है भाजपा का कर्नाटक संकट पर जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कवरेज किया उसे पत्रकारिता का उच्च मानदंड तो नहीं कहा जा सकता है। एक चैनल के संवाददाता (जो चैनल में राजनीतिक संपादक के पद पर हैं) जिनकी विशेषता है कि तीन वाक्य को दो शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, ने भाजपा संकट को कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस ने संकट को आंध्र में ही सुलझा लिया लेकिन भाजपा का कर्नाटक संकट दिल्ली तक पहुंचने के बाद भी नहीं सुलझ पा रहा है। अब आप बताएं दोनों पार्टियाँ एक तरह से ही कार्य करने लगें तो क्या होगा। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के निर्णय को बदलने की किसी में हिम्मत नहीं है। मतलब साफ है कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में ही आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। वहां सोनिया-राहुल के निर्णय को कोई चुनौती नहीं दे सकता यदि देता भी है तो उसे निश्चित तौर पर पार्टी से बाहर जाना होगा। वहीं भाजपा में कमोबेश अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। जिसका कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में संवाददाता का नजरिया कहां तक स्वस्थ है। आप किसी भी राजनीतिक पार्टी को दूसरे दल के नजरिये से नहीं देख सकते।
अटल सरकार की कई महत्वपूर्ण और जनकल्याणकारी योजनाओं का मीडिया द्वारा नजरअंदाज किया गया। यही नहीं प्रदेशों में भाजपा की सरकारों द्वारा किए जा रहे तमाम लोक कल्याणकारी कार्यों को महत्व नहीं मिल रहा है। गुजरात को ही लें वहां विकास के ढेरों कार्य कराए जा रहे हैं। लेकिन, उसकी चर्चा नहीं होती है। चर्चा जिस बात की होती है वह मोदी की नकारात्मक छवि की।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री ए राजा की स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के बाद भी मीडिया द्वारा ज्यादा तूल नहीं दिया गया। केंद्र सरकार कितनी चालाकी से मधु कोड़ा का मामला उठा कर अपने मंत्री के स्कैंडल को फिलहाल दबाने में कामयाब हो गई तो इसका श्रेय कांग्रेस परस्त कुछ मीडिया संस्थानों को ही जाता है।
एक उदात्त लोकतंत्र के लिए अदालतों और मीडिया का स्वतंत्र होना संजीवनी जैसा है। दुर्भाग्य से देश में इस समय कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस की केंद्र सरकार की पिछलग्गू मालूम पड़ते हैं। मीडिया संस्थानों को आर्थिक हितों के लिए पत्रकारिता के मानदंडों से समझौता नहीं करना चाहिए तभी भारत का लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सकेगा।
एक बार प्याज महंगी हुई तो भाजपा की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। आज ऐसा कोई भी खाद्यान्न या सब्जी नहीं है जिसे सस्ता कहा जा सके। लेकिन, कहीं भी उन दिनों की महंगी प्याज की तरह आज की महंगाई की चर्चा नहीं होती। मीडिया वाले भी कभी कभार महंगाई की खबर ब्रेक कर अपनी लोकतांत्रिक छवि का साक्ष्य पेश कर देते हैं। क्या आज की वही मीडिया है जब भाजपा सत्ता में थी तो महंगी प्याज पर हायतौबा मचा रही थी? या क्या इसे मान लेना चाहिए कि मौजूदा दौर की मीडिया संस्थानों में कांग्रेस नीत सरकार का विरोध करने अथवा किसी समस्या पर घेरने का मादा ही नहीं है। या उन दिनों भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए गहरी साजिश थी। जो भी हो आज मीडिया की भूमिका साफ सुथरी नहीं मानी जाएगी।
अटल जी के कार्यकाल में प्याज महंगी हो गई थी तो लोगों ने महंगाई पर जुमले और गाने तक बना डाले थे। उन दिनों यूपी और बिहार में एक गाना बड़ा गाया जाता था। अब का खईब सलाद हो अटल चाचा, पियजिया अनार हो गईल...। आज न केवल प्याज महंगी है बल्कि तमाम भोज्य पदार्थ महंगे हो चुके हैं। आज कोई नहीं कहता कि प्याज गरीबों के भोजन का अहम हिस्सा है। 20 रुपया किला प्याज, 40 किलो चीनी, 90 रुपया किलो अरहर की दाल और अन्य आवश्यक चीजों के दाम तो इस कांग्रेस की सरकार में ही बेहिसाब बढ़ रहे हैं। सरकार के मंत्री और रणनीतिकार हाथ खड़े कर चुके हैं। एक रटा रटाया सा जवाब आ जाता है कि जमाखोरी से महंगाई बढ़ रही है। मीडिया भी इसे तूल देने से बच रही है। क्या अटल सरकार के कार्यकाल में प्याज की जमाखोरी नहीं हुई थी। उस दौरान तो एक नीति के तहत जमाखोरी कराई गई थी। अटल सरकार के विरुद्ध मीडिया में माहौल पैदा कराया गया था। क्योंकि सरकार मीडिया के आकाओं को तृप्त नहीं कर पा रही थी।
आज एक औसत आमदनी का आम आदमी किसी तरह अपनी जिंदगी इस महंगाई के दौर में ढो रहा है। उसे बयां करना आसान नहीं है। लोगों को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ रहा है। हर जरूरतों में कटौती कर किसी तरह काम चलाने की नीति अपना कर लोग गुजारा करने पर मजबूर हैं। लेकिन, इसकी मीडिया संस्थानों को इसकी भनक नहीं है।
अटल सरकार की पैरोकारी करना अथवा बीजेपी की तरफदारी करना मेरा मकसद नहीं है। बीजेपी से मेरा दूर तक कुछ लेना देना नहीं है। और नही मीडिया को किसी पार्टी विशेष से जोड़ने का आशय है। लेकिन यह सच्चाई है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों की छोटी सी गलतियों को भी तिल का ताड़ बना कर पेश किया जाता है। मानों भाजपा की सरकारें देश की सबसे बड़ी शत्रु हैं। अभी दूर जाने की जरूरत नहीं है भाजपा का कर्नाटक संकट पर जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कवरेज किया उसे पत्रकारिता का उच्च मानदंड तो नहीं कहा जा सकता है। एक चैनल के संवाददाता (जो चैनल में राजनीतिक संपादक के पद पर हैं) जिनकी विशेषता है कि तीन वाक्य को दो शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, ने भाजपा संकट को कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस ने संकट को आंध्र में ही सुलझा लिया लेकिन भाजपा का कर्नाटक संकट दिल्ली तक पहुंचने के बाद भी नहीं सुलझ पा रहा है। अब आप बताएं दोनों पार्टियाँ एक तरह से ही कार्य करने लगें तो क्या होगा। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के निर्णय को बदलने की किसी में हिम्मत नहीं है। मतलब साफ है कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में ही आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। वहां सोनिया-राहुल के निर्णय को कोई चुनौती नहीं दे सकता यदि देता भी है तो उसे निश्चित तौर पर पार्टी से बाहर जाना होगा। वहीं भाजपा में कमोबेश अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। जिसका कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में संवाददाता का नजरिया कहां तक स्वस्थ है। आप किसी भी राजनीतिक पार्टी को दूसरे दल के नजरिये से नहीं देख सकते।
अटल सरकार की कई महत्वपूर्ण और जनकल्याणकारी योजनाओं का मीडिया द्वारा नजरअंदाज किया गया। यही नहीं प्रदेशों में भाजपा की सरकारों द्वारा किए जा रहे तमाम लोक कल्याणकारी कार्यों को महत्व नहीं मिल रहा है। गुजरात को ही लें वहां विकास के ढेरों कार्य कराए जा रहे हैं। लेकिन, उसकी चर्चा नहीं होती है। चर्चा जिस बात की होती है वह मोदी की नकारात्मक छवि की।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री ए राजा की स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के बाद भी मीडिया द्वारा ज्यादा तूल नहीं दिया गया। केंद्र सरकार कितनी चालाकी से मधु कोड़ा का मामला उठा कर अपने मंत्री के स्कैंडल को फिलहाल दबाने में कामयाब हो गई तो इसका श्रेय कांग्रेस परस्त कुछ मीडिया संस्थानों को ही जाता है।
एक उदात्त लोकतंत्र के लिए अदालतों और मीडिया का स्वतंत्र होना संजीवनी जैसा है। दुर्भाग्य से देश में इस समय कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस की केंद्र सरकार की पिछलग्गू मालूम पड़ते हैं। मीडिया संस्थानों को आर्थिक हितों के लिए पत्रकारिता के मानदंडों से समझौता नहीं करना चाहिए तभी भारत का लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सकेगा।
November 3, 2009
यह तो जेब काटने वाला कांग्रेसी हाथ है
डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर दिल्ली सरकार अपनी नाकामयाबी ढक रही है
दिल्ली सरकार ने डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर एक बार फिर आम आदमी की जेब ढीली कर दी है। कांग्रेसी बड़े गर्व से कहते हैं कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। लेकिन यह हाथ जनकल्याण के लिए नहीं लोगों की जेब काटने के लिए लगता है। यह कैसा हाथ है जो मध्यम वर्ग और गरीबों का केवल कान ही ऐंठने का काम करता है। यही नहीं अगले साल से दिल्ली में पेयजल भी महंगा हो जाएगा। दिल्ली मेट्रो ने पहले ही किराया बढ़ाकर जन हितैषी होने का प्रमाण दे दिया है। अब तो मदर डेयरी के दुग्ध के दाम भी बढ़ गए हैं। बिजली भी महंगी हो गई है। ऐसे में आम आदमी अपना सिर पीटने के अलावा और क्या करे। शीला दीक्षित को एक बार फिर से मौका देने वाले दिल्ली वालों को उनकी सरकार का विरोध करने का भी हक नहीं बनता। कांग्रेस के कार्यकाल में चारों तरफ महंगाई ही महंगाई है। हालांकि, भाजपा सहित विरोधी दल महंगाई और बसों के किराया बढ़ाने का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन, एक हताश और थके हुए विपक्ष की बात कितनी सुनी जाएगी यह अंदाजा लगाना कठिन नही है।
किराया बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उनके पास नोट छापने वाली मशीन नहीं है। क्या मुख्यमंत्री सरीखे शख्सियतों से यही उम्मीद की जा सकती है? यह ठीक है कि सरकार की अपनी कुछ परेशानियां होती हैं। लेकिन अपनी नाकामयाबियों को छुपाने के लिए आप गरीबों और आम आदमी का गिरेबां तो नहीं पकड़ लेंगे। हर मर्ज के लिए बली का बकरा जनता को ही तो नहीं बनाया जा सकता।
डीटीसी का घाटा किराया कम होने से नहीं हुआ है। बल्की निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुनियादी ढांचा का सही इस्तेमाल न होना है। डीटीसी में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार चरम पर है। दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्रालय और निगम की अदूरदर्शिता और लापरवाही से डीटीसी का दिवाला निकल गया है। अक्सर डीटीसी की बसें पीक ऑवर में भी डिपो से नहीं निकलती हैं। सुबह और शाम को ही डीटीसी की बसों को चलाया जाए तो कम से इतना घाटा तो नहीं होगा जितना प्रचारित किया जा रहा है। बसें चलती भी हैं तो चालक स्टैंडों पर बसें नहीं रोकते हैं। यदि रोक भी दें सवारियां भरने से पहले ही बसें भगा ले जाते हैं। यही नहीं डीटीसी के चालक बसों को ब्लू लाइन बसों के पीछे ले जाते हैं। ऐसे में सवारियां पहले ब्लू लाइन बसों में ही बैठ जाती हैं। दूसरे डीटीसी की बसों का कोई निर्धारित समय भी नहीं होता है कि लोग प्रतीक्षा कर सकें। पता चला कि आप बस की प्रतीक्षा ही करते रह गए और आपका समय बर्बाद हो गया और बस आई भी नहीं।
यही नहीं डीटीसी बसों के अधिकतर कंडक्टर एकदम से लालची होते हैं। चंद रुपयों के लिए उतरते वक्त सवारियों से टिकट ले लेते हैं और बाद में वही टिकट दूसरे यात्री को देकर पैसा अपने पास रख लेते हैं। अक्सर तो कम दूरी का टिकट भी नहीं देते हैं केवल पैसा ही ले लेते हैं। ऐसे में डीटीसी को घाटा नहीं तो क्या होगा?
डीटीसी के पास प्रशिक्षित चालकों और परिचालकों की भारी कमी है। जो कर्मचारी हैं भी तो दूसरे गैर जरूरी कामों में लगाए गए हैं। कर्मचारियों की कमी से भी बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पाती हैं। जिससे सभी बसों का इस्तेमाल नहीं हो पाता। कुछ देर के लिए डीटीसी का किराया बढ़ाना मजबूरी मान भी लिया जाए तो ब्लू लाइन बसों का किराया बढ़ाने का क्या तुक है। ब्लू लाइन कंडक्टर पहले से ही कम दूरी की निर्धारित किराया से अधिक वसूलते हैं। उनकी तो बैठे-बिठाये मौज हो गई।
दिल्ली सरकार ने डीटीसी बसों का किराया बढ़ाकर एक बार फिर आम आदमी की जेब ढीली कर दी है। कांग्रेसी बड़े गर्व से कहते हैं कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। लेकिन यह हाथ जनकल्याण के लिए नहीं लोगों की जेब काटने के लिए लगता है। यह कैसा हाथ है जो मध्यम वर्ग और गरीबों का केवल कान ही ऐंठने का काम करता है। यही नहीं अगले साल से दिल्ली में पेयजल भी महंगा हो जाएगा। दिल्ली मेट्रो ने पहले ही किराया बढ़ाकर जन हितैषी होने का प्रमाण दे दिया है। अब तो मदर डेयरी के दुग्ध के दाम भी बढ़ गए हैं। बिजली भी महंगी हो गई है। ऐसे में आम आदमी अपना सिर पीटने के अलावा और क्या करे। शीला दीक्षित को एक बार फिर से मौका देने वाले दिल्ली वालों को उनकी सरकार का विरोध करने का भी हक नहीं बनता। कांग्रेस के कार्यकाल में चारों तरफ महंगाई ही महंगाई है। हालांकि, भाजपा सहित विरोधी दल महंगाई और बसों के किराया बढ़ाने का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन, एक हताश और थके हुए विपक्ष की बात कितनी सुनी जाएगी यह अंदाजा लगाना कठिन नही है।
किराया बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उनके पास नोट छापने वाली मशीन नहीं है। क्या मुख्यमंत्री सरीखे शख्सियतों से यही उम्मीद की जा सकती है? यह ठीक है कि सरकार की अपनी कुछ परेशानियां होती हैं। लेकिन अपनी नाकामयाबियों को छुपाने के लिए आप गरीबों और आम आदमी का गिरेबां तो नहीं पकड़ लेंगे। हर मर्ज के लिए बली का बकरा जनता को ही तो नहीं बनाया जा सकता।
डीटीसी का घाटा किराया कम होने से नहीं हुआ है। बल्की निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुनियादी ढांचा का सही इस्तेमाल न होना है। डीटीसी में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार चरम पर है। दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्रालय और निगम की अदूरदर्शिता और लापरवाही से डीटीसी का दिवाला निकल गया है। अक्सर डीटीसी की बसें पीक ऑवर में भी डिपो से नहीं निकलती हैं। सुबह और शाम को ही डीटीसी की बसों को चलाया जाए तो कम से इतना घाटा तो नहीं होगा जितना प्रचारित किया जा रहा है। बसें चलती भी हैं तो चालक स्टैंडों पर बसें नहीं रोकते हैं। यदि रोक भी दें सवारियां भरने से पहले ही बसें भगा ले जाते हैं। यही नहीं डीटीसी के चालक बसों को ब्लू लाइन बसों के पीछे ले जाते हैं। ऐसे में सवारियां पहले ब्लू लाइन बसों में ही बैठ जाती हैं। दूसरे डीटीसी की बसों का कोई निर्धारित समय भी नहीं होता है कि लोग प्रतीक्षा कर सकें। पता चला कि आप बस की प्रतीक्षा ही करते रह गए और आपका समय बर्बाद हो गया और बस आई भी नहीं।
यही नहीं डीटीसी बसों के अधिकतर कंडक्टर एकदम से लालची होते हैं। चंद रुपयों के लिए उतरते वक्त सवारियों से टिकट ले लेते हैं और बाद में वही टिकट दूसरे यात्री को देकर पैसा अपने पास रख लेते हैं। अक्सर तो कम दूरी का टिकट भी नहीं देते हैं केवल पैसा ही ले लेते हैं। ऐसे में डीटीसी को घाटा नहीं तो क्या होगा?
डीटीसी के पास प्रशिक्षित चालकों और परिचालकों की भारी कमी है। जो कर्मचारी हैं भी तो दूसरे गैर जरूरी कामों में लगाए गए हैं। कर्मचारियों की कमी से भी बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पाती हैं। जिससे सभी बसों का इस्तेमाल नहीं हो पाता। कुछ देर के लिए डीटीसी का किराया बढ़ाना मजबूरी मान भी लिया जाए तो ब्लू लाइन बसों का किराया बढ़ाने का क्या तुक है। ब्लू लाइन कंडक्टर पहले से ही कम दूरी की निर्धारित किराया से अधिक वसूलते हैं। उनकी तो बैठे-बिठाये मौज हो गई।
October 25, 2009
यह कांग्रेस की जीत तो कतई नहीं है
विकल्पहीनता की स्थिति में जनता ने कांग्रेस को वोट दिया
तीन राज्यों की विधानसभा चुनाव में मिली जीत का श्रेय कांग्रेसियों और कुछ कांग्रेसप्रस्त मीडिया संस्थानों ने सोनिया और राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन को दिया है। जबकि, कुछ कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कुशल नीतियों को भी जीत का एक बड़ा कारण मानते हैं। वैसे, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत को एकदम से स्वीकार कर लेना पक्षपात होगा, क्योंकि, इन राज्यों में विपक्ष एकदम से दीशाहीनता और किंकर्तव्यबिमूढ़ता की स्थिति में रहा है। विपक्ष के पास जनता के भरोसे लायक कोई मुद्दा ही नहीं था। प्रचार अभियान के दौरान पार्टियों में आक्रामकता था ही नहीं। सभी दल थके और अवसादग्रस्त नजर आ रहे थे।
22 अक्टूबर को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे आ रहे थे वैसे-वैसे टीवी चैनलों के रिपोर्टर और चुनाव विश्लेषक अपने तरीके से जनता की भावनाओं का ब्याख्या कर रहे थे। कोई इसे कांग्रेस की नीतियों और स्थानीय कांग्रेसी सरकारों की जनकल्याणकारी कार्यों की जीत बता रहा था तो कोई देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के खात्मे की भविष्यवाणी कर रहा था। सबकी अपनी डफली अपना राग। मतलब सच्चाई से कोसों दूर।
तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों को देखा जाए तो निर्विवाद रूप से जनता ने कांग्रेस को विकल्पहीनता की अवस्था में ही वोट दिया है। जनता विपक्षी पार्टियों को भरोसे के लायक या कह कहना ज्यादा समीचीन जान पड़ता है कि जनता किसी भी विरोधी पार्टी को पांच साल तक सरकार चलाने लायक ही नहीं समझा। लोगों ने न तो सोनिया या राहुल की बातों को सुनकर वोट दिया और न ही प्रधानमंत्री के तथाकथित कुशल नेतृत्व को, बल्कि, जनता ने यह सोचकर कांग्रेस को वोट दिया कि अगले पांच सालों तक केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार रहेगी ऐसे में प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बनने पर प्रदेशवासियों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ जरूर मिलेगा।
इससे स्पष्ट होता है कि जनता अभी भी राहुल सोनिया को अपना नेता नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से महाराष्ट्र और हरियाणा में भी कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला होता। मतदाताओं ने कांग्रेसी नारा आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ की हवा निकाल दी। हालांकि, अरूणांचल प्रदेश में कांग्रेस को जनता ने जरूर हाथों-हाथ लिया है। इसका कारण मात्र विपक्ष की अनुपस्थिति ही थी। वहां पर टीमएसी और एनसीपी को तो कांग्रेस का पार्टनर ही माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों पाटिüयां केंद्र सरकार में साझीदार हैं। रही बात भाजपा की तो वहां पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। कुछ सीटें भाजपा को मिलना महज संयोग ही कहा जाएगा।
महाराष्ट्र और हरियाणा में अपने कार्यकाल में कांग्रेस की सरकारों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं तो उत्तरभारतियों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। पेयजल और बरसात में जलनिकासी की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई है। शहरी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो ग्रामीण इलाकों में लोगों की परेशानियां बढ़ी हैं। वहीं, हरियाणा में बिजली कटौती और पेयजल की किल्लत से लोगों का बुरा हाल है। हालात तो यह है कि प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था एकदम से चरमरा गई है। अर्थव्यवस्था का आधार कृषि के लिए राज्य सरकार ने कोई अलग से नीति घोषित नहीं की है। अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। यह अलग बात है कि भूपेंद्र ¨सह हुड्डा 40 साल में जैसा विकास नहीं हुआ वैसा विकास करने का दावा कर रहे हैं। जनता ने उनके इस दावे को पूरी तरह से नकार दी है।
दरअसल, इन प्रदेशों में विरोधी पार्टियाँ अपना प्रभाव जनता पर नहीं छोड़ पाईं हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष जनता में यह भरोसा ही पैदा नहीं कर पाया कि वह कांग्रेस से ज्यादे टिकाऊ और कल्याणकारी सरकार दे सकता है। विरोधी पार्टियाँ अपनों से ही निपटने की रणनीति बनाती रह गईं। संबंधित राज्य सरकारों की खामियों को जनता के सामने उम्दा तरीके से विपक्ष पेश नहीं कर सका। महाराष्ट्र में शिवसेना राजठाकरे से बाहर निकल ही नहीं पाई तो भाजपा उद्धव राज के झगड़े को ही देखती ही रह गई। भाजपा विपक्ष का तेवर दिखा पाने में नाकाम रही। सरकार की तमाम गलतियों को जोरदार तरीके से भाजपा गठबंधन उठा पाने में असफल रहा। हरियाणा में अंत तक भाजपा गठबंधन को लेकर ही द्वंद्व में रही। यदि वहां चौटाला या भजनलाल की पार्टी से गठबंधन किया गया होता तो निश्चित तौर पर यह गठबंधन कामयाब रहता।
बहरहाल, जिस तरह से देश में कांग्रेस को सर्वमान्य पार्टी और सोनिया-राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता बनाने की कुछ मीडिया घरानों द्वारा माहौल तैयार किया जा रहा है। वह लोकतंत्र के लिए खतरनारक है। एक परिपक्व और स्थाई लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना बेहद जरूरी है। विपक्ष सरकार की गलत नीतियों को उठाकर जन कल्याण के लिए योजनाएं बनाने के लिए सरकार को बाध्य कर सकता है। लेकिन, दुर्भाग्य से इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी अंतर्कलह से गुजर रही है। देश की जनता भाजपा से यह उम्मीद करती है कि वह एक दमदार और आक्रामक विपक्ष के रूप में फिर से खड़ा हो।
तीन राज्यों की विधानसभा चुनाव में मिली जीत का श्रेय कांग्रेसियों और कुछ कांग्रेसप्रस्त मीडिया संस्थानों ने सोनिया और राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन को दिया है। जबकि, कुछ कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कुशल नीतियों को भी जीत का एक बड़ा कारण मानते हैं। वैसे, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत को एकदम से स्वीकार कर लेना पक्षपात होगा, क्योंकि, इन राज्यों में विपक्ष एकदम से दीशाहीनता और किंकर्तव्यबिमूढ़ता की स्थिति में रहा है। विपक्ष के पास जनता के भरोसे लायक कोई मुद्दा ही नहीं था। प्रचार अभियान के दौरान पार्टियों में आक्रामकता था ही नहीं। सभी दल थके और अवसादग्रस्त नजर आ रहे थे।
22 अक्टूबर को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे आ रहे थे वैसे-वैसे टीवी चैनलों के रिपोर्टर और चुनाव विश्लेषक अपने तरीके से जनता की भावनाओं का ब्याख्या कर रहे थे। कोई इसे कांग्रेस की नीतियों और स्थानीय कांग्रेसी सरकारों की जनकल्याणकारी कार्यों की जीत बता रहा था तो कोई देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के खात्मे की भविष्यवाणी कर रहा था। सबकी अपनी डफली अपना राग। मतलब सच्चाई से कोसों दूर।
तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों को देखा जाए तो निर्विवाद रूप से जनता ने कांग्रेस को विकल्पहीनता की अवस्था में ही वोट दिया है। जनता विपक्षी पार्टियों को भरोसे के लायक या कह कहना ज्यादा समीचीन जान पड़ता है कि जनता किसी भी विरोधी पार्टी को पांच साल तक सरकार चलाने लायक ही नहीं समझा। लोगों ने न तो सोनिया या राहुल की बातों को सुनकर वोट दिया और न ही प्रधानमंत्री के तथाकथित कुशल नेतृत्व को, बल्कि, जनता ने यह सोचकर कांग्रेस को वोट दिया कि अगले पांच सालों तक केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार रहेगी ऐसे में प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बनने पर प्रदेशवासियों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ जरूर मिलेगा।
इससे स्पष्ट होता है कि जनता अभी भी राहुल सोनिया को अपना नेता नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से महाराष्ट्र और हरियाणा में भी कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला होता। मतदाताओं ने कांग्रेसी नारा आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ की हवा निकाल दी। हालांकि, अरूणांचल प्रदेश में कांग्रेस को जनता ने जरूर हाथों-हाथ लिया है। इसका कारण मात्र विपक्ष की अनुपस्थिति ही थी। वहां पर टीमएसी और एनसीपी को तो कांग्रेस का पार्टनर ही माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों पाटिüयां केंद्र सरकार में साझीदार हैं। रही बात भाजपा की तो वहां पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। कुछ सीटें भाजपा को मिलना महज संयोग ही कहा जाएगा।
महाराष्ट्र और हरियाणा में अपने कार्यकाल में कांग्रेस की सरकारों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं तो उत्तरभारतियों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। पेयजल और बरसात में जलनिकासी की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई है। शहरी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो ग्रामीण इलाकों में लोगों की परेशानियां बढ़ी हैं। वहीं, हरियाणा में बिजली कटौती और पेयजल की किल्लत से लोगों का बुरा हाल है। हालात तो यह है कि प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था एकदम से चरमरा गई है। अर्थव्यवस्था का आधार कृषि के लिए राज्य सरकार ने कोई अलग से नीति घोषित नहीं की है। अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। यह अलग बात है कि भूपेंद्र ¨सह हुड्डा 40 साल में जैसा विकास नहीं हुआ वैसा विकास करने का दावा कर रहे हैं। जनता ने उनके इस दावे को पूरी तरह से नकार दी है।
दरअसल, इन प्रदेशों में विरोधी पार्टियाँ अपना प्रभाव जनता पर नहीं छोड़ पाईं हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष जनता में यह भरोसा ही पैदा नहीं कर पाया कि वह कांग्रेस से ज्यादे टिकाऊ और कल्याणकारी सरकार दे सकता है। विरोधी पार्टियाँ अपनों से ही निपटने की रणनीति बनाती रह गईं। संबंधित राज्य सरकारों की खामियों को जनता के सामने उम्दा तरीके से विपक्ष पेश नहीं कर सका। महाराष्ट्र में शिवसेना राजठाकरे से बाहर निकल ही नहीं पाई तो भाजपा उद्धव राज के झगड़े को ही देखती ही रह गई। भाजपा विपक्ष का तेवर दिखा पाने में नाकाम रही। सरकार की तमाम गलतियों को जोरदार तरीके से भाजपा गठबंधन उठा पाने में असफल रहा। हरियाणा में अंत तक भाजपा गठबंधन को लेकर ही द्वंद्व में रही। यदि वहां चौटाला या भजनलाल की पार्टी से गठबंधन किया गया होता तो निश्चित तौर पर यह गठबंधन कामयाब रहता।
बहरहाल, जिस तरह से देश में कांग्रेस को सर्वमान्य पार्टी और सोनिया-राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता बनाने की कुछ मीडिया घरानों द्वारा माहौल तैयार किया जा रहा है। वह लोकतंत्र के लिए खतरनारक है। एक परिपक्व और स्थाई लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना बेहद जरूरी है। विपक्ष सरकार की गलत नीतियों को उठाकर जन कल्याण के लिए योजनाएं बनाने के लिए सरकार को बाध्य कर सकता है। लेकिन, दुर्भाग्य से इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी अंतर्कलह से गुजर रही है। देश की जनता भाजपा से यह उम्मीद करती है कि वह एक दमदार और आक्रामक विपक्ष के रूप में फिर से खड़ा हो।
October 14, 2009
चीन को उसी के लहजे में जवाब देना होगा
ड्रैगन को ललकारे भारत
लगता है अब चीन भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य महत्वपूर्ण शख्सियतों का दौरा निर्धारित करेगा कि उन्हें अपने देश में कहां भ्रमण करना चाहिए और कहां नहीं। चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री द्वारा अरुणांचल प्रदेश का दौरा करने पर चीन ने जिस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त किया है वह संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के अखंडता पर सीधा चोट है। भारत को केवल गहरी नाराजगी जता कर ही संतोष नहीं कर लेना चाहिए। भारत जब तक कठोरता से और दोटूक जवाब नहीं देगा तब तक चीन इस तरह की ओछी हरकतें करता रहेगा। हालांकि, चीन के राजदूत को तलब किया गया है जो केवल रश्म अदायगी भर ही लगता है।
चीन की दुस्साहस अब हद से आगे बढ़ने लगी है। यदि भारत इसी तरह से रश्म अदायगी के लिए क्वगहरी नाराजगी जताता रहा तो चीन कल को उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत को विवादित जोन बताते हुए उस पर अपना हक जताने लगेगा। भारत का शीर्ष नेतृत्व सिर्फ नाराजगी जता कर ही रह जाएगा।
इस मामले में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का यह कहना कि चीन इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है, महज अपनी कमजोरी या दब्बूपन दिखाना है। चीन द्वारा कब्जा की गई जमीन को जब तक लेने के लिए कूटनीतिक प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक ऐसी हरकतें पड़ोसी देश करता रहेगा। अरुणांचल प्रदेश भारत का है उसके लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। वैसे भी अरुणांचल को हमारे प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में सूर्य का देश माना गया है। ऐसे में कोई कैसे कह देगा वह भारत का नहीं विवादित क्षेत्र है।
दरअसल, कुछ विदेशी ताकतों का यह षड्यंत्र है कि भारत को चौतरफा उलझा कर रखा जाए। यही वजह है कि नेपाल में भी माओवादियों की नेतृत्व वाली सरकार भारत को आंख तरेर रही थी। यदि भारत अपने पर आ जाए तो नेपाल का दाना-पानी भी बंद हो जाएगा। हालांकि, देश का नेतृत्व इस बात को समझता तो है लेकिन गंभीरता दिखाने में कोताही बरतता है। इससे काम नहीं चलने वाला है।
दूसरी तरफ चीन भारत पर टिप्पणी कर पूरे एशिया का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि, रूस को छोड़ दिया (रूस यूरेशिया के अंतर्गत आता है) जाए तो केवल भारत ही चीन को जवाब दे सकने की स्थिति में है। ऐसे में चीन के लिए यह जरूरी है कि भारत को फुफकारता रहे। यदि भारत सख्ती से ड्रैगन को ललकारे तो वह अपनी मांद में ही रहने को बाध्य हो जाएगा। चीन को अभी भी मुगालता है कि भारत की सैन्य क्षमता कम है। बेशक, चीन से ज्यादा नहीं तो किसी भी मामले में
(कुछ अपवाद को छोड़कर) भारतीय रक्षा प्रणाली कमतर नहीं है। आज भारत हर मामले में चीन के बराबरी पर है। आईटी सेक्टर में तो भारत चीन से कई गुना आगे है। और यही बात चीन को चुभती है। इसी लिए वह पाकिस्तान और भारत विरोधी तत्वों को आगे कर परोक्ष वार कर रहा है।
वैसे जिस तरह से सभी पार्टियाँ चीन की रवैये पर आक्रोश व्यक्त कर रही हैं। वह सुखद लगता है। केवल वाम दलों को लगता है कि अमेरिका भारत को चीन से लड़वाना चाहता है। यह उनकी चीन भक्ति का सबूत ही है। भारत में रह कर चीन की तरफदारी करने वाले वामपंथियों को अब सबक सिखाने का वक्त आ गया है। दरअसल, वामदलों को कभी भारतीयता पर विश्वास ही नहीं रहा, जनता इस बात को जितना जल्द समझ ले उतना ही देश के लिए अच्छा होगा।
दूसरी तरफ अब समय आ गया है कि भारत अपने विदेश नीति को दमदार और धारदार बनाए ताकि कोई अन्य देश आंख तरेरने की हिमाकत न कर पाए। लचीलेपन और दब्बूपन के चलते कभी-कभी कभार बांग्लादेश भी भारत को आंख दिखाने से बाज नहीं आ रहा है।
भारत को अपना पक्ष विश्व समुदाय के समक्ष काफी मजबूती से रखना होगा और यह बताना पड़ेगा कि भारत केवल शांति का ही पुजारी नहीं है वह गीता में भगवान कृष्ण के उस उपदेश का भी पालन करता है जिसमें उन्होंने कहा है कि, अर्जुन! यदि आप पर या आपके परिवार पर कोई आक्रमण करता है तो उसका जवाब देना धर्म के अनुकूल है।
भारत ने अब बहुत सहन कर लिया अब अधिक चुप रहना कमजोरी दर्शाना होगा। वैसे भी चीन क्या दुनिया का कोई भी देश भारत पर आक्रमण करने की मुर्खता नहीं करेगा। क्योंकि भारत के पास अब आत्मरक्षा करने और मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पर्याप्त क्षमता है। आवश्यकता है तो सिर्फ हमारे कमजोर नेतृत्व को आक्रामक और मजबूत होने का, और इसे हर देशवासी सिद्दत से इंतजार कर रहा है........
October 4, 2009
उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की....
उन्हें तलाश है एक अदद प्रेम+इका की। हालांकि, वह शादीशुदा हैं और पिता भी बन चुके हैं, लेकिन अभी भी उनकी प्रेम पिपासा शांत नहीं हुई है, अलबत्ता दिन प्रति बढ़ती ही जा रही है। हर मामले में उनका अपना नजरिया है। इस मामले में भी वह अपने को सही ठहराते हैं। फिलवक्त वह मीडिया के क्षेत्र में अच्छी तरह से स्थापित हो चुके हैं।
वह मेरे आदरणीय मित्र और संबंधी हैं। मैं अबतक के कैरियर में जिन लोगों का सम्मान करता हूं वह उन सब में सबसे ऊपर हैं। उनके विजन पर ही मैं दो साल पहले दिल्ली आया था। फिलहाल, आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा हूं और मुझे विश्वास है कि मेरी कामयाबी में उनका बहुत बड़ा योगदान होगा।
उनकी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आप को कभी ना नहीं करेंगे। यही नहीं वह मौके पर आपको अपनी बातों से खुश कर देंगे बाद में आप भले ही उनकी बातों से सहमत न हों। वह ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे आप नाराजं हो सकते हैं, खुश हो सकते हैं लेकिन कभी उदासीन नहीं हो सकते। उनको झूठ बोलने से परहेज तो नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं कि किसी का कोई नुकसान हो जाए।
उनकी पत्नी सुशिक्षित और संस्कारों वाली हैं। वह मुझे हमेशा परिवार को साथ लेकर चलने का सुझाव देती हैं उनका कहना है कि आदमी पूरे परिवार के आशीर्वाद से ही आगे बढ़ सकता है।
अब हम आते हैं असल मुद्दे पर पिछले दिन मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे कहा कि एक अदद प्रेमिका की उनकी तलाश पूरी नहीं हुई है। मैने जब कहा कि शादी के बाद प्रेम-ब्रेम या प्रेमिका के चक्कर में पड़ना ठीक नहीं है। तब उनका कहना था कि विश्व में जितने भी महान लोग हुए हैं उनके पीछे प्रेमिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसे में प्रेमिकाओं और प्रेम का होना कैरियर के लिहाज से बेहद जरूरी है। मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में बहुत ज्यादा दम है। यह भी संभव है कि बहुत सारे लोग उनसे सहमत हों।
अब ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्हें किस तरह का प्रेम चाहिए। कॉलेज या स्कूलों में पढ़ने वाले टीनएजेर्स का या चीनी कम वाले नायकं का। यह तो वही बताएंगे। लेकिन, मुझे नहीं लगता है कि उन्हें चीनी कम वाले नायक सा प्रेम और प्रेमिका चाहिए। आपको क्या लगता है जरूर बताएं.......।
September 21, 2009
पोखरण-दो पर संदेह कहीं कुंठा तो नहीं!
राष्ट्र की छवि धूमिल करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए
आजकल किसी भी बात को मीडिया में उछालने का नया ट्रेंड चल निकला है। लोग किसी भी मामले को सरेआम करने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं कर रहे हैं। भले ही वह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा स्वाभिमान से ही क्यों न जुड़ा हो। इस मुहिम में अपने को अभिजात और बौद्धिक वर्ग से कहने वाले लोगों की तादाद कुछ ज्यादा ही है।
इन दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा, गौरव और अभिमान से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला परमाणु परीक्षण मीडिया और कुछ वैज्ञानिकों के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। जो आम देश वासियों के लिए तो स्वाभिमान का विषय है, लेकिन जिन वैज्ञानिकों पर सरकार ने लाखों रुपये खर्च किया उनके लिए यह झूठ और धोखे से ज्यादा कुछ नहीं है।
कुछ वैज्ञानिकों की मांग है कि इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मेरी मांग है कि जांच आयोग इसके लिए नहीं बैठाया जाना चाहिए कि 1998 का परमाणु परीक्षण सफल रहा या नहीं बल्कि इस मुद्दे को उछालने वालों की मंशा की जांच होनी चाहिए। इसके पीछे वे लोग क्या साबित करना चाहते हैं। कहीं अटल सरकार को कटघरे में खड़ा करने की साजिश तो नहीं है (हालांकि, इसकी संभावना कम ही दिखती है, क्योंकि प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी इस बहस को अनावश्यक बताया है।) अथवा भारतीय प्रतिभा को अतंराराष्ट्रीय समुदाय में नीचा दिखाने की गहरी और सोची-समझी चाल या फिर कुंठा!
1998 में जब अटल जी की सरकार ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों को दरकिनार कर पोखरण में परमाणु परीक्षण कराया था उस समय पूरे देश को इस पर गर्व हुआ था कि हमारे वैज्ञानिक भी कम प्रतिभावान नहीं हैं। हालांकि, उस समय भी देश-विदेश के कुछ लोगों को तकलीफ हुई थी कि भारत कैसे परमाणु संपन्नता में एक और कदम आगे बढ़ा लिया।
1998 का परमाणु परीक्षण अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मानकों पर खरा उतरा या नहीं इसे तो वैज्ञानिक समुदाय ही बता सकता है। साधारण लोगों को इस बारे में कम जानकारी है। हालांकि, परमाणु ऊर्जा आयोग और वैज्ञानिकों ने इसे पूरी तरह सफल बताया है। मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने एक टीवी चैनल के साथ साक्षात्कार में इसे अनावश्यक बहस बताते हुए परीक्षण को सफल करार दिया है। यहीं नहीं, पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइलमैन एपीजे कलाम ने भी परमाणु परीक्षण को पूरी तरह से सफल बताया है। ऐसे में डीआरडीओ के पूर्व अधिकारी के.संथानम की बातों को ज्यादा महत्व देने की कोई वजह नहीं है।
सवाल यह भी उठता है कि परीक्षण के एक दशक बाद इसकी कामयाबी पर संदेह व्यक्त करना किस बात का संकेत है। के.संथानम अबतक कहां थे? उन्हें लगता है कि पोखरण-2 देश की सामरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता तो उन्हें पहले ही अपना मत प्रकट करना चाहिए था। अब जबकि, लगभग विश्व समुदाय भी पोखरण-2 दो को मान्यता दे चुका है। ऐसे में अपने ही देश में परीक्षण पर संदेह व्यक्त करना शर्मनाक है। संथानम मीडिया के जरिए कहीं हाईलाइट होने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं। क्योंकि, इस प्रकरण से पहले तक तो उनका नाम भी बहुत कम लोग ही जानते थे।
कुछ मामले और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर बहस होनी ही नहीं चाहिए। कल को कोई कहने लगे कि भारत ने जितनी भी मिसाइलों का परीक्षण किया है उनकी क्षमता कम है तो क्या इसे मान लिया जाएगा? ऐसे में तो हमारी सुरक्षा ही कमजोर होगी। परमाणु परीक्षण और सुरक्षा से संबंधित गोपनीयताओं पर तो बिल्कुल ही बहस की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि, इससे राष्ट्र की छवि तो प्रभावित होती ही है शत्रु देशों को मुगालता भी होने लगती है। पोखरण-2 की कामयाबी पर संदेह व्यक्त करना सीधे-सीधे वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करने की कोशिश है। इससे वैज्ञानिकों के मनोबल पर विपरीत असर पड़ सकता है। हालांकि, हमारे वैज्ञानिक चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं। उन पर असर नहीं होने वाला है।
लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने की आजादी है। लेकिन, अपने देश में इस आजादी का कुछ लोग बेजा इस्तेमाल करते हैं। वैसे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से देश की प्रतिष्ठा धूमिल होती है तो इस पर सरकार को भी कड़े कदम उठाने चाहिए। मीडिया को भी किसी भी मुद्दे को उछालने से पहले राष्ट्रीयता को प्राथमिकता देनी चाहिए। ग्लोबल मीडिया बनने की चाहत से पहले आप भारतीय मीडिया कहलाना पसंद करें। अमेरिका और ब्रिटेन की मीडिया संसथान भी तो राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करते।
आजकल किसी भी बात को मीडिया में उछालने का नया ट्रेंड चल निकला है। लोग किसी भी मामले को सरेआम करने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं कर रहे हैं। भले ही वह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा स्वाभिमान से ही क्यों न जुड़ा हो। इस मुहिम में अपने को अभिजात और बौद्धिक वर्ग से कहने वाले लोगों की तादाद कुछ ज्यादा ही है।
इन दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा, गौरव और अभिमान से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला परमाणु परीक्षण मीडिया और कुछ वैज्ञानिकों के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। जो आम देश वासियों के लिए तो स्वाभिमान का विषय है, लेकिन जिन वैज्ञानिकों पर सरकार ने लाखों रुपये खर्च किया उनके लिए यह झूठ और धोखे से ज्यादा कुछ नहीं है।
कुछ वैज्ञानिकों की मांग है कि इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मेरी मांग है कि जांच आयोग इसके लिए नहीं बैठाया जाना चाहिए कि 1998 का परमाणु परीक्षण सफल रहा या नहीं बल्कि इस मुद्दे को उछालने वालों की मंशा की जांच होनी चाहिए। इसके पीछे वे लोग क्या साबित करना चाहते हैं। कहीं अटल सरकार को कटघरे में खड़ा करने की साजिश तो नहीं है (हालांकि, इसकी संभावना कम ही दिखती है, क्योंकि प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी इस बहस को अनावश्यक बताया है।) अथवा भारतीय प्रतिभा को अतंराराष्ट्रीय समुदाय में नीचा दिखाने की गहरी और सोची-समझी चाल या फिर कुंठा!
1998 में जब अटल जी की सरकार ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों को दरकिनार कर पोखरण में परमाणु परीक्षण कराया था उस समय पूरे देश को इस पर गर्व हुआ था कि हमारे वैज्ञानिक भी कम प्रतिभावान नहीं हैं। हालांकि, उस समय भी देश-विदेश के कुछ लोगों को तकलीफ हुई थी कि भारत कैसे परमाणु संपन्नता में एक और कदम आगे बढ़ा लिया।
1998 का परमाणु परीक्षण अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मानकों पर खरा उतरा या नहीं इसे तो वैज्ञानिक समुदाय ही बता सकता है। साधारण लोगों को इस बारे में कम जानकारी है। हालांकि, परमाणु ऊर्जा आयोग और वैज्ञानिकों ने इसे पूरी तरह सफल बताया है। मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने एक टीवी चैनल के साथ साक्षात्कार में इसे अनावश्यक बहस बताते हुए परीक्षण को सफल करार दिया है। यहीं नहीं, पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइलमैन एपीजे कलाम ने भी परमाणु परीक्षण को पूरी तरह से सफल बताया है। ऐसे में डीआरडीओ के पूर्व अधिकारी के.संथानम की बातों को ज्यादा महत्व देने की कोई वजह नहीं है।
सवाल यह भी उठता है कि परीक्षण के एक दशक बाद इसकी कामयाबी पर संदेह व्यक्त करना किस बात का संकेत है। के.संथानम अबतक कहां थे? उन्हें लगता है कि पोखरण-2 देश की सामरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता तो उन्हें पहले ही अपना मत प्रकट करना चाहिए था। अब जबकि, लगभग विश्व समुदाय भी पोखरण-2 दो को मान्यता दे चुका है। ऐसे में अपने ही देश में परीक्षण पर संदेह व्यक्त करना शर्मनाक है। संथानम मीडिया के जरिए कहीं हाईलाइट होने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं। क्योंकि, इस प्रकरण से पहले तक तो उनका नाम भी बहुत कम लोग ही जानते थे।
कुछ मामले और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर बहस होनी ही नहीं चाहिए। कल को कोई कहने लगे कि भारत ने जितनी भी मिसाइलों का परीक्षण किया है उनकी क्षमता कम है तो क्या इसे मान लिया जाएगा? ऐसे में तो हमारी सुरक्षा ही कमजोर होगी। परमाणु परीक्षण और सुरक्षा से संबंधित गोपनीयताओं पर तो बिल्कुल ही बहस की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि, इससे राष्ट्र की छवि तो प्रभावित होती ही है शत्रु देशों को मुगालता भी होने लगती है। पोखरण-2 की कामयाबी पर संदेह व्यक्त करना सीधे-सीधे वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करने की कोशिश है। इससे वैज्ञानिकों के मनोबल पर विपरीत असर पड़ सकता है। हालांकि, हमारे वैज्ञानिक चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं। उन पर असर नहीं होने वाला है।
लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने की आजादी है। लेकिन, अपने देश में इस आजादी का कुछ लोग बेजा इस्तेमाल करते हैं। वैसे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से देश की प्रतिष्ठा धूमिल होती है तो इस पर सरकार को भी कड़े कदम उठाने चाहिए। मीडिया को भी किसी भी मुद्दे को उछालने से पहले राष्ट्रीयता को प्राथमिकता देनी चाहिए। ग्लोबल मीडिया बनने की चाहत से पहले आप भारतीय मीडिया कहलाना पसंद करें। अमेरिका और ब्रिटेन की मीडिया संसथान भी तो राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करते।
September 16, 2009
आदतों में शुमार हो चुकी है सुस्त कार्य संस्कृति
कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी धीमी, शाख पर लग रहा बट्टा
लगता है सुस्त कार्य संस्कृति हम भारतवासियों के संस्कारों में रच बस गई है। कोई भी कार्य समय पर पूरा न करने की मानों हमारी आदत सी बन गई है। कुछेक लोग और संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांशतया विलंब की संस्कृति हावी दिखती है। अगर बात सरकारी योजनाओं की हो तो अधिकारी और कर्मचारी जानबूझकर विलंब करने और उसमें अनावश्यक अड़ंगा लगाने की अपनी आदतों से बाज नहीं आते हैं। पता नहीं क्यों लोगों में टालू आदतें गहराई तक जड़ जमा चुकी हैं। बात हम राष्ट्रमंडल खेलों की कर रहे हैं। जिसके आयोजन में महज 381 दिन ही शेष रह गए हैं। तैयारी अभी भी तय लक्ष्य से काफी पीछे है।
राष्ट्रीय गौरव और अभिमान से जुड़े मामलों में भी हम कितना लापरवाह और उदासीन हैं। इसका ताजा उदाहरण कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी है। विभिन्न खेलों के आयोजन की तैयारियों पर नजर डाली जाए तो आज की तारीख में हमारा देश सफल आयोजन में सक्षम नहीं है। यह शर्मनाक तब और हो जाता है जब कोई विदेशी तैयारियों की धीमी चाल पर चिंता जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने का आग्रह करता है। राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फनेल भारत में राष्ट्रमंडल आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी को चिट्ठी लिखकर यह कहने को बाध्य होते हैं कि अब सिर्फ आपके प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से ही खेलों की पूरी तैयारी संभव है।
फनेल की चिट्ठी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उनकी चिंताओं में हमारी टालू संस्कृति और किसी भी मामले को लंबा खींचने की आदतों का अक्स दिखता है। इससे तो हमारी शाख पर ही बट्टा लगने का खतरा पैदा हो गया है। यह विडंबना ही है कि फनेल की चिट्ठी के बाद आयोजन से जुड़े लोगों को यह बात समझ में आई कि खेलों से जुड़े प्रोजेक्ट काफी पीछे हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी कहना पड़ा कि तैयारी को लेकर नर्वस जरूर हूं लेकिन काम समय पर पूरा होंगे। चिट्ठी प्रकरण से पहले वह भी दावा कर रहीं थीं कि तैयारी पूरी तरह से नियंत्रण में है।
आयोजन से जुड़ा ( संभवतः) ऐसा कोई भी प्रोजेक्ट नहीं है जिसको पचास फीसदी पूरा कर लिए जाने का दावा किया जा सके। हर प्रोजेक्ट अपने निर्धारित लक्ष्य से पीछे चल रहा है। चाहे वह खिलारियों से जुड़ा प्रोजेक्ट हो या खेलों के दौरान आने वाले विदेशी पर्यटकों को राजधानी की उम्दा छवि पेश करने से जुड़ा प्रोजेक्ट। सब पर हमारी क्षुब्ध कर देने वाली विलंब की संस्कृति हावी है। न तो अभी स्टेडियम ही ठीक हो पाएं हैं और नहीं पर्यटकों को ठहराने के लिए गेस्ट हाऊस ही तैयार हो पाएं हैं।
दूसरी तरफ, अभी जिन खेलों का आयोजन होना है उनमें भाग लेने वाले खिलारियों को भी तैयारी करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराया गया है। जो संसाधन उनके पास हैं भी वह स्तरीय नहीं कहे जा सकते। ऐसे में हम खिलाçड़यों से पदक की कैसे उम्मीद कर सकते हैं? यदि आज चीन खेलों में उम्दा प्रदर्शन कर रहा है तो उसके को मिलने वाली सुविधाएं भी उम्दा हैं। भारत के पास संसाधनों की कमी नहीं है लेकिन भ्रष्टाचार सही इस्तेमाल नहीं करने देता।
केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है। खासकर दोनों जगह कांग्रेसी अपने कार्यों के बल पर कमबैकं करने का दावा कर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेलों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो राजधानी को पेरिस बनाने की घोषणा कर चुकी हैं। इसी तरह से चलता रहा तो पेरिस तो दूर हम दिल्ली को देश का भी बेहतरीन शहर नहीं बना पाएंगे। दोनों सरकारों को अपनी जिम्मेदारियों और कमियों को खुले मन से स्वीकार करना होगा।
दरअसल, राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों की सहभागिता है। दोनों जगह अधिकारियों की समय पर समन्वय न बन पाना आयोजन की तैयारियों को धीमा कर दिया। यदि दोनों सरकारों के अधिकारी इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान और अपनी जिम्मेदारी से जोड़कर लेते तो शायद इतना विलंब नहीं होता और एक विदेशी को चिंता जाहिर करने का मौका नहीं मिलता।
राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन से विश्व में हमारे देश की एक अलग छवि बनेगी। आज जो विदेशी भारत को सांप-सपेरों का देश मानते हैं उन्हें भारत की उदात्त छवि देखने को मिलेगी। वह जान सकेंगे कि भारत कितनी तेजी से विकास कर रहा है। यह तभी संभव है जब एक वर्ष में खेलों से जुड़े सभी प्रोजेक्ट को तीव्र गति से पूरा कर लिया जाए। इनमें कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो आधुनिक भारतवर्ष की छवि पेश करेंगे।
लगता है सुस्त कार्य संस्कृति हम भारतवासियों के संस्कारों में रच बस गई है। कोई भी कार्य समय पर पूरा न करने की मानों हमारी आदत सी बन गई है। कुछेक लोग और संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांशतया विलंब की संस्कृति हावी दिखती है। अगर बात सरकारी योजनाओं की हो तो अधिकारी और कर्मचारी जानबूझकर विलंब करने और उसमें अनावश्यक अड़ंगा लगाने की अपनी आदतों से बाज नहीं आते हैं। पता नहीं क्यों लोगों में टालू आदतें गहराई तक जड़ जमा चुकी हैं। बात हम राष्ट्रमंडल खेलों की कर रहे हैं। जिसके आयोजन में महज 381 दिन ही शेष रह गए हैं। तैयारी अभी भी तय लक्ष्य से काफी पीछे है।
राष्ट्रीय गौरव और अभिमान से जुड़े मामलों में भी हम कितना लापरवाह और उदासीन हैं। इसका ताजा उदाहरण कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी है। विभिन्न खेलों के आयोजन की तैयारियों पर नजर डाली जाए तो आज की तारीख में हमारा देश सफल आयोजन में सक्षम नहीं है। यह शर्मनाक तब और हो जाता है जब कोई विदेशी तैयारियों की धीमी चाल पर चिंता जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने का आग्रह करता है। राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फनेल भारत में राष्ट्रमंडल आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी को चिट्ठी लिखकर यह कहने को बाध्य होते हैं कि अब सिर्फ आपके प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से ही खेलों की पूरी तैयारी संभव है।
फनेल की चिट्ठी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उनकी चिंताओं में हमारी टालू संस्कृति और किसी भी मामले को लंबा खींचने की आदतों का अक्स दिखता है। इससे तो हमारी शाख पर ही बट्टा लगने का खतरा पैदा हो गया है। यह विडंबना ही है कि फनेल की चिट्ठी के बाद आयोजन से जुड़े लोगों को यह बात समझ में आई कि खेलों से जुड़े प्रोजेक्ट काफी पीछे हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी कहना पड़ा कि तैयारी को लेकर नर्वस जरूर हूं लेकिन काम समय पर पूरा होंगे। चिट्ठी प्रकरण से पहले वह भी दावा कर रहीं थीं कि तैयारी पूरी तरह से नियंत्रण में है।
आयोजन से जुड़ा ( संभवतः) ऐसा कोई भी प्रोजेक्ट नहीं है जिसको पचास फीसदी पूरा कर लिए जाने का दावा किया जा सके। हर प्रोजेक्ट अपने निर्धारित लक्ष्य से पीछे चल रहा है। चाहे वह खिलारियों से जुड़ा प्रोजेक्ट हो या खेलों के दौरान आने वाले विदेशी पर्यटकों को राजधानी की उम्दा छवि पेश करने से जुड़ा प्रोजेक्ट। सब पर हमारी क्षुब्ध कर देने वाली विलंब की संस्कृति हावी है। न तो अभी स्टेडियम ही ठीक हो पाएं हैं और नहीं पर्यटकों को ठहराने के लिए गेस्ट हाऊस ही तैयार हो पाएं हैं।
दूसरी तरफ, अभी जिन खेलों का आयोजन होना है उनमें भाग लेने वाले खिलारियों को भी तैयारी करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराया गया है। जो संसाधन उनके पास हैं भी वह स्तरीय नहीं कहे जा सकते। ऐसे में हम खिलाçड़यों से पदक की कैसे उम्मीद कर सकते हैं? यदि आज चीन खेलों में उम्दा प्रदर्शन कर रहा है तो उसके को मिलने वाली सुविधाएं भी उम्दा हैं। भारत के पास संसाधनों की कमी नहीं है लेकिन भ्रष्टाचार सही इस्तेमाल नहीं करने देता।
केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है। खासकर दोनों जगह कांग्रेसी अपने कार्यों के बल पर कमबैकं करने का दावा कर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेलों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो राजधानी को पेरिस बनाने की घोषणा कर चुकी हैं। इसी तरह से चलता रहा तो पेरिस तो दूर हम दिल्ली को देश का भी बेहतरीन शहर नहीं बना पाएंगे। दोनों सरकारों को अपनी जिम्मेदारियों और कमियों को खुले मन से स्वीकार करना होगा।
दरअसल, राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों की सहभागिता है। दोनों जगह अधिकारियों की समय पर समन्वय न बन पाना आयोजन की तैयारियों को धीमा कर दिया। यदि दोनों सरकारों के अधिकारी इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान और अपनी जिम्मेदारी से जोड़कर लेते तो शायद इतना विलंब नहीं होता और एक विदेशी को चिंता जाहिर करने का मौका नहीं मिलता।
राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन से विश्व में हमारे देश की एक अलग छवि बनेगी। आज जो विदेशी भारत को सांप-सपेरों का देश मानते हैं उन्हें भारत की उदात्त छवि देखने को मिलेगी। वह जान सकेंगे कि भारत कितनी तेजी से विकास कर रहा है। यह तभी संभव है जब एक वर्ष में खेलों से जुड़े सभी प्रोजेक्ट को तीव्र गति से पूरा कर लिया जाए। इनमें कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो आधुनिक भारतवर्ष की छवि पेश करेंगे।
September 13, 2009
कब स्वीकारेंगे अपनी गलतियों को राजनीतिक दल
भाजपा और वाम दलों को सच्चाई से आत्मविश्लेषण करना चाहिए
क्या भारतीय राजनीतिक दल अपनी गलतियों से कभी सबक लेंगे। गलतियों के लिए बहाना बनाना, तर्क गढ़कर उस पर पर्दा डालना और झूठ का सहारा लेना तो लगता है हमारे नेताओं के संस्कारों में रच बस गया है। राजनीतिक दल अपनी विफलताओं को ईमानदारी से स्वीकार नहीं करते। दूर जाने की जरूरत नहीं है। लोक सभा चुनाव में मिली पराजय का विश्लेषण ईमानदार तरीके से न तो दक्षिणपंथी भाजपा और नही वामपंथी दल ही कर पाएं हैं। यदि किए भी हैं तो जनता और देश के सामने लाने की इनमें हिम्मत नहीं है। दरअसल, ये दल अपनी गलतियों पर मंथन करना चाहते ही नहीं हैं।
लोक सभा में मिली पराजय पर भाजपा और वामदलों में मचा घमासान का कारण ऊपर से लेकर निचले स्तर के नेताओं का अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है। जो लोग वाकई जिम्मेदार हैं वह अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं। ऐसे में समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं को निराशा घेरने लगती है। भाजपा की दिक्कत है कि बहुत सारे नेता मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने में विश्वास करते हैं। जब उन्हें जनता के साथ मिलकर उनकी समस्याओं के समाधान के लिए आवाज उठानी चाहिए तो वे एसी में आराम फरमाते हैं। मैं भाजपा के कुछ नेताओं को व्यçक्तगत तौर पर जानता हूं जो सत्ता में रहने के दौरान कार्यकर्ताओं से मिलना तक नहीं चाहते थे। वह आज भी पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। हालांकि, पार्टी में सभी लोग ऐसे नहीं हैं। लेकिन, कुछ लोगों के चलते ही आज भाजपा की यह स्थिति हुई है। आम कार्यकर्ताओं में कोई उत्साह ही नहीं है। एक समस्या भाजपा की यह भी है कि जो जमीन से जुड़े नेता हैं वह आज भी पार्टी के प्रति समर्पित हैं। लेकिन, जिनका जनाधार नही है वह या तो पार्टी पर कब्जा किए बैठे हैं या महत्वपूर्ण पद की आस में हैं। ऐसे में बगावत और अनुशासनहीनता तो होना ही है। भाजपा का वर्तमान संकट सत्ता लोलुपता का द्योतक है।
दरअसल, लोक सभा चुनाव में भाजपाइयों ने जीत के लिए सामूहिक प्रयास ही नहीं किया। ऐसा नहीं था कि मुद्दे नहीं थे, लेकिन उन्हें ठीक से पेश ही भाजपा वाले नहीं कर पाए। हार का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए अथवा पार्टी को शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक जिम्मेदारी लेनी चाहिए अभी यही तय नहीं हो पाया। आज जो लोग बगावत का झंडा उठाए हुए हैं उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण पद चाहिए। उन लोगों को पार्टी की मर्यादा, अनुशासन और नीतियों से कुछ लेना देना नहीं है। दूसरी तरफ आज जो लोग निकले गए हैं उन्हें पार्टी में ढेरों कमियां दिखने लगी हैं, लेकिन जब वे थे तो उन्हें ऐसा कुछ दिखता ही नहीं था। ऐसे नेताओं को भी जनता खूब समझती है। मीडिया में कमियां गिना कर अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से वे लोग नहीं बच सकते। एक पार्टी छोड़कर दूसरे में जाने वाले कभी किसी दल का भला नहीं कर सकते।
भले ही जसवंत सिंह कंधार कांड के बारे में आडवाणी को झूठा बता रहे हैं, लेकिन देश की जनता यह कैसे भूल सकती है कि उस कांड को सफल बनाने में इन महाशय का ही पूर्ण योगदान था। मंत्री रहते इन्होंने कोई ऐसी छाप नहीं छोड़ी जिसे याद किया जा सके।
आज आडवाणी के नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए की भाजपा को शीर्ष पर पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। यदि अटल जी ने दूसरे दलों के लिए भाजपा को ग्राह्य बनाया तो आडवाणी ने पार्टी को सबल बनाने का अभूतपूर्व कार्य किया है।
माकपा के महासचिव प्रकाश करात का यह कहना कि भाजपा का वर्तमान संकट उसका संघ से नाता न तोड़ने का प्रतिफल है तो वाम दलों का हासिये पर चला जाना और एक-दो राज्यों में ही सिमट जाना किसका प्रतिफल है।
लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं होती। उस पर जनता का भी अधिकार होता है और जनता को जानने का पूरा हक है कि कोई दल विशेष क्यों पीछे रह गया। देश को मजबूत और ऊर्जावान विपक्ष देने के लिए भाजपा और वाम दलों को अपनी कमियों को दूर कर केंद्र सरकार की नाकामियों को जनता के सामने सच्चाई से लानी चाहिए। तभी लोकतंत्र का सही अर्थों में रक्षा हो सकेगा और तभी हमारा देश उन्नति के रास्ते पर चल सकेगा।
August 30, 2009
काफी मुनाफा है मिलावट के धंधे में
मृत्युदंड मिले मिलावटखोरों और जमाखोरों को
क्या हो रहा है अपने देश में? चारों तरफ लूट खसोट और बेइमानी का बोलबाला है। आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद से तो लोग जूझ ही रहे थे कि वर्षों पुराना मर्ज मिलावट और जमाखोरी फिर से जनता को परेशान करना शुरू कर दिया है। लेकिन, सरकारें यह तय नहीं कर पा रही हैं कि इनसे कैसे सख्ती से निपटा जाए। केंद्र और राज्य सरकारों के पास इन पर लगाम लगाने के लिए न तो दृढ़इच्छाशक्ति ही है और न ही कोई दूरदर्शी योजना। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव देश की गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है।
आतंकवाद तो बाहर से प्रायोजित है जिसका मकसद ही बबाüदी और तबाही है, लेकिन जमाखोरी और मिलावट के माध्यम से देश के अंदर देश को खोखला करने की साजिश हो रही है। क्योंकि, मिलावटी खाद्य पदार्थों से लोग आंतरिक और बाह्य रूप से प्रभावित होते हैं। यह एक तरह से स्वीट प्वॉइजन है जो धीरे-धीरे अपना असर दिखाता है।
इन दिनों लगभग रोज ही मिलावट और जमाखोरी के मामले अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बन रहे हैं। 22 अगस्त को गाजियाबाद में नकली घी और चाय बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया गया है । कई लोग इस मामले में गिरफ्तार किए गए हैं। इसके पूर्व मेरठ में भी नकली देशी घी बनाने की फैक्टरी का भंडाफोड़ हो चुका है। यहां पर शुद्ध देशी घी के नाम पर जानवरों की चर्बी और अन्य तेलों को मिलाकर घी तैयार किया जा रहा था। यहीं नहीं देशी घी के नाम पर लोगों की आंख में धूल झोंकने के मामले का उजागर राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश के जबलपुर में भी हो चुका है। हद तो तब हो गई जब हरियाणा के हिसार, कैथल और करनाल जिलों में सबजियों को समय पूर्व विकसित करने के लिए इंजेक्शन लगाने और दवाओं का प्रयोग करने का मामला प्रकाश में आया।
दूसरी तरफ जमाखोरों की भी पौ बारह है। खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ रहे हैं उसका एक सबसे बड़ा कारण जमाखोरी है। बड़े और छोटे सेठ-साहूकार वस्तुओं को जमा कर कृत्रिम कमी पैदा कर दे रहे हैं जिससे महंगाई बढ़ने लगती है। बाद में वे अपना स्टॉक बाजार में ऊंचे दामों पर बेच कर जनता की गाढ़ी कमाई ऐंठ लेते हैं। छत्तीसगढ़ में 23 अगस्त को दस करोड़ रुपये की दालें जब्त की गई हैं। इसके पूर्व मध्यप्रदेश में करोड़ों के चावल जब्त किए गए हैं। देश में ऐसे अनगिनत मामले हैं जिन तक किसी की नजर नहीं पहुंच पाती है।
यही नहीं अब यह नौबत आ गई है कि मुनाफे के लिए असामाजिक तत्व खून में मिलावट करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। पिछले दिन लखनऊ में मिलावटी खून बेचने वाले रैकेट का पर्दाफाश होना तो कुछ अलग ही कहानी बयां करता है। अब लोग करें तो करें क्या? लखनऊ में पकड़ा गया रैकेट इंसानों के खून में जानवरों का खून मिलाकर 900 से 1500 रुपये तक में बेच रहा था। लगता है लोगों की जमीर ही खत्म हो गई है। पैसे के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। सच तो यह कि ऐसे लोगों की कोई हद ही नहीं है।
इस तरह के मामलों की फेहरिस्त लंबी है। कुछ लोग गिरफतार भी किए जा रहे हैं। फिर भी इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। वहज भी आईने की मानिन्द साफ है, लोगों में मौजूदा कानून का खौफ ही नहीं है। या स्पष्ट कहें तो इन मिलावटखोरों और जमाखोरों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई ही नहीं की जाती। क्योंकि, जो धंधों के मुखिया हैं उन्हें कहीं न कहीं नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस से संरक्षण प्राप्त है।
दरअसल, मौजूदा कानून को और सख्त बनाने की जरूरत है। ऐसे लोगों में कानून का भय ही नहीं रह गया है। इनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि दूसरे ऐसे लोग सबक लें सकें। सबसे बड़े देशद्रोही तो यही हैं, क्योंकि, ऐसे लोग जनता के दिलो-दिमाग को कुंद करते हैं। यह लोग माफी अथवा कम सजा के हकदार नहीं हो सकते हैं। कुछ लोगों को केवल गिरफतार कर लेने और एफआईआर दर्ज करन े भर से कुछ नहीं होने वाला है। तह में जाकर पड़ताल करनी होगी और आरोपियों को मृत्युदंड से कम सजा मिलनी ही नहीं चाहिए। ऐसे मामलों के लिए सरकार को अलग से न्यायालयों का गठन करना चाहिए, जहां द्रुत गति से मामलों का निपटारा कर आरोपियों को सजा मिल सके।
क्या हो रहा है अपने देश में? चारों तरफ लूट खसोट और बेइमानी का बोलबाला है। आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद से तो लोग जूझ ही रहे थे कि वर्षों पुराना मर्ज मिलावट और जमाखोरी फिर से जनता को परेशान करना शुरू कर दिया है। लेकिन, सरकारें यह तय नहीं कर पा रही हैं कि इनसे कैसे सख्ती से निपटा जाए। केंद्र और राज्य सरकारों के पास इन पर लगाम लगाने के लिए न तो दृढ़इच्छाशक्ति ही है और न ही कोई दूरदर्शी योजना। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव देश की गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है।
आतंकवाद तो बाहर से प्रायोजित है जिसका मकसद ही बबाüदी और तबाही है, लेकिन जमाखोरी और मिलावट के माध्यम से देश के अंदर देश को खोखला करने की साजिश हो रही है। क्योंकि, मिलावटी खाद्य पदार्थों से लोग आंतरिक और बाह्य रूप से प्रभावित होते हैं। यह एक तरह से स्वीट प्वॉइजन है जो धीरे-धीरे अपना असर दिखाता है।
इन दिनों लगभग रोज ही मिलावट और जमाखोरी के मामले अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बन रहे हैं। 22 अगस्त को गाजियाबाद में नकली घी और चाय बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया गया है । कई लोग इस मामले में गिरफ्तार किए गए हैं। इसके पूर्व मेरठ में भी नकली देशी घी बनाने की फैक्टरी का भंडाफोड़ हो चुका है। यहां पर शुद्ध देशी घी के नाम पर जानवरों की चर्बी और अन्य तेलों को मिलाकर घी तैयार किया जा रहा था। यहीं नहीं देशी घी के नाम पर लोगों की आंख में धूल झोंकने के मामले का उजागर राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश के जबलपुर में भी हो चुका है। हद तो तब हो गई जब हरियाणा के हिसार, कैथल और करनाल जिलों में सबजियों को समय पूर्व विकसित करने के लिए इंजेक्शन लगाने और दवाओं का प्रयोग करने का मामला प्रकाश में आया।
दूसरी तरफ जमाखोरों की भी पौ बारह है। खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ रहे हैं उसका एक सबसे बड़ा कारण जमाखोरी है। बड़े और छोटे सेठ-साहूकार वस्तुओं को जमा कर कृत्रिम कमी पैदा कर दे रहे हैं जिससे महंगाई बढ़ने लगती है। बाद में वे अपना स्टॉक बाजार में ऊंचे दामों पर बेच कर जनता की गाढ़ी कमाई ऐंठ लेते हैं। छत्तीसगढ़ में 23 अगस्त को दस करोड़ रुपये की दालें जब्त की गई हैं। इसके पूर्व मध्यप्रदेश में करोड़ों के चावल जब्त किए गए हैं। देश में ऐसे अनगिनत मामले हैं जिन तक किसी की नजर नहीं पहुंच पाती है।
यही नहीं अब यह नौबत आ गई है कि मुनाफे के लिए असामाजिक तत्व खून में मिलावट करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। पिछले दिन लखनऊ में मिलावटी खून बेचने वाले रैकेट का पर्दाफाश होना तो कुछ अलग ही कहानी बयां करता है। अब लोग करें तो करें क्या? लखनऊ में पकड़ा गया रैकेट इंसानों के खून में जानवरों का खून मिलाकर 900 से 1500 रुपये तक में बेच रहा था। लगता है लोगों की जमीर ही खत्म हो गई है। पैसे के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। सच तो यह कि ऐसे लोगों की कोई हद ही नहीं है।
इस तरह के मामलों की फेहरिस्त लंबी है। कुछ लोग गिरफतार भी किए जा रहे हैं। फिर भी इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। वहज भी आईने की मानिन्द साफ है, लोगों में मौजूदा कानून का खौफ ही नहीं है। या स्पष्ट कहें तो इन मिलावटखोरों और जमाखोरों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई ही नहीं की जाती। क्योंकि, जो धंधों के मुखिया हैं उन्हें कहीं न कहीं नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस से संरक्षण प्राप्त है।
दरअसल, मौजूदा कानून को और सख्त बनाने की जरूरत है। ऐसे लोगों में कानून का भय ही नहीं रह गया है। इनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि दूसरे ऐसे लोग सबक लें सकें। सबसे बड़े देशद्रोही तो यही हैं, क्योंकि, ऐसे लोग जनता के दिलो-दिमाग को कुंद करते हैं। यह लोग माफी अथवा कम सजा के हकदार नहीं हो सकते हैं। कुछ लोगों को केवल गिरफतार कर लेने और एफआईआर दर्ज करन े भर से कुछ नहीं होने वाला है। तह में जाकर पड़ताल करनी होगी और आरोपियों को मृत्युदंड से कम सजा मिलनी ही नहीं चाहिए। ऐसे मामलों के लिए सरकार को अलग से न्यायालयों का गठन करना चाहिए, जहां द्रुत गति से मामलों का निपटारा कर आरोपियों को सजा मिल सके।
August 23, 2009
रेलवे को क्षति पहुंचाना शगल बन गया है
सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों पर कठोर कार्रवाई हो
सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना लोगों के लिए शगल बन गया है। छोटी-छोटी बातों के लिए लोग राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आजकल देश में अपनी मांगें मनवाने के लिए सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाना लोगों को सबसे आसान और उपयुक्त लगता है। लोगों को लगता है कि यह सब करके वे सरकार से अपनी गलत बातों को भी मनवा लेंगे, लेकिन वह भूल जाते हैं कि सरकारी संपत्ति जनता की अपनी संपत्ति है और इसे नुकसान पहुंचा कर हम अपना नुकसान ही तो कर रहे हैं। क्योंकि, सरकार जो पैसा दूसरे विकासात्मक कार्यों पर लगाती वह पैसा नष्ट हुई संपत्ति पर लगाना पड़ता है। ऐसे में किसका नुकसान हुआ?
लोगों के गुस्से का सर्वाधिक शिकार देश की जीवन रेखा रेलवे ही हुई है। ट्रेनों की बोगियों में आग लगा देना, रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ करना तो मानो आम बात हो गई है। हर बात पर लोग ट्रेनों के चक्के जाम कर देते हैं या कोचों में आग लगा देते हैं, इससे सरकार को लाखों-करोड़ों का नुकसान होता है।
आजादी के बाद से बिहार से ही ज्यादातर रेलवे मंत्री बने हैं। यह विडंबना ही है कि बिहार में ही रेलवे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया जाता है। आए दिन लोग या नक्सली रेलवे को क्षति पहुंचाते रहते हैं। पिछले सात-आठ महीने के रिकार्ड को देखा जाए तो सर्वाधिक नुकसान रेलवे को बिहार में पहुंचाया गया है।
पिछले दिन बिहटा रेलवे स्टेशन के पास जिस तरह से छात्रों ने आरक्षित सीटों पर बैठने को लेकर श्रमजीवी एक्सप्रेस की एसी बोगियों में आग लगा दी बहुत ही दुखद है। जो छात्र देश के भविष्य हैं वे राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुंचाने में जरा सा भी देर नहीं लगाते हैं, इससे ज्यादा राष्ट्रीय शर्मनाक और क्या हो सकता है। उसी दिन लखीसराय स्टेशन पर भी लोगों ने एक और ट्रेन को आग लगा दी। कुछ दिन पहले ही दानापुर-सहरसा इंटरसिटी में भी आग लगा दी गई थी।
रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे भरती में स्थानीय लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी तो नाराज छात्रों ने बाढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन को आग लगा दी थी। इस घटना के अगले दिन अथमलगोला रेलवे स्टेशन पर भी छात्रों ने कोसी एक्सप्रेस में आगजनी की कोशिश की। यही नहीं बिहार में बने कई अवैध हाल्टों को हटाने के आदेश पर भी लोगों ने रेलवे को नुकसान पहुंचाया था।
पिछले वर्ष मुंबई में उत्तर भारतीयों की कथित पिटाई तथा राहुल राज नाम के युवक की पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मौत के बाद कई दिनों तक छात्रों ने रेलवे को निशाना बनाया था। 26 अक्टूबर 2008 को बाढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ी साउथ बिहार ट्रेन में छात्रों ने आग लगा दी। इस घटना में ट्रेन की दो एसी बोगियां जलकर राख हो गई थीं। इससे तीन दिन पूर्व 23 अक्टूबर को परीक्षार्थियों ने सोनपुर मंडल के बापूधाम मोतिहारी स्टेशन पर जमकर उत्पात मचाया था।
इसी तरह 21 अक्टूबर को मुंबई से परीक्षा देकर लौटे छात्रों ने पटना जंक्शन पर जमकर तोड़फोड़ की थी। जंक्शन से गुजरने वाली ट्रेनों में पटना-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस समेत चार दर्जन से ज्यादा ट्रेनों को रद्द करना पड़ा था। (यह रेलवे पुलिस में दर्ज मामलों से लिए गए हैं )
यह तो रही छात्रों और बिहार की बात। लेकिन देश के अन्यत्र हिस्सों में भी रेलवे को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं बढ़ी हैं। राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर किए जा रहे आंदोलन के दौरान भी ट्रैक पर धरने पर बैठ कर लोगों ने रेलवे का आवागमन कई दिनों तक ठप कर दिया था, जिससे करोड़ों की राजस्व की क्षति हुई थी साथ ही लोगों को भी भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ा था।
दरअसल, देश में कानून का कड़ाई से पालन न होना भी सरकारी संपçत्त को नुकसान पहुंचाए जाने का एक बड़ा कारण है। यदि रेलवे अथवा किसी भी सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों के विरुद्ध कठोरता से पेश आया जाता तो लोग ऐसा करने से बाज आते, लेकिन ऐसा होता नहीं। केंद्र सरकार कानून व्यवस्था राज्य का मामला बता कर कार्रवाई करने से पीछे हट जाती है। राज्य सरकारें रेलवे को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले अपने वोट बैंक के नफा-नुकसान का हिसाब लगाने लगती हैं। उन्हें लगता है कि कार्रवाई करने के मामले को कहीं विपक्ष क्वमुद्दां न बना दे। इस तरह से रेलवे को नुकसान पहुंचाने वालों के हौसले बुलंद होते जाते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ भी करो कुछ होने वाला नहीं है।
मुझे याद है, वर्ष 2000 में मेरे गृह जनपद गाजीपुर के दिलदारनगर जंक्शन पर अपर इंडिया के कई बोगियों में उपद्रवी तत्त्वों ने आग लगा दी थी। मैं भी उस दिन ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पर ही मौजूद था। ट्रेन को फूंकने वाले लोगों के विरुद्ध मामले दर्ज हुए, लेकिन कार्रवाई आजतक नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि पुलिस उन उपद्रवियों को नहीं जानती है। सबकुछ के बावजूद सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वाले आज भी स्टेशन पर घूमते हुए दिख जाएंगे, लेकिन पुलिस और प्रशासन को नहीं दिखेंगे। क्योंकि, दुर्भाग्य से वे एक पार्टी विशेष से संबंध रखते हैं और पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने देती।
विश्व में कहीं भी रेलवे को नुकसान को पहुंचाने की घटनाएं संभवतः नहीं होती हैं, लेकिन अपने महान देश के महान लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देने में अपना गर्व समझते हैं। उन्हें लगता है कि रेल ही एक जरीया जिससे वे अपनी बात मनवा सकते हैं।
दरअसल, हम लोग अभी भी एक अच्छे और जनतांत्रिक नागरिक के गुणों को विकसित नहीं कर पाए हैं। हम लोगों में सिविक सेंस ही नहीं है। यदि सिविक सेंस होती तो ऐसी घटनायें नहीं होतीं। क्या पश्चिम में या विकसित देशों में अपनी मांगों को लेकर लोग आंदोलन नहीं करते हैं? वहां भी आंदोलन होता है, लेकिन अपने देश जैसा नहीं।
अब समय आ गया है कि देश के कानूनी ढांचा को बदल कर कुछ मामलों में एक संघीय कानून बनाया जाए। सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों या राष्ट्रीयता को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध सीधे राष्ट्रीय स्तर पर कठोरतम कार्रवाई की जाए। ढुलमुल रवैये से अब काम चलने वाला नहीं है।
सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना लोगों के लिए शगल बन गया है। छोटी-छोटी बातों के लिए लोग राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आजकल देश में अपनी मांगें मनवाने के लिए सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाना लोगों को सबसे आसान और उपयुक्त लगता है। लोगों को लगता है कि यह सब करके वे सरकार से अपनी गलत बातों को भी मनवा लेंगे, लेकिन वह भूल जाते हैं कि सरकारी संपत्ति जनता की अपनी संपत्ति है और इसे नुकसान पहुंचा कर हम अपना नुकसान ही तो कर रहे हैं। क्योंकि, सरकार जो पैसा दूसरे विकासात्मक कार्यों पर लगाती वह पैसा नष्ट हुई संपत्ति पर लगाना पड़ता है। ऐसे में किसका नुकसान हुआ?
लोगों के गुस्से का सर्वाधिक शिकार देश की जीवन रेखा रेलवे ही हुई है। ट्रेनों की बोगियों में आग लगा देना, रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ करना तो मानो आम बात हो गई है। हर बात पर लोग ट्रेनों के चक्के जाम कर देते हैं या कोचों में आग लगा देते हैं, इससे सरकार को लाखों-करोड़ों का नुकसान होता है।
आजादी के बाद से बिहार से ही ज्यादातर रेलवे मंत्री बने हैं। यह विडंबना ही है कि बिहार में ही रेलवे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया जाता है। आए दिन लोग या नक्सली रेलवे को क्षति पहुंचाते रहते हैं। पिछले सात-आठ महीने के रिकार्ड को देखा जाए तो सर्वाधिक नुकसान रेलवे को बिहार में पहुंचाया गया है।
पिछले दिन बिहटा रेलवे स्टेशन के पास जिस तरह से छात्रों ने आरक्षित सीटों पर बैठने को लेकर श्रमजीवी एक्सप्रेस की एसी बोगियों में आग लगा दी बहुत ही दुखद है। जो छात्र देश के भविष्य हैं वे राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुंचाने में जरा सा भी देर नहीं लगाते हैं, इससे ज्यादा राष्ट्रीय शर्मनाक और क्या हो सकता है। उसी दिन लखीसराय स्टेशन पर भी लोगों ने एक और ट्रेन को आग लगा दी। कुछ दिन पहले ही दानापुर-सहरसा इंटरसिटी में भी आग लगा दी गई थी।
रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे भरती में स्थानीय लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी तो नाराज छात्रों ने बाढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन को आग लगा दी थी। इस घटना के अगले दिन अथमलगोला रेलवे स्टेशन पर भी छात्रों ने कोसी एक्सप्रेस में आगजनी की कोशिश की। यही नहीं बिहार में बने कई अवैध हाल्टों को हटाने के आदेश पर भी लोगों ने रेलवे को नुकसान पहुंचाया था।
पिछले वर्ष मुंबई में उत्तर भारतीयों की कथित पिटाई तथा राहुल राज नाम के युवक की पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मौत के बाद कई दिनों तक छात्रों ने रेलवे को निशाना बनाया था। 26 अक्टूबर 2008 को बाढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ी साउथ बिहार ट्रेन में छात्रों ने आग लगा दी। इस घटना में ट्रेन की दो एसी बोगियां जलकर राख हो गई थीं। इससे तीन दिन पूर्व 23 अक्टूबर को परीक्षार्थियों ने सोनपुर मंडल के बापूधाम मोतिहारी स्टेशन पर जमकर उत्पात मचाया था।
इसी तरह 21 अक्टूबर को मुंबई से परीक्षा देकर लौटे छात्रों ने पटना जंक्शन पर जमकर तोड़फोड़ की थी। जंक्शन से गुजरने वाली ट्रेनों में पटना-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस समेत चार दर्जन से ज्यादा ट्रेनों को रद्द करना पड़ा था। (यह रेलवे पुलिस में दर्ज मामलों से लिए गए हैं )
यह तो रही छात्रों और बिहार की बात। लेकिन देश के अन्यत्र हिस्सों में भी रेलवे को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं बढ़ी हैं। राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर किए जा रहे आंदोलन के दौरान भी ट्रैक पर धरने पर बैठ कर लोगों ने रेलवे का आवागमन कई दिनों तक ठप कर दिया था, जिससे करोड़ों की राजस्व की क्षति हुई थी साथ ही लोगों को भी भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ा था।
दरअसल, देश में कानून का कड़ाई से पालन न होना भी सरकारी संपçत्त को नुकसान पहुंचाए जाने का एक बड़ा कारण है। यदि रेलवे अथवा किसी भी सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों के विरुद्ध कठोरता से पेश आया जाता तो लोग ऐसा करने से बाज आते, लेकिन ऐसा होता नहीं। केंद्र सरकार कानून व्यवस्था राज्य का मामला बता कर कार्रवाई करने से पीछे हट जाती है। राज्य सरकारें रेलवे को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले अपने वोट बैंक के नफा-नुकसान का हिसाब लगाने लगती हैं। उन्हें लगता है कि कार्रवाई करने के मामले को कहीं विपक्ष क्वमुद्दां न बना दे। इस तरह से रेलवे को नुकसान पहुंचाने वालों के हौसले बुलंद होते जाते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ भी करो कुछ होने वाला नहीं है।
मुझे याद है, वर्ष 2000 में मेरे गृह जनपद गाजीपुर के दिलदारनगर जंक्शन पर अपर इंडिया के कई बोगियों में उपद्रवी तत्त्वों ने आग लगा दी थी। मैं भी उस दिन ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पर ही मौजूद था। ट्रेन को फूंकने वाले लोगों के विरुद्ध मामले दर्ज हुए, लेकिन कार्रवाई आजतक नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि पुलिस उन उपद्रवियों को नहीं जानती है। सबकुछ के बावजूद सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वाले आज भी स्टेशन पर घूमते हुए दिख जाएंगे, लेकिन पुलिस और प्रशासन को नहीं दिखेंगे। क्योंकि, दुर्भाग्य से वे एक पार्टी विशेष से संबंध रखते हैं और पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने देती।
विश्व में कहीं भी रेलवे को नुकसान को पहुंचाने की घटनाएं संभवतः नहीं होती हैं, लेकिन अपने महान देश के महान लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देने में अपना गर्व समझते हैं। उन्हें लगता है कि रेल ही एक जरीया जिससे वे अपनी बात मनवा सकते हैं।
दरअसल, हम लोग अभी भी एक अच्छे और जनतांत्रिक नागरिक के गुणों को विकसित नहीं कर पाए हैं। हम लोगों में सिविक सेंस ही नहीं है। यदि सिविक सेंस होती तो ऐसी घटनायें नहीं होतीं। क्या पश्चिम में या विकसित देशों में अपनी मांगों को लेकर लोग आंदोलन नहीं करते हैं? वहां भी आंदोलन होता है, लेकिन अपने देश जैसा नहीं।
अब समय आ गया है कि देश के कानूनी ढांचा को बदल कर कुछ मामलों में एक संघीय कानून बनाया जाए। सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों या राष्ट्रीयता को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध सीधे राष्ट्रीय स्तर पर कठोरतम कार्रवाई की जाए। ढुलमुल रवैये से अब काम चलने वाला नहीं है।
July 6, 2009
क्या समलैंगिकता मानसिक बीमारी नहीं है ?
समाज को नहीं अपनी सोंच बदलें समलैंगिकता के पैरोकार
समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय भले ही कुछ पश्चिमप्रस्त मीडिया संस्थानों और संगठनों के लिए ऐतिहासिक और प्रगतिवादी फैसला लग रहा हो लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता इसको गैर जरूरी और अव्यवहारिक निर्णय मानती है। आप कुछ मुठी भर लोगों की खुशियों के लिए देश की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से छेड़छाड़ करने की खुली छूट तो नहीं दे सकते।
समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली धारा 377 को बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन कुछ लोगों को भले ही लगता है लेकिन इस तरह के संबंधों को वैधानिक स्वरूप प्रदान करना भी तो बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का मजाक उड़ाना है।
यदि धारा 377 से कुछ लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो होता रहे। इसके लिए समाज को विघटित और शर्मिंदा करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्षमा चाहूंगा। एक अपराधी अपराध करना अपना अधिकार समझता है, आतंकवादी आतंकवाद फैलाना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, चोर चोरी करना अपना मौलिक अधिकार मानते हैं तो क्या इन्हें भी छूट दी जा सकती है! मेरा आशय समलैंगिकों को अपराधी या आतंकवादी अथवा गलत लोगों की श्रेणी में खड़ा करना नहीं है। वरन मैं मेरा यह आग्रह है कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिस पर सोच विचार कर और बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया जाना चाहिए।
रामदेव जी ने ठीक ही कहा है कि समलैंगिक लोग मानसिक रूप से बीमार हैं उन्हें अस्पताल भेजना होगा। बकौल रामदेव जी समाज की सोच बदलने की जगह ऐसे लोगों को योग और प्राणायाम के जरिए अपने को बदलना चाहिए। आप समाज के साथ चलिए।
सवाल यह नहीं है कि समलैंगिकता को मान्यता मिलनी चाहिए या नहीं। गौरतलब बात यह है कि आखिर हम भारत को क्या बनाना चाहते हैं? पहले यह तय करना होगा। कृपया, भारत को भारत ही रहने दें तो अच्छा होगा, देश पर पाश्चात्य संस्कृति को थोपने की जरूरत नहीं है। भारत की अपनी संस्कृति, अपनी मान्यता, अपनी पहचान, परंपरा और एक छवि है। ऐसे में आप पश्चिम की बुरी सभ्यताओं को क्यों ग्रहण करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में केवल बुराइयां ही हैं अच्छाइयां भी हैं आप उन्हें ग्रहण करें। आप यह न भूलें कि भारत को विश्व धर्म गुरू के रूप में भी जाना जाता था।
दरअसल, कुछ संस्थाएं और कुछ लोग ऐसे हैं जो देश की संस्कृति और परंपराओं के विरुद्ध षडयंत्र करने में लगे हैं। वे चाहते हैं कि भारत की प्राचीन संस्कृति विनष्ट हो जाए और पाश्चात्य की बुरी सभ्यता यहां खुलेआम चलें। पश्चिम में तो बच्चों की एक बड़ी संख्या है जिनके असली पिता के बारे में उनकी माताओं को ही निश्चित तौर पर पता नहीं होता है। यहां भी कुछ लोग ऐसी ही संस्कृति विकसित करना चाहते हैं। जहां उन्हें कोई टोकने वाला न हो। लेकिन ऐसी आजादी, ऐसी संस्कृति को भारतीय लोग बर्दास्त नहीं करेंगे।
समलैंगिकता भारतीयों की सोच या संस्कृति से मेल नहीं खाती। भारत में कभी भी इस तरह के संबंधों को मान्यता नहीं मिली। जिस कामसूत्र और प्राचीन भिçत्त चित्रों को आधार बनाकर इसे जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। उसके निहितार्थ को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है। कामसूत्र के रचनाकार कोई साधारण उपन्यास या निबंध लेखक नहीं थे उन्हें देश, काल और परिस्थितियों का अच्छी तरह से ज्ञान था। वे प्रकृति और संस्कृति विरुद्ध कार्य करने की इजाजत कैसे दे सकते थे। जिस संबंध का (जिसे कुछ लोग समलैंगिकता मान रहे हैं) कामसूत्र में वर्णन किया गया है उसको गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता है। उस प्रसंग का वाकई में क्या अर्थ होना चाहिए? यह जानने की कोशिश होनी चाहिए। जिस संबंध का जिक्र है वह किसके साथ, कब, कहां और क्यों करना चाहिए यह जानना होगा। हमें प्राचीन ग्रंथों में वणिüत प्रसंगों का उदाहरण देने से पहले उस प्रसंग की सारगभिüता को भी ध्यान में रखना होगा।
समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसला का देश में हो रहे चौतरफा विरोध को नकारा नहीं जा सकता। लगभग सभी राजनीतिक दल और सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने भारी विरोध किया है। जदयू के शरद यादव ने ठीक ही कहा है कि देश में और भी गंभीर मुद्दे हैं जिस पर बहस होनी चाहिए। ऐसे मुद्दों पर बहस कर समय और ऊर्जा बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।
वैसे भी समलैंगिकता के पैरोकार देश के कुछ शहरों में ही हैं। जिनकी जनसँख्या पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ऐसे संबंधों के बारे में लोग सोचना भी पसंद नहीं करते। कुछ एक अपवाद हो सकते हैं।
समलैंगिक तो जानवर भी नहीं होते। हम मनुष्य होकर ऐसे संबंधों की पैरोकारी क्यों कर रहे हैं? इस पर भी जरा सोचें..............
समाज को नहीं अपनी सोंच बदलें समलैंगिकता के पैरोकार
समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय भले ही कुछ पश्चिमप्रस्त मीडिया संस्थानों और संगठनों के लिए ऐतिहासिक और प्रगतिवादी फैसला लग रहा हो लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता इसको गैर जरूरी और अव्यवहारिक निर्णय मानती है। आप कुछ मुठी भर लोगों की खुशियों के लिए देश की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से छेड़छाड़ करने की खुली छूट तो नहीं दे सकते।
समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली धारा 377 को बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन कुछ लोगों को भले ही लगता है लेकिन इस तरह के संबंधों को वैधानिक स्वरूप प्रदान करना भी तो बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का मजाक उड़ाना है।
यदि धारा 377 से कुछ लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो होता रहे। इसके लिए समाज को विघटित और शर्मिंदा करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। क्षमा चाहूंगा। एक अपराधी अपराध करना अपना अधिकार समझता है, आतंकवादी आतंकवाद फैलाना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, चोर चोरी करना अपना मौलिक अधिकार मानते हैं तो क्या इन्हें भी छूट दी जा सकती है! मेरा आशय समलैंगिकों को अपराधी या आतंकवादी अथवा गलत लोगों की श्रेणी में खड़ा करना नहीं है। वरन मैं मेरा यह आग्रह है कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिस पर सोच विचार कर और बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया जाना चाहिए।
रामदेव जी ने ठीक ही कहा है कि समलैंगिक लोग मानसिक रूप से बीमार हैं उन्हें अस्पताल भेजना होगा। बकौल रामदेव जी समाज की सोच बदलने की जगह ऐसे लोगों को योग और प्राणायाम के जरिए अपने को बदलना चाहिए। आप समाज के साथ चलिए।
सवाल यह नहीं है कि समलैंगिकता को मान्यता मिलनी चाहिए या नहीं। गौरतलब बात यह है कि आखिर हम भारत को क्या बनाना चाहते हैं? पहले यह तय करना होगा। कृपया, भारत को भारत ही रहने दें तो अच्छा होगा, देश पर पाश्चात्य संस्कृति को थोपने की जरूरत नहीं है। भारत की अपनी संस्कृति, अपनी मान्यता, अपनी पहचान, परंपरा और एक छवि है। ऐसे में आप पश्चिम की बुरी सभ्यताओं को क्यों ग्रहण करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में केवल बुराइयां ही हैं अच्छाइयां भी हैं आप उन्हें ग्रहण करें। आप यह न भूलें कि भारत को विश्व धर्म गुरू के रूप में भी जाना जाता था।
दरअसल, कुछ संस्थाएं और कुछ लोग ऐसे हैं जो देश की संस्कृति और परंपराओं के विरुद्ध षडयंत्र करने में लगे हैं। वे चाहते हैं कि भारत की प्राचीन संस्कृति विनष्ट हो जाए और पाश्चात्य की बुरी सभ्यता यहां खुलेआम चलें। पश्चिम में तो बच्चों की एक बड़ी संख्या है जिनके असली पिता के बारे में उनकी माताओं को ही निश्चित तौर पर पता नहीं होता है। यहां भी कुछ लोग ऐसी ही संस्कृति विकसित करना चाहते हैं। जहां उन्हें कोई टोकने वाला न हो। लेकिन ऐसी आजादी, ऐसी संस्कृति को भारतीय लोग बर्दास्त नहीं करेंगे।
समलैंगिकता भारतीयों की सोच या संस्कृति से मेल नहीं खाती। भारत में कभी भी इस तरह के संबंधों को मान्यता नहीं मिली। जिस कामसूत्र और प्राचीन भिçत्त चित्रों को आधार बनाकर इसे जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। उसके निहितार्थ को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है। कामसूत्र के रचनाकार कोई साधारण उपन्यास या निबंध लेखक नहीं थे उन्हें देश, काल और परिस्थितियों का अच्छी तरह से ज्ञान था। वे प्रकृति और संस्कृति विरुद्ध कार्य करने की इजाजत कैसे दे सकते थे। जिस संबंध का (जिसे कुछ लोग समलैंगिकता मान रहे हैं) कामसूत्र में वर्णन किया गया है उसको गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता है। उस प्रसंग का वाकई में क्या अर्थ होना चाहिए? यह जानने की कोशिश होनी चाहिए। जिस संबंध का जिक्र है वह किसके साथ, कब, कहां और क्यों करना चाहिए यह जानना होगा। हमें प्राचीन ग्रंथों में वणिüत प्रसंगों का उदाहरण देने से पहले उस प्रसंग की सारगभिüता को भी ध्यान में रखना होगा।
समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसला का देश में हो रहे चौतरफा विरोध को नकारा नहीं जा सकता। लगभग सभी राजनीतिक दल और सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने भारी विरोध किया है। जदयू के शरद यादव ने ठीक ही कहा है कि देश में और भी गंभीर मुद्दे हैं जिस पर बहस होनी चाहिए। ऐसे मुद्दों पर बहस कर समय और ऊर्जा बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।
वैसे भी समलैंगिकता के पैरोकार देश के कुछ शहरों में ही हैं। जिनकी जनसँख्या पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ऐसे संबंधों के बारे में लोग सोचना भी पसंद नहीं करते। कुछ एक अपवाद हो सकते हैं।
समलैंगिक तो जानवर भी नहीं होते। हम मनुष्य होकर ऐसे संबंधों की पैरोकारी क्यों कर रहे हैं? इस पर भी जरा सोचें..............
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